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आखिर कब तक कर पाएंगे हम लीथियम का इस्‍तेमाल, जानिए पूरी प्रक्रिया

क्‍या आप जानते हैं कि जब कभी भी जमीन के नीचे कोई मिनरल मिलता है तो उसके इस्‍तेमाल करने तक कितनी तरह की जांच की जाती हैं आज अपने इस आर्टिकल में हम आपको यही बताने जा रहे हैं.

ललित नारायण कांडपाल 3 years ago

जम्मू कश्मीर के रियासी जिले में जब से लिथियम का बड़ा भंडार मिला है, तब से ये पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। देश में ऐसा पहली बार हुआ है, लीथियम जैसी कीमती धातु हमारे देश में मिली है। इसकी भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने इसकी पहचान भी कर ली है. लिथियम धातु इसलिए बेहद महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि माना जाता है कि भविष्‍य में ये कई देशों की अर्थव्‍यवस्‍था में एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहा है. आज अपने इस आर्टिकल में हम आपको ये बताने जा रहे हैं कि जब कभी भी देश में कहीं ऐसी कीमती धातु मिलती है तो उसके बाद उसे किस किस तरह की जांच और प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ेगा. सबसे महत्‍वपूर्ण ये है कि हम इसका इस्‍तेमाल कब से कर पाएंगे। इसी को लेकर आज हम आपकेा पूरी जानकारी देने जा रहे हैं.


जम्‍मू कश्‍मीर के रियासी में मिला है भंडार 
आज जब पूरी दुनिया इलेक्ट्रिक वेहकिल से लेकर दूसरे संसाधनों के साथ आगे बढने की तैयारी कर रही है तो ऐसे में भारत को जम्‍मू कश्‍मीर राज्‍य में वो धातु मिली है जिसके लिए आज तक हम पूरी दुनिया पर निर्भर थे. ये लीथियम वहीं धातु है जिसे आपके और हमारे इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी में इस्‍तेमाल किया जाता है. GSI द्वारा ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि जम्मू कश्मीर के रियासी जिले में मिलने वाला लिथियम करीबन 5.9 मिलियन टन का है, भारत के लिए यह एक अच्छी बात है क्योंकि चाहे मोबाइल फोन हो या सोलर पैनल महत्वपूर्ण खनिजों की हर जगह की आवश्यकता होती है और लिथियम उनमें से एक है. लीथियम एक अलोहा धातु है जो मोबाइल फोन, लैपटॉप, डिजिटल कैमरा, और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए रिचार्जेबल बैटरी में यूज किया जाता है. इसके अलावा इससे खिलौनों और घड़ियों को भी बनाया जाता है. हमारा देश हमेशा से ही लिथियम के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहता है.


आख्रिर क्‍या होती है इस्‍तेमाल की प्रक्रिया 
दिल्‍ली यूनिवर्सिटी में जियोलॉजी के प्रोफेसर रहे और मौजूदा समय में के आर मंगलम यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर के पद पर तैनात प्रो सीएस दूबे बताते हैं कि सबसे पहले ये देखा जाता है कि आखिर इसकी मात्रा कितनी है, क्‍या इसे जमीन से निकाला जा सकता है या नहीं निकाला जा सकता है. इसके बाद ये भी देखा जाता है कि अगर उसे निकाला जाए तो निकालने वाली कंपनी को कुछ फायदा होगा भी या नहीं. 
इसके बाद उस भंडार की वैज्ञानिक विधि से जांच जाती है कि उसमें कौन सी धातु कितनी मात्रा में है. इसके बाद उस पूरे भंडारण का एस्‍टीमेशन किया जाता है कि आखिर इसकी कॉस्‍ट क्‍या बैठने जा रही है. इसकी जांच सर्फर सॉफ्टवेयर  या टाटा माइन सॉफ्टवेयर के जरिए जांच की जाती है. उसके बाद उसका वॉल्‍यूम भी निकाला जाता है. उसके बाद जब ये लगता है कि लागत से ज्‍यादा हासिल हो सकता है तभी इसे पूरे प्लॉन के साथ निकाला जाता है. उसके बाद उसकी प्रोसेसिंग की जाती है, जिससे उसका मिनरल प्‍योर फॉर्म में मिल सके.

आखिर इस प्रोसेस में लगता है कितना समय 
प्रो सीएस दूबे बताते हैं कि अगर कहीं पर कोई मिनरल मिलता है तो ऐसे में उसको जमीन से निकालने की प्रक्रिया में 2 से 3 साल तक का समय लगता है. वो कहते हैं कि अगर आज जम्‍मू कश्‍मीर में लीथियम मिला है तो उसे बाहर निकालने की पूरी प्रक्रिया में तीन साल लग जाएंगे.


 


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