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समझिए इस गणित को:ऋषि सुनक, ब्रिटेन और भारत

क्या सुनक के प्रधानमंत्री बनने से भारत को कोई फायदा होगा, या भारतवासियों को कोई लाभ मिलेगा?

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

इंग्लैंड/अनुरंजन झा: ब्रिटेन में नया प्रधानमंत्री चुना जाना है और उसकी रेस में अब बस दो ही नाम बचे हैं, इन दो नामों में एक नाम है भारतवंशी ऋषि सुनक का। साथ ही ऋषि अभी अपने प्रतिद्वंद्वी लिज ट्रस से काफी आगे चल रहे हैं। लिज बोरिस जॉनसन की सरकार में विदेश मंत्री हैं और उसी सरकार में ऋषि सुनक वित्त मंत्री रहे हैं। अब सारी दुनिया की नजर सुनक पर टिकी है, क्या ब्रिटेन की बागडोर इस बार कोई भारतीय मूल का व्यक्ति संभालेगा, क्या ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कोई हिन्दू विराजेगा? ये सारे सवाल न सिर्फ भारतीयों और खासकर भारतीय हिन्दुओं के मन में उमड़ रहे हैं बल्कि दुनिया भर के देश इस पर नजर गड़ाए हैं। आइए जरा इस गणित को समझने की कोशिश करते हैं। ऋषि सुनक के रेस में आगे बढ़ने के साथ ही एक नैरेटिव गढ़ा जाने लगा कि क्या सुनक के प्रधानमंत्री बनने से भारत को कोई फायदा होगा, या भारतवासियों को कोई लाभ मिलेगा? इसके जवाब में ज्यादातर विश्लेषकों और बुद्धिजीवियों ने ना कहा। फिर ये बातें होने लगीं कि अगर भारतीयों को कोई लाभ नहीं मिलेगा तो भारत या भारतीय इसमें इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं, और भारतीयों को क्या खुश होने की वाकई जरूरत है? ब्रिटेन का प्रधानमंत्री कोई बने हमें क्या लेना-देना। दरअसल मामला इतना सीधा भी नहीं है कि इसे एक वाक्य में कहा जा सके कि हमें कोई फर्क नहीं पड़ता । सुनक अगर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनते हैं तो इस मुद्दे के दोनों पहलुओं को देखना होगा। पहली बात ये कि वो ब्रिटिशर हैं, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनेंगे तो ब्रिटेन उनकी सबसे बड़ी और पहली प्राथमिकता होगी जो कि होनी भी चाहिए और अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो ब्रितानियों को उन्हें नहीं चुनना चाहिए। भारत ने विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी से दूर रखा ये सारी दुनिया जानती है जबकि उनके बनने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं थी। ऐसे में ब्रिटेन ने अब तक जिस तरह से ऋषि सुनक को सपोर्ट किया है वो निश्चित तौर पर ब्रिटेन की समावेशी राजनीति का परिणाम है। दूसरी तरफ ये भी सच है कि सुनक को ब्रिटेन की गद्दी तक पहुंचाने में परोक्ष रूप से ही सही भारत की सबसे बड़ी भूमिका है। सुनक इंफोसिस के फाउंडर नारायण मूर्ति के दामाद हैं और अपने टीवी डिबेट में सुनक ने ये साफ भी किया है कि इस बात को लेकर वो गर्व भी महसूस करते हैं कि उनकी सास के बचाए हुए पैसे से उनके ससुर ने दुनिया की चंद ईमानदार कंपनियों में से एक इंफोसिस खड़ा कर दिया, जिसके बैनर में ब्रिटेन में भी हजारों लोग काम करते हैं। 

सुनक खुद भले ही तीसरी पीढ़ी के भारतवंशी हैं जो ब्रिटेन की गद्दी के करीब हैं लेकिन अब भारत से उनके मजबूत संबंधों का चक्र पीछे की ओर मुड़ा है और उनके बच्चे दूसरी पीढ़ी के कहे जाएंगे क्योंकि सुनक की पत्नी, उनके बच्चों की मां भारत में जन्मी, पली-बढ़ी और काफी समय तक भारतीय नागरिक रहीं। ऐसे में सुनक का भारत प्रेम बस नाम का नहीं रह जाएगा। दूसरा पहलू ये है कि जिस को समझना सबसे ज्यादा जरूरी है कि आखिर किन हालातों में बोरिस जॉनसन ने सुनक को वित्त मंत्री बनाया था। ब्रेग्जिट के बाद पाकिस्तानी मूल के वित्त मंत्री साजिद जाविद को हटाकर बोरिस जॉनसन ने वो कुर्सी एक भारतवंशी को दी थी, जाहिर है उसकी सबसे बड़ी वजह भारत के बाजार पर नजर थी। एक पाकिस्तानी मूल के मंत्री को अहम पद पर रखकर मौजूदा भारत सरकार से बेहतर व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध ब्रिटेन बना पाता इसमें उसे संदेह रहा होगा तभी साजिद जाविद की जगह ऋषि सुनक को ब्रिटेन का चांसलर बनाया गया। साथ ही आज ये स्पष्ट है कि भारत को ब्रिटेन या यूरोप का कोई भी देश नजरअंदाज नहीं कर सकता। ऐसे में सुनक जब प्रधानमंत्री बनेंगे तब भारत के साथ संबंधों को और बेहतर बनाने पर निस्संदेह जोर होगा और ये कहना अतिशयोक्ति नहीं कि सुनक के ब्रिटिश प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत-ब्रिटेन के संबंधों की एक नई इबारत लिखी जाएगी। 

अगर भारतवासी ये सोच रहे हों कि सुनक अपने नागरिकों के हितों को दरकिनार करते हुए भारतीय नागरिकों को सुविधाएं देंगे तो ऐसा सोचना हास्यास्पद ही तो है लेकिन जैसे ही इस घेरे से बाहर निकल वैश्विक पटल पर संबंधों की बारीकी पर नजर डालेंगे तो लगेगा कि ये भारत के लिए बहुत बेहतर होगा। साथ ही इसको ऐसे भी समझा जाना चाहिए सुनक ब्रिटेन के 200 सबसे बड़े रईसों में शुमार हैं। यानी उनकी संपत्ति उनका व्यापार आज भी ब्रिटेन में उन्हें एक अलग पहचान दिलाता है वो कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहेंगे जिससे उन्हें उनके लोगों के बीच किसी भी किस्म की समस्या का सामना करना पड़े या जवाब देना पड़े। अगर भारतीय ये सोचते हैं कि सुनक के प्रधानमंत्री बनते ही ब्रिटेन उनका दूसरा घर हो जाएगा या फिर भारत के इशारों पर ब्रिटेन काम करेगा तो ऐसा कुछ नहीं होगा लेकिन अगर आप ये सोचते हैं कि आने वाली भारतीय पीढ़ियों को ब्रिटेन में तवज्जो मिलेगी और एक अलग नजर से देखा जाएगा तो ये शायद ये होने जा रहा है। धीरे धीरे ये भागीदारी और बढ़ेगी फिर दोनों देशों के संबंध और मजबूत होंगे। अंतरराष्ट्रीय पटल पर बेहतर संबंधों का काफी लाभ मिलेगा, G-7, G-20 देशों का ढांचा बदलेगा और भारत को इनकार कर पाना आसान नहीं होगा। लेकिन इसमें कोई ऐसी चीज नहीं है कि रातों रात हो जाए और जब रातों रात वाले फायदे के पैमाने पर सुनक को रखेंगे तो आप जरुर निराश होंगे। आज अमेरिका में अगर भारत का महत्व बढ़ा है तो साफ साफ दिखता है कि उनकी राजनीति में भारतीयों का दखल पिछले कुछ दशक में बढ़ा है, भारत में रह रहे लोगों को उनकी मजबूती से तुरंत का लाभ नहीं मिला लेकिन आज भारत के अपने फैसले का विरोध करने की स्थिति में अमेरिका भी नहीं है। जाहिर है कि ये रातों रात नहीं हुआ इसलिए भारतीयों को बजाए ये नकारात्मकता फैलाने के ऋषि सुनक के ब्रिटिश प्रधानमंत्री बनने से हमें कोई लाभ नहीं मिलेगा ये सोचना चाहिए कि ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने से ब्रिटेन का प्रधानमंत्री मंदिर जाने वाला होगा, प्रधानमंत्री निवास के अंदर-बाहर दीवाली की दीए जलाए जाएँगे। होली के रंग बिखरे जाएँगे। ऐसा हम इसलिए बता रहे हैं कि ये सारे काम ऋषि सुनक अपने घर परिवार के साथ आज भी करते हैं। एक चिंता है जो वाजिब है कि भारतीय मीडिया अगर सुनक का साथ देती है तो उसे ब्रिटशर्स कैसे लेंगे? क्या भारतीय मीडिया में सुनक पर खड़े होने सवालों से उन्हें ब्रिटिशर्स ज्यादा अपना मानेंगे या उनका साथ देने से गोरों के मन में किसी तरह का डर बैठेगा तो निश्चित तौर पर इसका ठीक ठीक आकलन कर पाना मुश्किल है लेकिन इतना तय है कि देश के 200 अमीरों में शुमार सुनक को ब्रिटेन की जनता सिर्फ इसलिए नहीं नकारेगी कि वो भारतवंशी हैं। 

भारत में लोग आमतौर पर जानते हैं कि ऋषि सुनक, इंफोसिस के फाउंडर नारायणमूर्ति के दामाद है। नारायणमूर्ति की बेटी अक्षता और ऋषि अमेरिका के स्टैनफर्ड यूनिविर्सिटी में एक साथ एमबीए की पढाई कर रहे थे। हम थोड़ा उसे और विस्तार देते हैं, ऋषि के दादा भारत के पंजाब के रहने वाले थे और जब भारत ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था तभी वो पूर्वी अफ्रीका चले गए थे। वहीं उनके पिता का जन्म हुआ और उनकी मां उषा तंजानिया की रहने वाली थीं। 60 के दशक में सुनक के दादा अपने बच्चों के साथ ब्रिटेन चले आए। ऋषि के पिता ब्रिटेन में सरकारी डॉक्टर थे और मां फार्मा की दुकान चलाती थीं। ऋषि ने ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र और राजनीति की पढ़ाई की और फिर MBA करने अमेरिका चले गए। ऋषि महज 35 साल की उम्र में 2015 में पहली बार कंजरवेटिव पार्टी के सांसद के तौर पर संसद पहुंचे और तभी से ब्रिटेन की आर्थिक नीतियों में उनकी हिस्सेदारी देखी गई है। 2018 में ऋषि सुनक थेरेसा मे की सरकार में बतौर मंत्री शामिल हुए। 2019 में उन्हें ट्रेजरी का चीफ सेक्रेटरी बनाया गया। ब्रिटेन में ये पद वित्त मंत्रालय में मंत्री के बाद सबसे बड़ा और मजबूत पद होता है। प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के चुनाव प्रचार में भी ऋषि सुनक ने बड़ी भूमिका निभाई थी। सुनक एक शानदार वक्ता हैं लिहाजा कई अवसर पर चुनाव प्रचार के दौरान टीवी डिबेट में सुनक ने जॉनसन की जगह हिस्सा लिया। कंजरवेटिव पार्टी ने अक्सर मीडिया इंटरव्यू के लिए उन्हें आगे किया। राजनीति में आने के महज पांच साल में बोरिस जॉनसन ने उनको चांसलर बनाया तो लोगों को ऋषि के बारे में पता चला। लेकिन महज दो सालों में ऋषि ब्रिटेन के युवाओं में ऐसे पॉपुलर हुए कि अब वो प्रधानमंत्री बनने से महज एक कदम दूर हैं। इसलिए उन्हें शुभकामनाएं दीजिए 
 

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