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भारत-पाक तनाव और शेयर बाजार की सुस्ती के चलते IPO योजनाओं पर लगा ब्रेक, जानें पूरी डिटेल

भारत-पाकिस्तान तनाव और शेयर बाजार की सुस्ती ने भारतीय IPO बाजार पर सीधा असर डाला है. कंपनियों को जहां अपनी योजनाओं पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है, वहीं निवेशकों के लिए यह स्थिति चिंताजनक बन गई है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

2024 की शुरुआत में तेज़ी के संकेत देने वाले भारतीय शेयर बाजार की रफ्तार अब धीमी होती दिख रही है. खासकर आईपीओ (Initial Public Offering) बाजार में यह सुस्ती साफ नजर आ रही है. नए वित्त वर्ष की शुरुआत से अब तक केवल एक ही कंपनी ने आईपीओ लाया है, वह भी बिना खास चर्चा के. वहीं, एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी बड़ी कंपनियों ने अपनी भारतीय यूनिट का आईपीओ फिलहाल टाल दिया है.

बाजार की अनिश्चितता बनी बड़ी वजह

Bain & Company और इंडियन वेंचर एंड अल्टरनेट कैपिटल एसोसिएशन (IVCA) की एक रिपोर्ट के अनुसार, शेयर बाजार की हालिया गिरावट और भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव के चलते कंपनियां अपनी सार्वजनिक सूचीबद्धता की योजनाएं टाल रही हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि IPO के जरिए निवेशकों के एक्जिट की गति भी प्रभावित हो सकती है.

निवेशकों के लिए एक्जिट यानी समय पर नकदी प्राप्त करना बेहद अहम होता है. 2024 में शेयर बाजार की तेज़ी के चलते निवेशकों को लगभग 4 अरब डॉलर की निकासी का अवसर मिला था, जो कि 2023 की तुलना में दोगुने से भी अधिक है. मगर अब बाजार की अनिश्चितता के चलते कंपनियों को उचित वैल्यूएशन नहीं मिल पा रहा है.

लिस्टिंग और वैल्यूएशन में गिरावट

हाल ही में ईवी स्टार्टअप एथर एनर्जी की लिस्टिंग इश्यू प्राइस से करीब 6% नीचे हुई, जो बाजार में मौजूदा कमजोर माहौल का संकेत देती है. वहीं, अर्बन कंपनी ने अपने ड्राफ्ट आईपीओ दस्तावेजों में प्रस्तावित राशि को 3,000 करोड़ रुपये से घटाकर 1,900 करोड़ रुपये कर दिया है.

इस बदलाव के पीछे कंपनियों की यह चिंता है कि मौजूदा अस्थिर वातावरण में बड़े साइज के आईपीओ सफल नहीं हो पाएंगे. यही कारण है कि निवेशकों के दबाव में कुछ कंपनियां वैल्यूएशन घटाने या आईपीओ का आकार छोटा करने जैसे विकल्प तलाश रही हैं.

निवेशकों की चिंता: एक्जिट कब और कैसे?

एक्सपर्ट्स के अनुसार निवेशकों के लिए एक्जिट यानी पैसे निकालना बेहद जरूरी हो गया है. लेकिन लिमिटेड पार्टनर्स (LPs) को उतनी नकदी नहीं मिल रही, जितनी उम्मीद थी." ऐसी स्थिति में कुछ फंड्स के पास एक्जिट के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है.

 


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