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ऊर्जा संकट और ईंधन के बढ़ते दामों के बीच EV बना नया विकल्प, छोटे शहरों में तेज मांग
उद्योग जगत के आंकड़ों के अनुसार टियर-2 शहरों में ईवी की पैठ करीब 10.7% और टियर-3 शहरों में लगभग 8.7% तक पहुंच चुकी है, जो टियर-1 शहरों के मुकाबले बहुत पीछे नहीं है.
रितु राणा 1 hour ago
पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक तनाव और ईंधन आपूर्ति को लेकर बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच आज देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम आदमी की चिंता और बढ़ा दी है. इसी के साथ प्रधानमंत्री की ओर से इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को अपनाने की अपील भी चर्चा में है. महंगे होते ईंधन और ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती के बीच भारत में वैकल्पिक मोबिलिटी की ओर रुझान तेजी से बढ़ रहा है. इसका असर अब साफ दिख रहा है, जहां EV की मांग मेट्रो शहरों से आगे बढ़कर टियर-2 और टियर-3 शहरों तक भी तेजी से फैल रही है. हाल में उत्तर पूर्वी दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी ने भी सोशल मीडिया एक वीडियो शेयर करके यह जानकारी दी कि प्रधानमंत्री की अपील पर उन्होंने भी पेट्रोल की गाड़ी से अब इलेक्ट्रिक गाड़ी पर स्विच कर लिया है. साथ ही उन्होंने अन्य लोगों से भी यह अपील करते हुए कहा कि अगर वह भी इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रयोग करें.
EV की ग्रोथ अब मेट्रो से आगे छोटे शहरों में पहुंची
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की ग्रोथ अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है. टियर-2 और टियर-3 शहर तेजी से ईवी अपनाने के नए केंद्र बनते जा रहे हैं. इसकी मुख्य वजह ई-कॉमर्स, लास्ट-माइल डिलीवरी, इंटरसिटी लॉजिस्टिक्स और स्थानीय कारोबारों की बढ़ती जरूरतें हैं, जहां लागत कम करना और ऑपरेशनल एफिशिएंसी बढ़ाना प्राथमिकता बन गया है.
ड्राइवीएन (Drivn) की को-फाउंडर और सीबीओ अल्पना जैन कहती हैं, टियर-2 और टियर-3 शहर अब सिर्फ कंज्यूमर मार्केट नहीं रहे, बल्कि कमर्शियल मोबिलिटी के असली ग्रोथ इंजन बन चुके हैं. यहां बिजनेस ऐसे समाधान चाहते हैं जो बिना भारी शुरुआती निवेश के स्केलेबिलिटी और एफिशिएंसी दोनों दे सकें. उन्होंने बताया कि ई-कॉमर्स और डिलीवरी इकोसिस्टम ने इन शहरों में EV को एक विकल्प से बढ़ाकर जरूरत बना दिया है. अब यह ट्रेंड नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल शिफ्ट है.
छोटे शहरों में लागत सबसे बड़ा ड्राइवर
विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे शहरों में EV अपनाने का सबसे बड़ा कारण लागत है. यहां उपभोक्ता लंबे समय की बचत और कम रनिंग कॉस्ट को प्राथमिकता देते हैं. मैक्सवोल्ट एनर्जी (MaxVolt Energy Industries Ltd) के को-फाउंडर व सीएमओ मुकेश गुप्ता कहते हैं, छोटे शहरों में EV को लेकर सोच बेहद व्यावहारिक है. लोग दिखावे से ज्यादा इस बात पर ध्यान देते हैं कि महीने का खर्च कितना कम हो सकता है. उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रिक दोपहिया और कमर्शियल वाहन डिलीवरी और रोजमर्रा के कामकाज में सबसे तेजी से अपनाए जा रहे हैं, क्योंकि ये सीधे जेब पर असर डालते हैं. इसके अलावा सरकारी प्रोत्साहन, फाइनेंसिंग की आसान सुविधा और बढ़ती जागरूकता ने EV को अब एक प्रयोग नहीं बल्कि एक समझदारी भरा आर्थिक फैसला बना दिया है.
EV अपनाने में नीति और इंफ्रास्ट्रक्चर की अहम भूमिका
सरकारी नीतियों, आसान फाइनेंस और चार्जिंग नेटवर्क के धीरे-धीरे विस्तार ने EV सेक्टर में भरोसा बढ़ाया है. साथ ही बैटरी परफॉर्मेंस और पर्यावरण को लेकर जागरूकता भी लगातार बढ़ रही है. न्यूरोन एनर्जी (Neuron Energy) के को-फाउंडर व सीईओ प्रतीक कामदार कहते हैं, भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की यात्रा अब तेजी से टियर-2 और टियर-3 शहरों द्वारा आकार ले रही है, जहां किफायती और व्यावहारिक मोबिलिटी समाधानों की मांग लगातार बढ़ रही है. शुरुआती वृद्धि दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई जैसे शहरी केंद्रों से शुरू हुई थी, लेकिन अब छोटे शहर प्रमुख विकास केंद्र बनकर उभर रहे हैं, खासकर इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों के लिए, जहां किफायत, ईंधन की बचत और रोजमर्रा की उपयोगिता खरीद के निर्णयों को काफी प्रभावित करती है.
वहीं, सरकार की अपील और नीतिगत समर्थन ने भी इंडस्ट्री को स्पष्ट दिशा दी है. स्वच्छ मोबिलिटी को बढ़ावा देने को हाल ही में माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी प्रोत्साहन मिला है, जब उन्होंने नागरिकों से ईवी अपनाने और पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम करने का आग्रह किया, जो देश के व्यापक ऊर्जा संरक्षण प्रयासों का हिस्सा है. इससे उपभोक्ता का भरोसा बढ़ा है और निवेश भी तेज हुआ है. उन्होंने बताया कि अगले कुछ सालों में EV की असली स्केलिंग वहीं से आएगी जहां लोकल जरूरतें और इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों साथ विकसित होंगे.
सिलीगुड़ी, कूच बिहार और बरेली जैसे शहरों में ईवी अपनाने का ट्रेंड
EV सेक्टर में ग्रोथ के बावजूद चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता और भरोसेमंद संचालन अभी भी चुनौती बना हुआ है. कई जगहों पर चार्जिंग स्टेशन मौजूद हैं, लेकिन उनकी निरंतर उपलब्धता और विश्वसनीयता एक बड़ा मुद्दा है. कजमा (Kazam) के को-फाउंडर व सीईओ अक्षय शेखर कहते हैं, ईवी (इलेक्ट्रिक वाहन) को केवल बड़े शहरों तक सीमित मानने की धारणा तेजी से बदल रही है. ईवी चार्जिंग और ऊर्जा प्रबंधन प्लेटफॉर्म कजैम के तौर पर, हम टियर-2 और टियर-3 शहरों में मांग में तेज वृद्धि देख रहे हैं. सिलीगुड़ी, कूच बिहार और बरेली जैसे शहरों में उपभोक्ता अब CNG को छोड़ ईवी अपना रहे हैं.
उद्योग के रुझान भी इसी दिशा की पुष्टि करते हैं. टियर-2 शहरों में ईवी की पैठ करीब 10.7% और टियर-3 शहरों में लगभग 8.7% तक पहुंच चुकी है, जो टियर-1 शहरों के मुकाबले बहुत पीछे नहीं है. ये छोटे शहर अब ईवी बाजार की वृद्धि में अहम भूमिका निभा रहे हैं.
इसी के साथ चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर भी मेट्रो शहरों से आगे बढ़ रहा है. टियर-2 शहरों में 4,600 से अधिक सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन संचालित हो रहे हैं और केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से नीतिगत प्रोत्साहन भी लगातार मिल रहा है.
प्रधानमंत्री की अपील से EV सेक्टर को नया बूस्ट
पश्चिम एशिया संकट, ईंधन की बढ़ती कीमतों और ऊर्जा अस्थिरता के बीच प्रधानमंत्री की EV अपनाने की अपील को सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है. इससे न केवल जागरूकता बढ़ी है, बल्कि लोगों में वैकल्पिक ऊर्जा को लेकर भरोसा भी मजबूत हुआ है.
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत की EV कहानी मेट्रो शहरों से नहीं बल्कि टियर-2 और टियर-3 शहरों से लिखी जाएगी. जैसे-जैसे चार्जिंग नेटवर्क, बैटरी तकनीक और स्थानीय इकोसिस्टम मजबूत होगा, वैसे-वैसे इलेक्ट्रिक वाहन भारत की मुख्यधारा मोबिलिटी का हिस्सा बनते जाएंगे.
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