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बॉन्ड क्या होता हैं, बॉन्ड यील्ड क्या होती है, समझिए आसान भाषा में

बॉन्ड सरकार और कंपनियां दोनों ही जारी करती है. जब सरकार किसी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के लिए पैसे जुटाने के लिए बॉन्ड जारी करती है तो उसे गवर्नमेंट बॉन्ड कहते हैं,

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

जब निवेश करने की बात आती है तो लोग अपनी रिस्क लेने की क्षमता के हिसाब से अलग अलग असेट क्लास में पैसा लगाते हैं. जो रिस्क लेने की क्षमता रखते हैं और ज्यादा रिटर्न चाहते हैं वो इक्विटी मार्केट में निवेश करते हैं, लेकिन जो लोग रिस्क नहीं लेना चाहते हैं वो डेट स्कीम्स जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट वगैरह में निवेश करते हैं. लेकिन इसमें रिटर्न काफी कम होता है. ऐसे में बॉन्ड एक ऐसा निवेश विकल्प बन जाता है जिसमें एफडी से ज्यादा रिटर्न मिलता है, लेकिन रिस्क भी कम होता है, और हर साल आपको एक फिक्स्ड इनकम मिलती रहती है, तो क्या होता है बॉन्ड और इसमें कैसे निवेश करते हैं. चलिए समझते हैं. 

बॉन्ड क्या होता है ?
जब हम बॉन्ड की बात करते हैं तो हमें लगता है कि हम किसी नई और ऐसी चीज के बारे में बात कर रहे हैं जो ज्यादा प्रचलित नहीं है, इसलिए अनसुना करके आगे बढ़ जाते हैं. ये सच है कि बॉन्ड को लेकर भारत में अभी उतनी जागरूकता नहीं है, भारत में आज भी बहुत कम लोग बॉन्ड में निवेश करते हैं, लेकिन अमेरिका, चीन और  यूरोपीय देशों में बॉन्ड मार्केट काफी बड़ा है. अमेरिका में तो इक्विटी मार्केट से बड़ा बॉन्ड मार्केट है.

तो आखिर क्या होता है बॉन्ड पहले इसे समझते हैं. जब किसी कंपनी को विस्तार करने या किसी अन्य काम के लिए पैसों की जरूरत होती है तो वो कई तरीके से पैसे जुटा सकती है. जैसे वो बैंक से लोन सकती है, लेकिन लोन पर उसे भारी ब्याज चुकाना पड़ता है. दूसरा रास्ता है कि वो शेयर मार्केट में अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचकर पैसा जुटा सकती है, लेकिन ऐसे में कंपनी की शेयरहोल्डिंग कम हो जाएगी, हो सकता है कंपनी ये न करना चाहे. और तीसरा रास्ता होता है कि वो बॉन्ड जारी करके लोगों या वित्तीय संस्थानों से पैसा जुटा ले, इस पर उसे कम ब्याज भी देना पड़ता है. 

गवर्नमेंट बॉन्ड और कॉर्पोरेट बॉन्ड
बॉन्ड सरकार और कंपनियां दोनों ही जारी करती है. जब सरकार किसी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट जैसे सड़क, एयरपोर्ट, हाई वे बनाने का प्लान करती है तो उसके लिए उसे पैसों की जरूरत होती है, कई बार वो पैसे जुटाने के लिए बॉन्ड जारी करती है तो उसे गवर्नमेंट बॉन्ड कहते हैं, इसमें ब्याज कम और रिस्क भी कम होता है, और जब कोई कंपनी बॉन्ड जारी करती है तो उसे कॉर्पोरेट बॉन्ड कहते हैं, इसमें रिस्क और रिटर्न दोनों ही ज्यादा होते हैं. ऐसा इसलिए कि कोई कंपनी दिवालिया या बर्बाद हो गई तो आपको पैसे देने की हालत में नहीं भी हो सकती है लेकिन सरकार बुरी से बुरी स्थिति में आपको आपका पैसा देती है. 

मान लीजिए आपको पास 10,000 रुपये पड़े हैं, आप इस पैसे को निवेश करना चाहते हैं, लेकिन आप रिस्क नहीं लेना चाहते और रिटर्न भी डेट से बढ़िया चाहते हैं. तो आपने सरकार की ओर से जारी किस बॉन्ड में उस पैसे को डाल दिया. जब आप सरकार को 10,000 रुपये देते हैं, तो सरकार आपको एक सर्टिफिकेट देती है, जिस पर लिखा होता है कि सरकार आपको हर साल एक फिक्स्ड रिटर्न देगी, मान लीजिए सरकार कहती है कि वो आपको 10 परसेंट रिटर्न देगी मतलब आपको हर साल 1000 रुपये ब्याज के तौर पर मिलेगा. सर्टिफिकेट में स्कीम की अवधि का भी जिक्र होता है. इस सर्टिफिकेट को ही बॉन्ड कहते हैं. दूसरी भाषा में अगर कहें तो बॉन्ड और कुछ नहीं एक Investor की ओर से दिया गया Borrower को एक लोन है, जिस पर उसे एक तय इनकम मिलती रहती है. मतलब जब आप सरकार की किसी बॉन्ड स्कीम में निवेश करते हैं तो आप सरकार को एक तरीके से लोन देते हैं, और सरकार आपको उसके बदले ब्याज देती है. बॉन्ड दुनिया भर की सरकारें जारी करती हैं. आमतौर भारत में गवर्नमेंट बॉन्ड को G-Sec कहा जाता है, यानी गवर्नमेंट सिक्योरिटीज, अमेरिका में इसे ट्रेजरी बिल्स बोलते हैं और ब्रिटेन में Gilts कहा जाता है. 

बॉन्ड यील्ड क्या होती है
जैसा कि ऊपर उदाहरण में बताया गया कि अगर आप सरकारी बॉन्ड में 10,000 रुपये निवेश करते हैं और सरकार 1000 रुपये यानी 10 परसेंट हर साल ब्याज आपको दे रही है तो ये 10 परसेंट रिटर्न ही बॉन्ड यील्ड कहलाता है. बॉन्ड यील्ड फिक्स्ड नहीं होता है, ये बॉन्ड की प्राइस के हिसाब से घटता बढ़ता रहता है. हालांकि सरकार आपको फिक्स्ड रिटर्न ही देती है, ऐसा कैसे होता है अब जरा इसको समझते हैं. 

कूपन पेमेंट क्या होता है, समझिए

बॉन्ड यील्ड को समझने के लिए पहले कूपन पेमेंट को समझना होगा. मान लीजिए सरकार ने 100 रुपये का बॉन्ड 10 साल के लिए 10 परसेंट ब्याज पर जारी किया है. मान लीजिए आपने ये बॉन्ड खरीद लिया. तो सरकार आपको एक सर्टिफिकेट देगी, जिसमें 10 कूपन लगे होंगे. हर साल आप इसमें से एक कूपन फाड़ेंगे और सरकार को दे देंगे, सरकार आपको फिक्स्ड 10 परसेंट रिटर्न यानी 10 रुपये आपको दे देगी, ऐसा आप 10 साल तक करते रहेंगे. इसे ही कूपन पेमेंट सिस्टम कहते हैं. 10 साल के बाद आप पूरा बॉन्ड सरकार को देंगे और सरकार आपके जमा किए हुए 100 रुपये भी वापस कर देगी 

बॉन्ड यील्ड ऊपर नीचे कैसे होती है. दरअसल जब इकोनॉमी की स्थिति खराब होती है और शेयर बाजार में गिरावट का दौर चलता है तो लोगों को लगता है कि बाजार में उनका निवेश सुरक्षित नहीं है तो वो सुरक्षित निवेश की तलाश में रहते हैं, तो उन्हें बॉन्ड मार्केट रिस्क फ्री लगता है, क्योंकि उसमें के तय रिटर्न तो मिलना ही है. ऐसे में सरकारी बॉन्ड की डिमांड अचानक से बढ़ जाती है, ऐसे में बॉन्ड के दाम भी बढ़ जाते हैं. 

मान लीजिए आपके पास जो 100 रुपये के बॉन्ड थे उसके दाम बढ़कर 110 रुपये हो गए, तो आपने इसे अपने दोस्त को 110 रुपये में बेच दिए. लेकिन याद रखिएगा कि सरकार 10 रुपये का ही फिक्स्ड ब्याज दे रही है, आपके दोस्त के पास जो बॉन्ड है वो 110 रुपये में है, तो उसे 11 रुपये हर साल ब्याज मिलना चाहिए, लेकिन यहां एक पेंच और है कि ये 10 परसेंट या 10 रुपये का फिक्स्ड ब्याज 100 रुपये पर ही मिलेगा न कि 110 रुपये पर. मतलब आपके दोस्त को मिलने वाला रिटर्न यानी बॉन्ड यील्ड कम हो गई. 

अब इसके ठीक उलट, मान लीजिए देश की इकोनॉमी एकदम तेज रफ्तार में चल रही है, शेयर बाजार भी पूरे बूम पर है, तो कोई भी निवेशक शेयर बाजार की तेजी का फायदा उठाना चाहेगा. ऐसे में बॉन्ड की डिमांड कम हो जाएगी और उसकी कीमत भी गिर जाएगी. मान लीजिए आपने 100 रुपये का बॉन्ड 90 रुपये में अपने दोस्त को बेच दिया. ऐसे में आपको 90 रुपये के बॉन्ड पर हर साल 10 रुपये का रिटर्न मिलेगा, रिटर्न 10 परसेंट से ज्यादा है. यानी बॉन्ड यील्ड बढ़ जाएगी. 

तो इससे एक चीज समझ आती है कि बॉन्ड की कीमत और बॉन्ड यील्ड में विपरीत रिश्ता होता है. जब बॉन्ड की कीमत बढ़ती है तो बॉन्ड यील्ड घट जाती है और जब बॉन्ड की कीमत घटती है तो बॉन्ड यील्ड बढ़ जाती है. 


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