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पश्चिम बंगाल की ‘पंडाल पॉलिटिक्स’ और ‘शरदोत्सव’

समाज जीवन के प्रत्येक आयाम में राजनीति और पार्टी के एजेंडे की स्थापना हेतु कृतसंकल्पित वामपंथी ही पूजा समितियों के राजनीतिकरण के सूत्रधार रहे हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • विप्लव विकास

पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा विख्यात है. सांस्कृतिक पर्यटकों, संस्कृति कर्मियों और स्थानीय नागरिकों की दुर्गा पूजा की प्रतीक्षा के समापन की शुभ सूचना 'खूंटी पूजा' से ही हो जाती है. इन पूजा पंडालों के मुख्य कर्ताधर्ता पूजा समितियां और स्थानीय 'क्लब' होते हैं. पश्चिम बंगाल में ऐसी लगभग 40,092 पंजीकृत दुर्गा पूजा समितियां हैं तथा कोलकाता में इनकी संख्या 2000 से अधिक है. इतनी बड़ी संख्या वालीं ये पूजा समितियां राजनीतिक दलों की दृष्टि में उस क्षेत्र विशेष में अपनी शक्ति और वर्चस्व की स्थापना का केंद्र होती हैं.

वामपंथियों की भूमिका
समाज जीवन के प्रत्येक आयाम में राजनीति और पार्टी के एजेंडे की स्थापना हेतु कृतसंकल्पित वामपंथी ही पूजा समितियों के राजनीतिकरण के सूत्रधार रहे हैं. इन पूजा समितियों को वामपंथियों ने अपने दल के प्रखंड तथा वार्ड स्तर की समितियों की तरह अपने मतदाताओं से वार्षिक संपर्क के माध्यम के रूप में पुनर्विकसित कर काम लिया. 1964 में वामपंथियों ने दुर्गा पूजा को वृहद जनसंपर्क का माध्यम बनाया तथा वामपंथी साहित्य के विक्रय और नए-नए युवकों को कामरेड बनाने की रणनीति अपनाई. पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन स्थापित होने के पश्चात 90 के दशक के प्रारंभ से ही दुर्गा पूजा की पारंपरिकता से इतर 'थीम पूजो' के प्रचलन को बढ़ावा दिया, जिसका उत्स निकट इतिहास में 1959 के जगत मुखर्जी पार्क के पूजा पंडाल से माना जाता है. धीरे-धीरे बड़े और प्रभावी पूजा पंडालों के दुर्गा पूजा में माता भगवती की पूजा गौण हो गई और गर्भ गृह में स्थित दुर्गा की प्रतिमा एक प्रतीक के रूप में व्यवहृत होने लगी. पूजा समितियों के माध्यम से पूजा पंडालों में राजनीति का स्वाभाविक प्रवेश और प्रभाव दिखने लगा.

बड़े मुद्दों पर थीम पंडाल
24 दिसंबर 1999 के कांधार विमान अपहरण को सन् 2000 में कोलकाता में एक 'थीम पूजो' के रूप में दिखाया गया, जिसमें मां दुर्गा को सपरिवार अपहृत दिखाया गया. इसी वर्ष रूस के कुर्स्क पनडुब्बी दुर्घटना पर एक पंडाल थीम बनाया गया, तो राजीव गांधी की हत्या और 1991 का खाड़ी युद्ध भी पंडाल का थीम बना. ममता बनर्जी के जमीन अधिग्रहण के विरुद्ध सिंगुर और नंदीग्राम का आंदोलन, NRC का विरोध, CAA का विरोध, इसके साथ ही कोरोना काल में मजदूरों को घर लौटने के दौरान हुई परेशानियों पर भी केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए थीम बनाया गया. 2021 में एनआरसी वाली थीम में तो मां दुर्गा को अपने बच्चों सहित डिटेंशन कैंप में बंदी दिखाया गया और उसे सरकार ने 'विश्व बांग्ला शारद सम्मान 2021' से सम्मानित किया. 2000 से ज्यादा पूजा पंडालों में ये थीम ही चयनकर्ताओं को सर्वश्रेष्ठ लगी! चयनकर्ताओं की समिति भी सत्ताधारी दल के एजेंडे से इतर कला, शिल्प और प्रस्तुति में इससे अच्छी 'थीम पूजा पंडाल' नहीं देख पाई. राजनीति ने संस्कृति, परंपरा और कला तीनों को दबा दिया. बेलियाघाटा में जिस भाजपा-कर्मी अभिजीत सरकार की पोस्ट पोल वायलेंस में हत्या कर दी गई थी, उनके द्वारा प्रारंभ की गई दुर्गा पूजा का इस वर्ष का थीम 'पोस्ट पोल वायलेंस' है. कोलकाता के प्रसिद्ध 'संतोष मित्रो स्क्वायर' की पूजा थीम आजादी का अमृत महोत्सव है. इसकी समिति में भाजपा नेता हैं. दुर्गा-सप्तमी को पुलिस ने वहां पर्यटकों का प्रवेश रोक दिया. रास्ते बंद कर दिए गए.

दुर्गा पूजा से 'शरदोत्सव' 
ऐतिहासिक नगरों के वास्तविक नामों के आधार पर पुन:नामकरण का पुरजोर विरोध करने वाले वामपंथियों ने अपनी सरकार के समय पश्चिम बंगाल की पहचान दुर्गा पूजा की परंपरा को ही केवल विकृत तथा उसका राजनीतिकरण नहीं किया अपितु सरकारी अधिसूचनाओं में दुर्गा पूजा के स्थान पर 'शरदोत्सव' का प्रयोग कर सरकारी स्तर पर नाम परिवर्तन किया. बंगाली समाज में धीरे-धीरे शरदोत्सव इतना प्रचलित हो गया कि आज किसी बड़े पूजा पंडाल में असली दुर्गा पूजा एक कोने में होती है, जहां किसी आगंतुक की दृष्टि भी सही से नहीं पड़ती. सभी थीम वाली प्रतिकात्मक दुर्गा मूर्ति के साथ 'सेल्फी' लेने और पंडाल की साज सज्जा देख कर दूसरे पंडाल की ओर बढ़ जाते हैं.

करोड़ों का होता है बजट
पूंजीवाद के प्रचारित विरोधियों ने 'शरदोत्सव' में 'कार्पोरेट फंडिंग' की परंपरा प्रारंभ की. पूजा समितियों को सरकारी विभागों के द्वारा भी बड़ी राशि सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के नाम पर दी जाती है. चिंतनीय विषय यह भी है कि जिन पूजा समितियों का बजट करोड़ों रुपए होता है उन्हें भी सरकार 60000 अनुदान देती है! कारण? सत्ताधारी दल के साथ ये प्रभावी समितियां जुड़ी रहेंगी तथा समाज को भी यह पता होगा कि ये सरकार द्वारा 'संरक्षित' पूजा है. ये समितियां भी अपनी सरकार तथा अपने दल के प्रति निष्ठा प्रमाणित करने के लिए दुर्गा पूजा की परंपरा का अतिक्रमण कर ममता बनर्जी को 'दशभुजा' बनाकर वास्तविक दुर्गा प्रतिमा के स्थान पर प्रतिष्ठित करती हैं. उनकी सरकारी योजनाएं उनके दस हाथों में सुसज्जित होती हैं. पंडाल के बाहर पोस्टर, बैनर, पुस्तक, लीफलेट और उद्घोष सभी सरकार और सत्तारूढ़ दल के एजेंडे के अनुसार होता है. भीड़ जुटाने की जुगत लगाई जाती है. स्थानीय मीडिया के मित्रों को सक्रिय किया जाता है. सभी बड़े पूजा पंडाल का उद्घाटन मुख्यमंत्री द्वारा किया जाता है. थोड़े छोटे बैनर वाले पूजा पंडालों के उद्घाटन में सत्तापक्ष के सांसद-विधायक जाएंगे। जिन पूजा समितियों के प्रधान सरकार के मंत्री,विधायक और नेतागण हैं उनकी भव्यता देखते बनती है। शिक्षा घोटाले में काराबंदी पार्थ चटर्जी भी दक्षिण कोलकाता के एक पूजा समिति के प्रधान रहे हैं.

'ऐसा न होता तो अच्छा होता'
दुर्गापूजा हिन्दू समाज और विशेषकर पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए आस्था और अपनी सांस्कृतिक पहचान का विषय है. इससे सभी भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं. जो लोग कोलकाता से बाहर दिल्ली, बंगलुरु या अमेरिका में हैं और वे यहां आ नहीं पाते उन्होंने वहीं पर सार्वजनिक दुर्गा पूजा करनी प्रारंभ कर दी है. पश्चिम बंगाल छूटा पर बंगाली समाज ने 'बारोआरी पूजा' नहीं छोड़ी. इतना गहरा संबंध है.‌ इसी भावनात्मक लगाव का लाभ लेने के लिए राजनीतिक दल पूजा समितियों पर वर्चस्व स्थापित करते हैं. समाज का राजनीतिकरण किसी भी समाज के विकास और उसकी परंपराओं के स्वस्थ निर्वहन के लिए हानिकारक होता है. वामपंथियों ने जो समाज और संस्कृति का राजनीतिकरण प्रारंभ किया, वर्तमान सरकार उसे और आगे बढ़ा रही है. यह पश्चिम बंगाल जैसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले समाज के लिए ख़तरनाक है. राजनीतिशास्त्री विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि पश्चिम बंगाल एक राजनीतिक समाज है, जहां लोग खाते-पीते-सांस लेते हुए राजनीति करते हैं. ऐसे में उम्मीद है कि राज्य के सबसे बड़े त्योहार का भी राजनीतिकरण किया ही जाएगा. यह राजनीतिकरण न होता तो अच्छा होता.

(डिस्क्लेमर: लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.)


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