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BW Class: CRR, SLR क्या होता है, इससे बैंकों को क्या फर्क पड़ता है, समझिए आसान भाषा में

रिजर्व बैंक की जिम्मेदारी होती है कि वो महंगाई और ग्रोथ के बीच संतुलन बनाए, इसके लिए वो कई तरह के कदम उठाता है, CRR, SLR भी उन्हीं में से एक है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

जब देश में महंगाई बढ़ जाती है तो रिजर्व बैंक ब्याज दरों को बढ़ाकर महंगाई को नियंत्रित करता है, लेकिन इससे ग्रोथ में धीमापन आ जाता है. ऐसे में रिजर्व बैंक ग्रोथ और महंगाई में संतुलन बनाने के लिए कुछ कदम उठाता है. हमने आपको रिजर्व बैंक की सीरीज में बताया कि रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट क्या होता है. आज हम आपको बताएंगे कि CRR- Cash Reserve Ratio और SLR - Statutory Liquidity Ratio क्या होते हैं. इसका इस्तेमाल रिजर्व बैंक कब और कैसे करता है. 

CRR क्या होता है?
हमने आपको बताया है कि कोई भी बैंक कैसे काम करता है. बैंक के पास डिपॉजिट आते हैं, जिनपर वो लोगों और संस्थाओं को ब्याज देता है और उन पैसों को लोन पर देकर ब्याज कमाता है. 

जो पैसा लोग और कंपनिया, सरकारी संस्थाएं बैंकों के पास जमा करती हैं उसे NDTL कहते हैं यानी Net Demand and Time Liability. इसका क्या मतलब होता है, इसको ऐसे समझिए कि आम लोग अपना पैसा बैंकों के पास बचत खाते या करंट अकाउंट में रखते हैं, ये पैसा ऑन डिमांड वो कभी भी निकाल सकते हैं, इसी तरह कुछ पैसा बैंकों के पास होता है जो उन्हें एक तय अवधि के बाद देना होता है जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट उसे Time Liability कहते हैं. इन दोनों चीजों को मिलाकर 
NDTL कहा जाता है.

मान लीजिए किसी बैंक का NDTL 100 रुपये है. तो क्या बैंक इस पूरे पैसे को लोन पर दे सकता है, जी नहीं, क्योंकि इसमें से 4.50 रुपये वो अपने पास रखवा लेता है, इसे ही कैश रिजर्व रेश्यो यानी CRR कहा जाता है, जो कि इस समय 4.5% है. ये पैसा बैंकों के पास ही एक अलग से सेफ्टी वॉल्ट में रखा जाता है जिस पर रिजर्व बैंक का अधिकार और नियंत्रण होता है. इस CRR के पैसे को बैंक लोन के रूप में नहीं दे सकता है और न ही इस पैसे पर बैंकों को रिजर्व बैंक की तरफ से कोई ब्याज मिलता है. यानी लोन के लिए बैंकों के पास अब कुल रकम बची 100-4.5 = 95.5 रुपये

SLR क्या होता है?
RBI बैंकों से कहता है कि NDTL का 18 परसेंट पैसा वो अपने पास ही लिक्विड के रूप में रखे, इसे SLR कहा जाता है. लिक्विड असेट्स का मतलब हुआ कैश, गोल्ड या फिर सरकारी बॉन्ड्स के रूप में. अब रिजर्व बैंक ऐसा करता क्यों है? दरअसल, किसी संकट में जब बैंकों को पैसों की जरूरत होती है तो वो इसी SLR के पैसे का इस्तेमाल करते हैं. बैंकों के लिए ये एक तरह के सुरक्षा कवच का काम करता है, उन्हें संकट की घड़ी में बर्बाद होने से बचाता है. जैसे लोग बुरे दिनों के लिए अपने घरों में सोना या फिर कैश छिपाकर रखते हैं, ताकि कभी जरूरत आ पड़े तो काम चल जाए. अब 95.5- 18 = 77.5 रुपये बैंकों के पास लोन देने के लिए बचेंगे. 

जैसा कि हमने बताया कि CRR में रिजर्व बैंक से बैंकों को कोई ब्याज आय नहीं होती है, इसलिए बैंक हमेशा चाहते हैं कि CRR कम ही रहे, ताकि ज्यादा से ज्यादा रकम को वो लोन पर देकर ब्याज कमा सकें. लेकिन SLR में RBI बैंकों को ब्याज देता है. क्योंकि बॉन्ड्स या कोई भी गवर्नमेंट सिक्योरिटी खरीदने पर बैंकों को ब्याज मिलता ही है, तो इसे लेकर बैंक ज्यादा दिक्कत में नहीं आते हैं. इन दोनों टूल्स CRR, SLR के जरिए रिजर्व बैंक बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी को संतुलित करता है. 

बैंक अगर CRR, SLR मेनटेन नहीं करें 
अगर कोई बैंक CRR, SLR को रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार मेनटेन नहीं करता है तो क्या होगा? ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक उस बैंक पर पेनाल्टी लगाएगा. जैसे मान लीजिए कि SLR को 18 रुपये रखना है लेकिन बैंक ने 16 रुपये ही मेनटेन रखा तो उस 2 रुपये की कमी पर  बैंक रेट + 3% का ब्याज पेनाल्टी के रूप में देना होगा. ये एक दिन के डिफॉल्ट पर पेनाल्टी है, अगर बैंक इसके बाद भी डिफॉल्ट करता है तो उस पर 5 परसेंट के हिसाब से पेनाल्टी लगेगी. 


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