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भारत में आटा हुआ महंगा, पूरे विश्व में हो गई है बड़ी कमी, करना पड़ेगा मार्च तक इंतजार

मई में 10.6 करोड़ टन के कम उत्पादन के बीच गेहूं के निर्यात पर रोक लगा दी थी,

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

नई दिल्लीः एक तरफ जहां भारत में आटे की कीमतों में बहुत ज्यादा तेजी देखने को मिली है, वहीं पूरी दुनिया के विकसित और विकासशील देशों में भी आटे का संकट पैदा हो गया है. इस वजह से लोगों को रोटी नहीं मिल पा रही है. वहीं लोगों को अब मैदा या चावल के आटे से बनी रोटी खाकर के जीवन यापन करना पड़ रहा है. यूक्रेन संकट और तेजी से गंभीर मौसम की घटनाएं दुनिया की गेहूं आपूर्ति पर भारी दबाव डाल रही हैं. इससे हर जगह अनाज के उत्पादन पर खतरा मंडरा रहा है. सबसे पहले बात करते हैं विश्व में क्यों आटे की कमी हो गई है और इससे कौन-कौन से देश प्रभावित हैं.

इन देशों में गेहूं की कमी सबसे ज्यादा

संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम सहित खाड़ी देशों व ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड जैसे देशों में गेहूं की कमी हो गई है. मक्का और सोयाबीन के बाद गेहूं दुनिया की तीसरी सबसे लोकप्रिय फसल है.सिर्फ तीन देशों के पास दुनिया का गेहूं भंडार है. लेकिन वे दुनिया के गेहूं निर्यात का लगभग 68% हिस्सा हैं. दुनिया के सबसे कमजोर और अविकसित राष्ट्रों में से कुछ अपने गेहूं की आपूर्ति के आधे से अधिक के लिए इन तीन देशों पर निर्भर हैं. 

संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया में गेहूं का भंडार पहले ही खत्म हो चुका है. रूस या यूक्रेन से गेहूं खरीदने में असमर्थ देश विकल्प तलाश रहे हैं. उच्च मांग और एकाधिकार की संभावना के कारण गेहूं उत्पादक देश दबाव में हैं.

रूस-यूक्रेन में पैदा होता है सबसे ज्यादा गेहूं

अत्यधिक प्रतिस्पर्धी वैश्विक गेहूं बाजार में रूस और यूक्रेन प्रमुख खिलाड़ी हैं. इन दोनों देशों का विश्व के गेहूं निर्यात में 30% से भी कम हिस्सा है. उन्हें आमतौर पर दुनिया के अधिकांश लोगों के लिए ब्रेडबास्केट के रूप में जाना जाता है. उनके द्वारा उत्पादित अधिकांश गेहूं उत्तरी अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया को भेजा जाता है. शीर्ष आयातक मिस्र, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, तुर्की और यमन हैं. इसके अतिरिक्त, 2020 में विश्व खाद्य कार्यक्रम द्वारा खरीदी गई कुल खाद्य वस्तुओं का 20% रूस और यूक्रेन से आया, जो अविकसित देशों में वैश्विक खाद्य सुरक्षा को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण सहायता करता है.

भारत में भी घट गई गेहूं की उपलब्धता

भारत में भी इस साल गर्मी के जल्दी आने से गेहूं की पैदावार पर असर पड़ा था. इस कारण सरकार ने भी गेहूं और उसके आटे के निर्यात पर बैन लगा दिया था. गेहूं के आटे की औसत खुदरा कीमत पिछले एक साल में 17 फीसदी बढकर चावल और चीनी के आस-पास आ गई है. फिलहाल चावल की कीमत 37.96 रुपये प्रति किलो जबकि चीनी की कीमत 42.69 रुपये प्रति किलो है.

36 रुपये के पार गया औसत मूल्य

उपभोक्ता मंत्रालय से प्राप्त आंकडों के मुताबिक, बुधवार को गेहूं के आटे का औसत खुदरा मूल्य 36.98 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज किया गया जो पिछले साल के इसी अवधि के 31.47 रुपये प्रति किलो के मुकाबले 17.51 फीसदी ज्यादा है.

आरबीआई ने भी किया था उल्लेख

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास के भाषण में भी अनाज की कीमतों में वृद्धि का उल्लेख किया गया था. उन्होंने कहा था कि खाद्य पदार्थों की महंगाई का मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. महंगाई के दबाव के मद्देनजर केंद्र सरकार ने बुधवार को पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) को दिसंबर तक बढ़ा दिया है. इस बीच, खाद्य मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) के पास राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) की जरूरतों को पूरा करने के लिए अनाज का पर्याप्त भंडारण है.

मध्य वर्ग है परेशान, 2500 रुपये प्रति क्विंटल के पार कीमत

दिल्ली के थोक बाजारों के व्यापारियों के अनुसार, कम आपूर्ति और मजबूत मांग के कारण गेहूं की कीमतों में रिकॉर्ड 2,570 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है. दिल्ली के व्यापारियों की राय है कि जहां गेहूं की कीमतों में लगभग 14-15% की वृद्धि दर्ज की गई है, वहीं आटे की कीमतों में लगभग 18-19% की वृद्धि हुई है.

सरकार के प्रयास फेल

इस साल मई में 10.6 करोड़ टन के कम उत्पादन के बीच गेहूं के निर्यात पर रोक लगा दी थी, जब 6 महीनों (अप्रैल-सितंबर के बीच) में वास्तविक शिपमेंट पिछले साल की तुलना में दोगुना हो गया था. इसके बाद भी आ गेहूं के दाम बढ़ते रहे हैं.

गेंहू-सरसों की बुवाई सबसे अधिक

साल 2022 के लिए रबी फसल की बुवाई के आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ है कि भारतीय किसानों ने मसूर और दालों की तुलना में गेहूं-चावल की बुवाई अधिक की है. अनियमित मॉनसून के बावजूद रबी की कुल बुवाई पिछले साल से 7 प्रतिशत अधिक है. इसमें भी गेहूं बुआई में करीब 15 फीसदी की बढ़ोतरी है. इससे सरकार को कुछ राहत मिल सकती है, क्योंकि कोविड काल के दौरान भारत के बफर स्टॉक में पिछले साल के मुकाबले 49.9 फीसदी की गिरावट आई है.

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