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BW Class: OFS क्या होता है ? ये IPO से कैसे अलग है, समझिए आसान भाषा में

जब कोई OFS आता है तो एक्सचेंज इसके लिए अलग से एक ट्रेडिंग विंडो खोलते हैं. रिटेल निवेशकों को OFS के जरिए शेयर खरीदने पर फ्लोर प्राइस पर डिस्काउंट मिलता है

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

नई दिल्ली: कंपनियों को जब पैसों की जरूरत पड़ती है तो उनके पास कई विकल्प होते हैं. वो बैंकों से कर्ज ले सकती है या फिर शेयर बाजार से पैसा उठा सकती है. जब कोई कंपनी अपनी हिस्सेदारी बेचकर पहली बार शेयर बाजार से पैसा उठाती है तो उसे IPO कहते हैं. इसके अलावा एक दूसरा तरीका भी होता है, जिसे OFFER FOR SALE या OFS कहते हैं. 

OFS क्या होता है, IPO से कैसे अलग है
आज हम आपको बताएंगे कि OFS क्या होता है और रिटेल निवेशक इसमें कैसे हिस्सा ले सकते हैं, साथ ही ये IPO से क्यों अलग होता है. 
तो सबसे पहले यही समझ लेते हैं कि IPO और OFS में क्या फर्क होता है. देखिए जब कोई कंपनी IPO लाती है तो पब्लिक से जो भी पैसा मिलता है, वो सीधा कंपनी के पास जाता है. कंपनी उस पैसे का इस्तेमाल कर्ज चुकाने या फिर अपनी विस्तार योजनाओं या किसी अन्य जरूरत को पूरा करने में करती है. दूसरी तरफ अगर OFS की बात करें तो इसमें उस कंपनी के प्रमोटर्स जो स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट है, अपनी हिस्सेदारी पब्लिक को बेचते हैं. इससे जो भी पैसा मिलता है वो प्रमोटर्स के पास ही जाता है, OFS से एक पैसा भी कंपनी को नहीं जाता, यानी कंपनी का इससे कोई फायदा नहीं होता है. 

OFS क्यों लाया जाता है
तो अब सवाल उठता है कि OFS लाया क्यों जाता है. इसकी कई वजहें हो सकती हैं. पहली वजह ये हो सकती है कि मार्केट रेगुलेटर ने प्रमोटर्स से कहा हो कि वो कंपनी में अपनी हिस्सेदारी को कम करे. इसलिए प्रमोटर अपनी हिस्सेदारी पब्लिक को बेचता है. दरअसल सेबी के नियमों के मुताबिक लिस्टिंग कंपनियों में पब्लिक शेयहोल्डिंग कम से कम 25 परसेंट होनी चाहिए, कई बार प्रमोटर्स इस मिनिमम पब्लिक शेयरहोल्डिंग को पूरा करने के लिए भी धीरे धीरे OFS के जरिए हिस्सेदारी बेचते हैं. कई बार प्रमोटर्स अपनी पर्सनल जरूरतों को पूरा करने के लिए भी OFS लाते हैं और पैसे जुटाते हैं. 

OFS में निवेश कैसे होता है
अगर आप OFS में हिस्सा लेना चाहते हैं तो आपके पास डीमैट अकाउंट और ट्रेडिंग अकाउंट होना चाहिए. जब कोई OFS आता है तो एक्सचेंज इसके लिए अलग से एक ट्रेडिंग विंडो खोलते हैं. जहां पर कोई निवेशक ऑनलाइन हिस्सा ले सकते हैं. OFS जब लाया जाता है तो इसकी दो कैटेगरी होती हैं. पहली कैटेगरी HNIs, NII के लिए होती है जिसमें कम से कम 2 लाख रुपये तक की बिड लगानी होती है, दूसरी कैटेगरी रिटेल निवेशकों की होती है, जिसमें 2 लाख रुपये से नीचे की बिड लगाई जा सकती है. OFS इन दोनों कैटेगरी में 1-1 दिन के लिए खुला होता है. IPO में जैसे प्राइस बैंड होता है, OFS में सिर्फ एक फ्लोर प्राइस होता है, जिसके ऊपर बिड लगानी होती है. जब OFS बंद हो जाता है तो कंपनी एक कटऑफ प्राइस जारी करती है. इसके ऊपर जितने भी निवेशकों ने बोली लगाई होती है उन्हें शेयर अलॉट कर दिए जाते हैं. ये शेयर निवेशकों के डीमैट अकाउंट में T+2 दिन में आ जाते हैं. अगर आप ऑफलाइन तरीके से OFS में हिस्सा लेना चाहते हैं तो डीलर के जरिए ऐसा कर सकते हैं. 

OFS लाने के फायदे 
डिस्काउंट पर शेयर 
रिटेल निवेशकों को OFS के जरिए शेयर खरीदने पर फ्लोर प्राइस पर डिस्काउंट मिलता है, जो कि करीब 5 परसेंट होता है. OFS के जरिए शेयर खरीदने का रिटेल निवेशकों को यही सबसे बड़ा फायदा है कि उन्हें बाकियों के मुकाबले शेयर सस्ते में मिल जाता है.  

पेपरवर्क से राहत 
OFS का पूरा काम डिजिटल होता है, बोली लगाने की प्रक्रिया एक बिडिंग प्लेटफॉर्म के जरिए होती है. इसलिए पेपरवर्क नहीं के बराबर होता है. इसलिए OFS एक बेहद आसान और कम वक्त लेने वाली प्रक्रिया है

कम लागत 
जब OFS के जरिए बोली लगाते हैं तो कोई अतिरिक्त चार्ज नहीं लगता है सिर्फ रेगुलर STT ही देना होता है. इसलिए OFS एक कम लागत वाला इक्विटी निवेश बन जाता है

OFS के लिए SEBI के नियम 
a). OFS में मार्केट कैपिटलाइजेशन के हिसाब से टॉप 200 कंपनियों के प्रमोटर्स ही अपना हिस्सा बेच सकते हैं.
b). नॉन प्रमोटर शेयरहोल्डर्स जिनकी हिस्सेदारी 10 परसेंट से ज्यादा है वो भी OFS के जरिए शेयर बेच सकते हैं 
c). OFS लाने वाली कंपनी को कम से कम दो दिन पहले मार्केट रेगुलेटर  SEBI को सूचित करना होगा
d). कम से कम 25% OFS का हिस्सा म्यूचुअल फंड्स और बीमा कंपनियों के लिए रिजर्व रखना होगा 
e). SEBI के नियमों के मुताबिक OFS में 10% हिस्सा रिटेल निवेशकों के लिए रिजर्व करना होगा 
 


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