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ट्रम्प के दौर की कूटनीति

संयुक्त राष्ट्र महासभा ऐतिहासिक रूप से कभी किसी राष्ट्राध्यक्ष के लिए अन्य विश्व नेताओं को फटकारने या अपने पूर्ववर्तियों की घरेलू नीतियों की आलोचना करने का मंच नहीं रहा है, लेकिन ट्रम्प के आठ महीने के कार्यकाल को देखते हुए यह आश्चर्यजनक नहीं था कि उन्होंने ऐसा किया

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

लेखिका: सानिया कुलकर्णी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र में दिया गया भाषण विश्व राजनीति में एक यादगार क्षण था, यह कहना गलत नहीं होगा. संयुक्त राष्ट्र की आलोचना करते हुए कि यह “किसी भी समस्या का समाधान” नहीं कर सका है से लेकर यूरोपीय देशों को उनकी हरित ऊर्जा और आप्रवासन पर रुख के कारण “नरक में जा रहे” बताने तक, राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में बिल्कुल भी शब्दों को नहीं तोला.

संयुक्त राष्ट्र महासभा ऐतिहासिक रूप से कभी किसी राष्ट्राध्यक्ष के लिए अन्य विश्व नेताओं को फटकारने या अपने पूर्ववर्तियों की घरेलू नीतियों की आलोचना करने का मंच नहीं रहा है, लेकिन ट्रम्प के आठ महीने के कार्यकाल को देखते हुए यह आश्चर्यजनक नहीं था कि उन्होंने ऐसा किया. विश्लेषकों का कहना है कि लगभग एक घंटे लंबे भाषण में विदेश नीति पर कम और घरेलू राजनीतिक आधार को संबोधित करने जैसी बातें अधिक थीं. प्रवासियों पर “विशाल आक्रमण” को रोकने, अमेरिका को “दुनिया का सबसे गर्म देश” बताने और अपनी आर्थिक नीतियों की डींग मारने जैसी बातें एक चुनावी रैली के भाषण जैसी ही लग रही थीं. यह बहुत अलग नहीं था जे.डी. वेंस के म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में दिए गए भाषण से, जहाँ उन्होंने यूरोपीय नेताओं पर “यूरोप के पतन” को लेकर तीखा हमला बोला था.

यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि ट्रम्प प्रशासन ने विश्व राजनीति के पुनर्गठन में बड़ी भूमिका निभाई है, जिसे कई अमेरिकी सहयोगियों और भागीदारों पर लगाए गए शुल्कों ने और तेज कर दिया. भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों में आई खटास भी वाशिंगटन की अप्रत्याशित विदेश नीति का सीधा परिणाम थी. भारत पारंपरिक रूप से अमेरिका का एक महत्वपूर्ण मित्र रहा है, खासकर इंडो-पैसिफिक में चीन के बढ़ते प्रभुत्व को संतुलित करने की कोशिश में. हालांकि, रूस से तेल खरीदना जारी रखने पर भारत पर ट्रम्प द्वारा लगाए गए हालिया दंडात्मक शुल्क ने दशकों से बनाए गए विश्वास और मित्रता को चोट पहुँचाई है.

भारत और चीन दोनों का ट्रम्प के संयुक्त राष्ट्र भाषण में “रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रमुख वित्तपोषक” के रूप में उल्लेख हुआ, हालांकि उन्होंने नाटो देशों को भी “खुद के खिलाफ युद्ध को वित्तपोषित” करने के लिए दोषी ठहराया.

अब पहले से कहीं ज्यादा, ट्रम्प का दुनिया के साथ बातचीत करने का तरीका यह सवाल खड़ा करता है कि क्या आज भी पारंपरिक कूटनीति जिंदा है या फिर राज्यों के कूटनीति करने के तरीकों में बुनियादी बदलाव हो रहा है. मूल रूप से, ट्रम्प की विदेश नीति अब भी काफी हद तक उनके कारोबारी नजरिए को दर्शाती है और उनकी कूटनीति का तरीका सीधा उनकी ‘आर्ट ऑफ द डील’ की सोच जैसा है. संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संस्थानों में उनका अविश्वास विश्व व्यवस्था के प्रति उनके दृष्टिकोण को साफ दिखाता है. नाटो की आलोचना न करने का एकमात्र समय वह था जब उन्होंने रक्षा खर्च बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताने वाले सदस्यों की प्रशंसा की, जिसे अमेरिका के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को “अधिक न्यायसंगत” बनाने के एक और प्रयास के रूप में देखा जा सकता है.

अमेरिकी प्रभुत्व में आई गिरावट एक खंडित दुनिया को जन्म दे रही है, जिसमें कई शक्ति केंद्र उभर रहे हैं. भारत के पास अब पहले से कहीं ज्यादा वजह है कि वह अपनी रणनीतिक हेजिंग नीति पर कायम रहे. अगस्त के अंत में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के लिए पीएम मोदी की चीन यात्रा भारत की स्वायत्तता दिखाने का मंच बनी. जहाँ रूस-भारत-चीन (आरआईसी) त्रिपक्षीय सहयोग अभी केवल हित-आधारित संरेखण है, न कि अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी क्रम का कोई विकल्प, वहीं यह भारत के लिए रणनीतिक पुनर्संरेखण प्रदर्शित करने का अवसर है. अंततः, भारत का अमेरिका के साथ ट्रम्प प्रशासन से कहीं अधिक मेल है, और भले ही अस्थायी खटास मुश्किल हो, आगे का रास्ता जितना संभावनाओं से भरा है, उतना ही अनिश्चित भी.

अगर डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में कोई एक बात निश्चित कही जा सकती है, तो वह है उनकी अनिश्चितता. जिस नई कूटनीति की नींव वह रख रहे हैं, वह लेन-देन आधारित और आख्यानों व दिखावे पर भारी निर्भर लगती है. पुनर्गठन के इस दौर में सतर्क नेविगेशन और हित-आधारित संरेखण बनाए रखते हुए साझेदारियों को अलग-थलग किए बिना आगे बढ़ना शायद वही रास्ता है जो बहु-संकटों वाली इस दुनिया में टिके रहने की संभावना को सुनिश्चित कर सकता है.


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