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बैंकिंग से कमाई तक: महिला CSPs कैसे बना रही हैं अपनी आर्थिक पहचान
विश्व बैंक के ग्लोबल फिनडेक्स 2025 के मुताबिक, 2024 में भारत में 89.2 फीसदी महिलाओं और 88.8 फीसदी पुरुषों के पास किसी वित्तीय संस्थान या मोबाइल मनी सेवा में खाता था. यानी खाता स्वामित्व के मामले में महिलाओं और पुरुषों के बीच अंतर लगभग खत्म हो चुका है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 hours ago
भारत में वित्तीय समावेशन की कहानी अब सिर्फ बैंक खाते खोलने तक सीमित नहीं रह गई है. खासकर ग्रामीण और छोटे कस्बों में महिलाएं अब बैंकिंग व्यवस्था की केवल ग्राहक नहीं, बल्कि उसे लोगों तक पहुंचाने वाली महत्वपूर्ण कड़ी भी बन रही हैं. ग्राहक सेवा केंद्र यानी कस्टमर सर्विस पॉइंट (CSP) के जरिए महिलाएं अपने लिए आय का जरिया तैयार करने के साथ-साथ अपने आसपास के लोगों को बैंकिंग और डिजिटल वित्तीय सेवाओं से जोड़ने का काम कर रही हैं. यह बदलाव महिलाओं की पारंपरिक घरेलू और वित्तीय भूमिका को घर की चारदीवारी से बाहर सामुदायिक स्तर तक ले जा रहा है.
वित्तीय समावेशन के आंकड़े भी इस बदलाव की व्यापक तस्वीर सामने रखते हैं. विश्व बैंक (World Bank) के ग्लोबल फिनडेक्स 2025 के मुताबिक, 2024 में भारत में 89.2 फीसदी महिलाओं और 88.8 फीसदी पुरुषों के पास किसी वित्तीय संस्थान या मोबाइल मनी सेवा में खाता था. यानी खाता स्वामित्व के मामले में महिलाओं और पुरुषों के बीच अंतर लगभग खत्म हो चुका है. हालांकि, बैंक खाता होने और उसका सक्रिय रूप से इस्तेमाल करने के बीच अभी भी अंतर मौजूद है. डिजिटल भुगतान के इस्तेमाल में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में कम है, जो वित्तीय समावेशन के अगले चरण की चुनौती को दिखाता है.
प्रधानमंत्री जन-धन योजना के तहत भी महिलाओं की बैंकिंग पहुंच में विस्तार हुआ है. 16 सितंबर 2026 तक योजना के तहत कुल 59.31 करोड़ लाभार्थी खाते थे, जिनमें 33.04 करोड़ खाते महिला लाभार्थियों के थे. ऐसे में बैंकिंग सेवाओं को स्थानीय स्तर तक पहुंचाने वाले CSPs महिलाओं के लिए आर्थिक गतिविधि और वित्तीय जागरूकता का एक नया माध्यम बन रहे हैं.
सेव ग्रुप के प्रबंध निदेशक एवं सह-संस्थापक अजीत कुमार सिंह के मुताबिक, महिला CSPs का उभरना वित्तीय समावेशन के साथ महिलाओं की बदलती आर्थिक भूमिका को भी दिखाता है. उनका कहना है कि ग्रामीण महिलाओं की भूमिका लंबे समय से परिवार की आर्थिक जरूरतों को संभालने में रही है, लेकिन अब वही जिम्मेदारी उन्हें औपचारिक वित्तीय व्यवस्था के करीब ला रही है.
अजीत कुमार सिंह के अनुसार, महिलाओं के लिए CSP मॉडल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उन्हें अपने समुदाय में बैंकिंग सेवाओं से जुड़ने और दूसरों को जोड़ने का अवसर मिलता है. स्थानीय स्तर पर काम करने वाली महिला CSPs बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच को आसान बनाने के साथ महिलाओं को अपनी आय और वित्तीय निर्णयों से जोड़ने में भी मदद कर सकती हैं.
CSP के जरिए महिलाओं की आर्थिक भूमिका में बदलाव
विभवंगल अनुकूलरा प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक सिद्धार्थ मौर्य कहते हैं, "कस्टमर सर्विस पॉइंट (CSP) ऑपरेटर के तौर पर काम करने वाली महिलाओं का उदाहरण दिखाता है कि महिलाएं फाइनेंशियल सिस्टम में अलग-अलग तरीकों से कैसे काम करती हैं. घर की जिम्मेदारियों की वजह से, ज़्यादातर महिलाओं के लिए घर के बाहर फाइनेंशियल ज़िम्मेदारियां संभालना बहुत मुश्किल होता है. लेकिन अब एक साफ़ बदलाव दिख रहा है, जिसमें महिलाएं अपनी फाइनेंशियल और दूसरी ज़िम्मेदारियों को एक साथ निभा रही हैं."
वह आगे कहते हैं, "CSP के तौर पर, महिलाएं कमाई कर सकती हैं और अपने समुदाय में बैंकिंग सेवाएँ दे सकती हैं. चूंकि इनमें से ज़्यादातर महिलाएं ग्रामीण और पिछड़े इलाकों से आती हैं, इसलिए CSP बनने से उन्हें घर में पैसे से जुड़े फ़ैसले लेने का मौका मिलता है और साथ ही उन्हें यह जानकारी भी मिलती है कि फाइनेंशियल सिस्टम और अर्थव्यवस्था कैसे काम करती है."
सिद्धार्थ मौर्य के मुताबिक, "यह साफ़ है कि महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण सिर्फ़ कमाई करने से कहीं ज़्यादा है. महिला CSPs, महिलाओं के फाइनेंशियल समावेशन और आर्थिक सशक्तिकरण को हासिल करने में निश्चित रूप से अहम भूमिका निभा रही हैं."
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में बैंक खाता रखने वाली महिलाओं की संख्या काफी बढ़ चुकी है, लेकिन डिजिटल वित्तीय सेवाओं के इस्तेमाल में अभी भी लैंगिक अंतर मौजूद है. ऐसे में स्थानीय स्तर पर काम करने वाली महिला CSPs बैंकिंग सेवाओं और उन महिलाओं के बीच संपर्क का माध्यम बन सकती हैं, जो तकनीक या औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से अभी पूरी तरह परिचित नहीं हैं.
पैसों के प्रबंधन से वित्तीय सेवा तक
पीआरपी ग्रुप की अकाउंट डायरेक्टर प्रेरणा दलाकोटी** महिलाओं की इस भूमिका को घर में निभाई जाने वाली पारंपरिक वित्तीय जिम्मेदारियों से जोड़कर देखती हैं. वह कहती हैं, "सच कहूं तो महिलाएं हमेशा से ही पैसों का हिसाब-किताब रखने में माहिर रही हैं, बस हमने कभी इसे इस नजरिए से नहीं देखा. घर में अक्सर महिला ही जानती है कि कितने पैसे बचे हैं, कौन-सा बिल पहले भरना है और महीने के अंत में जब पैसों की तंगी हो, तो कहां खर्च कम करना है. यह अपने आप में एक बड़ा हुनर है."
वह कहती हैं, "इसलिए जब मैं महिलाओं को CSP (ग्राहक सेवा केंद्र) के रूप में काम करते देखती हूं, तो यह मुझे बिल्कुल स्वाभाविक लगता है. वे अपनी कमाई कर रही हैं, अपने परिवार का सहारा बन रही हैं और आसपास के लोग भी खाता खुलवाने, पैसे जमा करने या भुगतान से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए उनके पास आते हैं."
दलाकोटी के मुताबिक, "आज जब बैंकिंग सेवाएं तेजी से मोबाइल और डिजिटल माध्यमों पर आ रही हैं, तो ये महिलाएं गांवों और कॉलोनियों में ही लोगों को ये सुविधाएं उपलब्ध करा रही हैं. खासकर उन लोगों को, जो शायद कभी बैंक की शाखा तक नहीं गए हों."
वह आगे कहती हैं, "इस बदलाव का असर उन महिलाओं के आत्मविश्वास में भी साफ दिखाई देता है. जब लोग अपने पैसों से जुड़े कामों के लिए उन पर भरोसा करते हैं और बार-बार उनके पास आते हैं, तो उनका खुद पर विश्वास और भी बढ़ता है. मेरे लिए यह कमाई जितना ही महत्वपूर्ण है. सबसे बड़ी बात यह है कि अब उनके पास अपनी कमाई है, अपनी पहचान है और कुछ ऐसा है, जिस पर वे अपना अधिकार महसूस करती हैं."
घरेलू जिम्मेदारी से सामुदायिक वित्तीय भूमिका तक
प्रेरणा दलाकोटी कहती हैं, "महिलाएं लंबे समय से परिवार की घरेलू और वित्तीय जरूरतों को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं. आज महिला CSPs के रूप में वे इस जिम्मेदारी को अपने घर की चारदीवारी से आगे बढ़ाकर पूरे समुदाय की वित्तीय जरूरतों तक ले जा रही हैं."
वह आगे कहती हैं, "एक CSP के तौर पर वे सिर्फ बैंकिंग सेवाओं को लोगों के करीब नहीं ला रहीं, बल्कि महिलाओं, बुजुर्गों और वित्तीय रूप से वंचित वर्गों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं."
उनके मुताबिक, "इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे महिलाओं की पहचान और आत्मविश्वास दोनों का विस्तार हो रहा है. जो महिलाएं पहले मुख्य रूप से अपनी घरेलू जिम्मेदारियों के लिए जानी जाती थीं, वे आज अपने समुदाय में एक भरोसेमंद वित्तीय सेवा प्रदाता और आर्थिक रूप से सक्रिय सदस्य के रूप में पहचान बना रही हैं." दलाकोटी कहती हैं, "महिला CSPs का बढ़ता योगदान वित्तीय समावेशन के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण, उद्यमिता और आर्थिक स्वतंत्रता की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है."
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