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चुनाव ड्यूटी पर तैनात अफसर ही मताधिकार से वंचित, 65 अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में लगाई गुहार

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने अदालत में दलील देते हुए इसे पूरी तरह मनमाना और अनुचित बताया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 6 months ago

पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां लोकतंत्र को सुचारु रूप से संचालित कराने वाले अधिकारी खुद ही मतदान के अधिकार से वंचित हो गए. मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ 65 चुनाव अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. इस घटना ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

क्या है पूरा मामला?

चुनाव ड्यूटी पर तैनात इन 65 अधिकारियों का कहना है कि उनके नाम अचानक मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) से हटा दिए गए हैं. हैरानी की बात यह है कि उनके आधिकारिक ड्यूटी ऑर्डर पर उनके वोटर आईडी (EPIC) नंबर दर्ज हैं, लेकिन वही नंबर अब सूची में मौजूद नहीं हैं.

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने अदालत में दलील देते हुए इसे पूरी तरह मनमाना और अनुचित बताया. उनका कहना है कि बिना किसी ठोस कारण के नाम हटाना न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि इससे अधिकारियों के संवैधानिक अधिकारों का हनन भी होता है.

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और रुख

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार किया. मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर पहले अपीलेट ट्रिब्यूनल में सुनवाई होनी चाहिए. सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि संभव है कि ये अधिकारी इस बार मतदान न कर पाएं, लेकिन मतदाता सूची में उनका नाम बने रहना एक महत्वपूर्ण अधिकार है, जिसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए.

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब यह मामला अपीलेट ट्रिब्यूनल के पास जाएगा. ट्रिब्यूनल यह तय करेगा कि इन अधिकारियों के नाम वोटर लिस्ट में दोबारा जोड़े जाएं या नहीं. फिलहाल, इस चुनाव में उनके मतदान को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.

मतदाता सूची संशोधन पर भी उठे सवाल

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा की गई *स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR)* प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में बदलाव किए गए थे. आंकड़ों के मुताबिक, करीब 90.8 लाख से 91 लाख नाम सूची से हटाए गए.

इनमें से लगभग 58 लाख से 63 लाख नाम ‘ASDD’ (Absent, Shifted, Dead, Deleted) श्रेणी के तहत ड्राफ्ट रोल जारी होने के समय ही हटा दिए गए थे.

लोकतंत्र पर असर का सवाल

यह मामला केवल 65 अधिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करता है. जब चुनाव कराने वाले ही अपने मताधिकार से वंचित हो जाएं, तो यह प्रशासनिक खामियों की ओर इशारा करता है. अब सभी की नजरें ट्रिब्यूनल के फैसले पर टिकी हैं, जो इस मामले की दिशा तय करेगा.
 


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