होम / ऐड वर्ल्ड / एक बार फिर बजा भारत का डंका, लंदन में हुआ 'जय-जयकार'
एक बार फिर बजा भारत का डंका, लंदन में हुआ 'जय-जयकार'
1 जून से 30 जून तक पूरे लंदन में विभिन्न स्थानों पर आयोजित किया गया उत्सव.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
नई दिल्ली: लंदन यूरोप का सबसे बड़ा वास्तुकला उत्सव (लंदन फेस्टिवल ऑफ आर्किटेक्चर) मनाता है, जिसमें भारत को पहली बार आमंत्रित किया गया था. जिसमें भारतीय स्थापत्य हुनर को वैश्विक मंच पर पहचान मिली है जो भारत के लिए एक गर्व का विषय है.
लंदन फेस्टिवल ऑफ आर्किटेक्चर यूरोप का सबसे बड़ा आर्किटेक्चर फेस्टिवल है जहां दुनियाभर के आर्किटेक्ट क्षेत्र के ख्याति प्राप्त वास्तुकार अपने विचार साझा करने और दुनिया में वास्तुकला क्षेत्र में किए जा रहे प्रयत्नों और उपलब्धियों को साझा करने लिए एकत्रित होते हैं. इस वर्ष यह उत्सव 1 जून से 30 जून तक पूरे लंदन में विभिन्न स्थानों पर आयोजित किया गया.
भारत लौटकर दीक्षू सी कुकरेजा ने जताई खुशी, कहा देश के लिए बड़ी उपलब्धि
स्थापत्य क्षेत्र में कौशलता दिखाने के लिए लंदन फेस्टिवल ऑफ आर्किटेक्चर के प्रतिष्ठित मंच पर भारत को पहली बार बुलाया किया गया था. इस कार्यक्रम में भारत का प्रतिनिधित्व विश्व विख्यात अरबन प्लानर और CP Kukreja Architects के मैनेजिंग डायरेक्टर, दीक्षू सी कुकरेजा ने किया. इस कार्यक्रम में श्री दीक्षू सी कुकरेजा ने "निर्मित पर्यावरण के 50 वर्ष" विषय पर एक प्रदर्शनी आयोजित की, जिसमें उन्होंने पिछले पांच दशकों से भारतीय वास्तुकला और डिजाइन की गई उत्कृष्ट संरचनाओं के विकास के बारे में बताया.
यह प्रदर्शनी 24 जून 2022 को ललित होटल लंदन में आयोजित की गई. प्रदर्शनी में प्रख्यात लेखक और नेहरू सेंटर, लंदन के निदेशक श्री अमीश त्रिपाठी और लंदन फेस्टिवल ऑफ आर्किटेक्चर की निदेशक सुश्री रोजा रोगिना सहित अन्य उल्लेखनीय गणमान्यों की गरिमामयी उपस्थिति रही. इस कार्यक्रम में भारत को पहली बार अपनी स्थापत्य संरचनाओं को प्रदर्शित करने के लिए आमंत्रित किए जाने पर श्री कुकरेजा ने बताया, “यह देखकर मुझे बेहद खुशी हो रही है कि समकालीन भारतीय वास्तुकला को विश्व स्तर पर भलीभांति स्वीकार्य किया जा रहा है. यह बेहद सुकून देने वाली बात है. यह मामला केवल इमारतें बनाने तक सीमित नहीं हैं बल्कि, हमारी इमारतें समाज को कैसे प्रभावित कर रही हैं यह मामला इस बात से भी जुड़ा हुआ है."
प्राचीन वास्तुकला से लेकर मुगल वास्तुकला तक भारतीय स्थापत्य कला को हमेशा इसकी श्रेष्ठता के लिए सराहा गया है और हमेशा उच्च कोटि में रखा गया है. फिर भारत स्वतंत्रता संग्राम के बाद हमारा देश इस मामले में पिछड़ गया. औपनिवेशिक शासनकाल के दौरान बनाए गए वास्तुकला को ज्यादातर ब्रिटिश वास्तुकारों द्वारा डिजाइन किया गया था जिसमें भारतीय वास्तुकारों के योगदान को ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई. साथ ही, उस दौर की स्थापत्य संरचनाओं को भारतीय परिवेश के अनुसार "प्रासंगिक" नहीं बनाया गया था.
अर्थव्यवस्था को संयोजने की जिम्मेदारी और संसाधनों की कमी की वजह से भारत स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वास्तुशिल्पकला पर उतना जोर नहीं दे पाया लेकिन 1970 के दशक से स्थापत्य सरंचनाओं को तत्कालीन नए युग के वास्तुकारों की वजह से एक नई दिशा मिली, लेकिन फिर भी भारतीय स्थापत्य वैश्विक मान्यता से वंचित ही रहा.
यूरोप के सबसे बड़े वास्तुकला उत्सव में पहले भारतीय प्रतिनिधि होने पर श्री कुकरेजा ने बताया, "लंदन के इस वास्तुकला उत्सव में सीपी कुकरेजा आर्किटेक्ट्स के कार्यों के माध्यम से भारतीय वास्तुकला को प्रदर्शित करने का यह मौका न केवल भारत को वैश्वविक परिदृश्य पर एक नई पहचान दिलाएगा है बल्कि वास्तुकला और बुनियादी ढांचे के विकास के पैमाने पर भी हमारे देश में विदेशी निवेश के अवसर बढ़ाने के लिए दुनिया के नए लोगों का ध्यान आर्किषण करेगा. यह प्रदर्शनी भारत में शहरी विकास के पैमाने और अवसरों को बढ़ाना देने के लिए एक बड़ी उपलब्धि को दर्शाती है जो दुनिया के लिए भारत में बेहतर निवेश के ठिकाने के रूप में एक उम्मीद पैदा करेगी.
प्रदर्शनी में श्री कुकरेजा ने 1970 और 80 के दशक की ऐतिहासिक इमारतों के बारे में भी बताया, जिन्होंने भारत को स्थापत्य के क्षेत्र में एक नई पहचान दिलाने में खासा योगदान दिया है. इसके अलावा, उन्होंने अन्वेषी और अनुसंधान परियोजनाओं के माध्यम से 1990 और 2000 के वास्तुशिल्प संरचनाओं पर प्रकाश डाला, जिसने प्रयोगात्मक उत्साह को उजागर किया और पुरानी प्रथा को तोड़ दिया- जिससे आर्थिक उदारीकरण के नए युग में सामग्री और प्रौद्योगिकी के मामले में अंतहीन संभावनाओं की शुरुआत की.
21वीं सदी में हुए परिवर्तन पर बात करते हुए, श्री कुकरेजा ने स्थानीय संदर्भ के साथ अत्याधुनिक पद्धति और स्थिरता के मामले में भारतीय वास्तुकला के क्षेत्र में समकालीन नई पद्धतियों के बारे में भी बताया. श्री अमीश त्रिपाठी ने इस मौके पर बताया कि, "जब मैंने इन परियोजनाओं को देखा, तो पाया कि किस तरह से इन्होनें अपनी परियोजनाओं को डिजाइन करने के लिए स्थानीय सामग्रियों और स्थानीय परंपराओं का उपयोग किया है, इससे हम सभी को सीखना चाहिए."
सीपी कुकरेजा आर्किटेक्ट्स की वह परियोजनाएं जिन्हें प्रदर्शनी में दिखाया गया:
- इंडिया इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर, नई दिल्ली
- अम्बादीप टावर्स, नई दिल्ली.
- पाथवेज वर्ल्ड स्कूल, गुरुग्राम
- करमापा अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध संस्थान, नई दिल्ली.
- गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी, ग्रेटर नोएडा
- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
- पूर्वी दिल्ली हब, नई दिल्ली
- वल्लभ भवन एक्सटेंशन, भोपाल, मध्य प्रदेश
- द ललित होटल, कैनाकोना, भारत
- सेंट्रल विस्टा, नई दिल्ली के पुनर्विकास के लिए प्रस्ताव
टैग्स