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डिविडेंड क्या होता है, कैसे मिलता है, जानिए बिल्कुल आसान भाषा में

कंपनी जो भी डिविडेंड जारी करती है वो फेस वैल्यू पर होता है. फेस वैल्यू किसी भी शेयर की एक नॉमिनल वैल्यू होती है, जो कुछ खास मौकों को छोड़ दें तो कभी नहीं बदलती.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

डिविडेंड क्या होता है
हर कंपनी मुनाफा कमाने के लिए काम करती है. कई कंपनियां अपने मुनाफे में अपने शेयरहोल्डर्स को भी हिस्सेदारी मानती हैं, ऐसे में जब कोई कंपनी साल भर में कमाए गए अपने मुनाफे का कुछ हिस्सा शेयरहोल्डर्स में बांटती है तो उसे ही डिविडेंड कहते हैं. हालांकि कई बार ऐसे भी होता है कि कंपनियां मुनाफे की बजाय सरप्लस कैश से भी शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड बांटती हैं. 

क्या हर कंपनी देती है डिविडेंड
कंपनियों के लिए डिविडेंड देना जरूरी नहीं होता है, क्योंकि इससे कंपनियों को कुछ हासिल नहीं होता, सिवाय शेयरहोल्डर्स की खुशी और भरोसे के. इसलिए कंपनी चाहे तो वो अपने मुनाफे में से एक भी पैसा शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड के रूप में न दे. अक्सर देखा गया है कि छोटी-छोटी कंपनियां या जिन्होंने अभी अभी अपना काम शुरू किया है वो कंपनियों डिविडेंड नहीं देती हैं. क्योंकि वो अपने मुनाफे को शेयरहोल्डर्स को देने की बजाय वापस बिजनेस के विस्तार और ग्रोथ में लगा देती हैं. जो कंपनियां डिविडेंड देती हैं वो आमतौर पर पूरी तरह से स्थापित और बड़ी कंपनियां होती हैं, लेकिन हर बड़ी कंपनी डिविडेंड दे ये भी जरूरी नहीं. 

कैसे मिलता है डिविडेंड
कंपनी जो भी डिविडेंड जारी करती है वो फेस वैल्यू पर होता है. फेस वैल्यू किसी भी शेयर की एक नॉमिनल वैल्यू होती है, जो कुछ खास मौकों को छोड़ दें तो कभी नहीं बदलती. डिविडेंड कैसे मिलता है जरा इसको समझते हैं. मान लीजिए कोई कंपनी है XYZ, इसके एक शेयर की कीमत है 2000 रुपये. डिविडेंड के लिए फेस वैल्यू है 10 रुपये है. कंपनी ने अगर 400 परसेंट का डिविडेंड घोषित किया है तो डिविडेंड होगा फेस वैल्यू का 400 परसेंट  यानी 40 रुपये. 

डिविडेंड यील्ड क्या होता है
कोई कंपनी शेयर की मार्केट प्राइस की तुलना कितना डिविडेंड दे रही है, उसे डिविडेंड यील्ड कहते हैं. इसका इस्तेमाल ये पता करने में होता है कि किसी कंपनी में कितना ज्यादा डिविडेंड दिया है. 

जैसे राम की कंपनी A ने 40 रुपये का डिविडेंड दिया और श्याम की कंपनी B ने भी 40 रुपये का डिविडेंड दिया, लेकिन मार्केट प्राइस के हिसाब से किसने ज्यादा डिविडेंड दिया, ये पता करना होगा. मान लीजिए A का शेयर प्राइस 1000 रुपये है और B का शेयर प्राइस 2000 रुपये है. 

डिविडेंड यील्ड    (A)   =        डिविडेंड/शेयर
                                       ------------------------
                                         मार्केट प्राइस/शेयर 
           =              40
                      ---------X100  
                         1000  

          =          4%    

इसी तरह डिविडेंड यील्ड    (B) =     40
                      -------------X100     = 2%
                        2000

यानी राम की कंपनी A ने शेयर प्राइस के मुकाबले 4 परसेंट डिविडेंड दिया और श्याम की कंपनी B ने शेयर प्राइस के मुकाबले 2 परसेंट डिविडेंड दिया. मतलब A ने ज्यादा डिविडेंड दिया. 
 
डिविडेंड देन की प्रक्रिया 
किसको डिविडेंड देना है, कितना डिविडेंड देना है और कब देना, इसका फैसला कंपनी का बोर्ड अपनी सालाना AGM बैठक में करता है. इस पूरी प्रक्रिया को क्रमवार तरीके से समझते हैं 

रिकॉर्ड डेट
जब कंपनी अपने शेयरहोल्डर्स के नामों की लिस्ट देखती है और उनमें उन नामों को छांटकर अलग करती है जो डिविडेंड के पात्र हैं. उस दिन को रिकॉर्ड डेट कहते हैं. कंपनी इस दिन ये बताती है कि वो कितने परसेंट का डिविडेंड देने वाली है. इस खबर से शेयर की कीमतों में उछाल आने की उम्मीद रहती है. 

एक्स डेट 
अगर चाहते हैं कि आपको भी डिविडेंड मिले, यही सोचकर आप उस कंपनी के शेयर खरीद लेते हैं जिस दिन कंपनी डिविडेंड का ऐलान करती है तो आपको डिविडेंड नहीं मिलेगा. इसके लिए आपको डिविडेंड की एक्स डेट से पहले शेयर खरीदने होंगे. एक्स डेट रिकॉर्ड डेट के दो कारोबारी दिन पहले की तारीख होती है. भारत में T+2 के आधार पर यानी सौदे के दो दिन बाद सेटेलमेंट होता है, मतलब ये कि अगर आपको डिविडेंड चाहिए तो आपको शेयर एक्स डिविडेंड डेट के पहले खरीदना होता है. 

डिविडेंड पे आउट डे 
ये वो दिन होता है जब शेयरधारकों को डिविडेंड का भुगतान किया जाता है.

अंतरिम और फाइनल डिविडेंड
कंपनियां डिविडेंड को वित्त वर्ष के दौरान कभी भी भी दे सकती हैं. अगर डिविडेंड साल के बीच में दिया गया तो उसे अंतरिम डिविडेंड कहते हैं और अगर साल के अंत में दिया गया तो फाइनल डिविडेंड कहा जाता है. 

 


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