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क्या होता है IPO का ग्रे-मार्केट प्रीमियम! क्या ये गैर-कानूनी है, समझिए आसान भाषा में

सबसे बड़ा खतरा तो ये है कि ये सेबी के दायरे में नहीं आता है, इसमें सबकुछ जुबानी होता है कुछ भी कॉन्ट्रैक्ट लिखित में नहीं होता है. इसलिए कब कोई मुकर जाए, इसका खतरा हमेशा बना रहता है

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

मुंबई: जब भी कोई IPO बाजार में आता है, तो एक शब्द सुनने में आता है ग्रे-मार्केट (Grey-Market), इसे लेकर लोगों में बहुत कन्फ्यूजन रहता है. पहली शंका तो यही है कि इसमें Grey शब्द आता है, तो क्या ये अवैध या गैर-कानूनी है. क्या इसमें ट्रेडिंग करने पर सजा हो जाएगी. इसके अलावा ये ग्रे-मार्केट प्रीमियम क्या होता है. चलिए समझते हैं

क्या होता है IPO ग्रे-मार्केट  

शेयर बाजार में जो ट्रेडिंग होती है उसकी निगरानी मार्केट रेगुलेटर सेबी करता है, इसे White Market कहते हैं, क्योंकि ये कानून के दायरे में होता है. दूसरी तरफ कुछ बिजनेस काले धंधे या Black Market होते हैं, जो कानून की नजर में गलत होते हैं, जैसे कोई चीज स्मगलिंग या चोरी करके बेची जाए. लेकिन इन सबके बीच में एक ग्रे एरिया होता है, जो न तो  White Market के दायरे में आता है और न Black Market के दायरे में, यानी न तो वो कानूनी है और न ही गैर-कानूनी. बस वो रेगुलेटेड नहीं है. ठीक ऐसे ही होते हैं IPO ग्रे मार्केट, जिसमें शेयरों की ट्रेडिंग तो होती है, लेकिन उन पर सेबी के नियम लागू नहीं होते. सेबी के नियम लिस्टेड कंपनियों पर ही लागू होते हैं, लेकिन अगर कोई IPO लिस्ट ही नहीं हुआ तो उस पर सेबी के नियम लागू नहीं हो सकते. 

IPO ग्रे-मार्केट कैसे काम करता है 
आमतौर पर IPO मार्केट तब एक्टिव होता है जब कोई कंपनी अपना IPO लाने का ऐलान करती है और उसका प्राइस बैंड तय करती है. प्राइस बैंड तय होने और लिस्टिंग के बीच में करीब 10-12 दिन का वक्त होता है, इस अवधि के दौरान भी ग्रे मार्केट में शेयरों की ट्रेडिंग शुरू हो जाती है, भले ही IPO शेयर मार्केट में लिस्ट न हुआ हो. इस दौरान IPO एप्लीकेशन को खरीदा या बेचा जाता है, अगर किसी को शेयर अलॉट हो जाते हैं तो भी उन शेयरों को एडवांस में ही खरीदा और बेचा जाता है. इसको ऐसे समझिए कि इसमें कोई सेलर IPO अलॉटमेंट के लिए एप्लीकेशन देता है, तो दूसरी ओर कोई खरीदार इश्यू की लिस्टिंग से पहले ही इश्यू प्राइस से ज्यादा पैसे देकर उन शेयरों को खरीदना चाहता है. ये सौदा बीच में मौजूद एक डीलर करवाता है. डीलर सेलर से कॉन्टैक्ट करके उन शेयरों को प्रीमियम पर ग्रे मार्केट में बेचने को कहता है. अगर सेलर लिस्टिंग के खतरे को मोल नहीं लेना चाहता और एक फिक्स मुनाफा कमाकर निकल जाना चाहता है तो वो शेयरों को एक फिक्स्ड अमाउंट पर ग्रे मार्केट में बेचने के लिए राजी हो जाता है. इसके बाद डीलर बायर को ये बताता है कि उसने शेयरों को सेलर से खरीद लिया है. ये शेयर बायर को ट्रांसफर कर दिए जाते हैं. अब इसके बाद बायर की मर्जी कि लिस्टिंग के बाद वो उन शेयरों को रखता है या बेच देता है. 

लोग ग्रे मार्केट में ट्रेड क्यों करते हैं 
जब कोई IPO बाजार में आने वाला होता है तो लोगों में उसे लेकर काफी उत्सुकता रहती है, खासतौर पर तब जब कोई बड़ा IPO आता है. जैसे कि मान लीजिए कि Paytm का IPO. लोगों को लगता है कि अगर ये इश्यू बाजार में आएगा तो काफी अच्छा लिस्ट होगा, तो क्यों न इसे लिस्टिंग से पहले ब्लॉक करके रख लिया जाए. मान लीजिए कि शेयर का इश्यू प्राइस 1000 रुपये है और उसे ग्रे मार्केट में 20 रुपये प्रति शेयर के प्रीमियम पर खरीदा गया और शेयर 40 रुपये के प्रीमियम पर लिस्ट हुआ है तो निवेशक को 20 रुपये प्रति शेयर का फायदा हो जाएगा. 

ग्रे-मार्केट के खतरे 
सबसे बड़ा खतरा तो ये है कि ये सेबी के दायरे में नहीं आता है, इसमें सबकुछ जुबानी होता है कुछ भी कॉन्ट्रैक्ट लिखित में नहीं होता है. इसलिए कब कोई मुकर जाए, इसका खतरा हमेशा बना रहता है. हालांकि सेलर और बायर के बीच में हमेशा एक डीलर होता है जो ये दोनों के बीच में इस डील को कराता है और ये सुनिश्चित कराता है कि किसी भी तरह की गड़बड़ी न हो पाए.

क्या होता है ग्रे-मार्केट प्रीमियम
ग्रे मार्केट का पूरा कामकाज ही प्रीमियम की धुरी पर घूमता है. इसे समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं. मान लीजिए किसी कंपनी ABC ने अपना IPO लाने का ऐलान किया, इश्यू प्राइस तय किया 1000 रुपये, 15 शेयरों का लॉट है. 

ग्रे मार्केट का कोई खरीदार इसे 300 रुपये ज्यादा देकर पर भी लेने को राजी है, उसे लगता है कि ये करीब 1600 रुपये प्रति शेयर के ऊपर ही लिस्ट होगा, इसलिए उसे कम से कम 300 रुपये प्रति शेयर का फायदा हो जाएगा. ऐसे में वो खरीदार किसी विक्रेता से 300 रुपये के प्रीमियम पर शेयर खरीदने की डील कर लेता है. इसमें विक्रेता को एक लॉट पर 300X15 यानी 4500 रुपये का फिक्स प्रॉफिट मिल जाता है. जब भी शेयर लिस्ट होगा विक्रेता को 15 शेयर खरीदार को ट्रांसफर करने होंगे. ऐसे में जो ग्रे मार्केट प्रीमियम होगा वो 300 रुपये होगा. मगर विक्रेता को ये लगता है कि इश्यू की लिस्टिंग काफी अच्छी हो सकती है और 300 रुपये का प्रीमियम कम है, इसे 500 रुपये होना चाहिए तो यहीं से शुरू होता है डिमांड और सप्लाई का खेल, और तय होता है ग्रे मार्केट का प्रीमियम.

ग्रे-मार्केट के मायने
अंत में अगर कहा जाए तो ग्रे मार्केट और कुछ नहीं बल्कि एक संकेत होता है कि कोई शेयर लिस्ट होने के बाद कैसा परफॉर्म करेगा. भले ही ग्रे मार्केट आधिकारिक नहीं है, लेकिन गैर-कानूनी भी नहीं है.

VIDEO: कभी 1 रुपये का था इस कंपनी का शेयर, आज निवेश करने वाले बन गए करोड़पति

 


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