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बड़ी बिहार लड़ाई: सट्टेबाजों की भविष्यवाणी, मोदी की रैली से महागठबंधन होगा ध्वस्त

₹1 लाख करोड़ का सट्टा कारोबार होने की उम्मीद. मोदी की रैली मैराथन और नीतीश कुमार की जातीय राजनीति पर गिरगिट जैसी पकड़ ने NDA के आत्मविश्वास को बढ़ाया है, सट्टेबाजों का दावा, भारी जीत तय है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 10 months ago

पलक शाह

बिहार अपने हाई-स्टेक विधानसभा चुनावों के लिए तैयार हो रहा है, जहाँ सियासी गर्मी, अंडरग्राउंड सट्टेबाज़ी और वैश्विक नजरें सब कुछ दांव पर लगाए हुए हैं. 243 सीटों में बहुमत के लिए 122 की जरूरत है, और सट्टेबाजों का अनुमान है कि नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) भारी बहुमत से जीत सकता है, उसे 145 सीटें मिलने की उम्मीद है, जबकि आरजेडी के तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला महागठबंधन 80–85 सीटों तक सिमट सकता है. अनुमानित सट्टा कारोबार? सूत्रों के अनुसार करीब ₹1 लाख करोड़ जो इसे दिल्ली के छह महीने पहले हुए चुनावों के बाद पहला बड़ा “इलेक्शन जगरनॉट” बनाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 से 27 अक्टूबर के बीच 12 रैलियों की मैराथन के लिए तैयार हैं, और बिहार का रण सिर्फ राज्य की सत्ता का नहीं, बल्कि मोदी के जनादेश का वैश्विक संकेत बन गया है, जिसे वॉल स्ट्रीट से लेकर वॉशिंगटन तक बारीकी से देखा जा रहा है.

2020 का चुनाव बेहद करीबी था सिर्फ 1.6 प्रतिशत वोट शेयर के अंतर से तय हुआ, यानी हर विधानसभा में करीब 53 वोटों का फर्क. NDA को तब 125 सीटें मिली थीं जबकि महागठबंधन को 110. 52 सीटों पर जीत का अंतर 5,000 वोटों से भी कम था, और हिलसा की 12 वोटों की जीत चर्चा का विषय बनी थी.

इस बार सट्टेबाज NDA की भारी जीत को लेकर आश्वस्त हैं. 145 सीटों पर ₹1 के मुकाबले ₹1 का भाव चल रहा है, जबकि 135 सीटों पर केवल 35 पैसे और 150 सीटों पर ₹1.40 मिल रहा है. महागठबंधन, जिसने 2020 के “ग्रैंड अलायंस” नाम को बदलकर फिर मैदान में उतरने की कोशिश की है, उसके लिए हालात कठिन हैं, 80 सीटों पर ₹1, 70 पर 38 पैसे, और 85 पर ₹1.75 का भाव. स्वतंत्र उम्मीदवारों को 15–20 सीटें मिलने की उम्मीद जताई जा रही है. नामांकन प्रक्रिया पूरी होने और उम्मीदवारों की जांच के बाद व्यक्तिगत सट्टे के रेट तय होंगे, फिलहाल अंडरग्राउंड सट्टा बाजार में हलचल तेज है.

मोदी की रैली मैराथन और नीतीश कुमार की जातीय समीकरणों पर मजबूत पकड़ ने NDA को बढ़त दी है. दूसरी ओर, महागठबंधन अंदरूनी मतभेदों से जूझ रहा है  RJD और कांग्रेस में सीटों को लेकर खींचतान, JMM का अलग चुनाव लड़ने का फैसला, और सीमांचल में AIMIM के 25 उम्मीदवारों का उतरना विपक्षी वोटों को बांट सकता है. तेजस्वी यादव के “रोज़गार चोर” वाले हमले मोदी की कल्याण योजनाओं से टकरा रहे हैं ₹62,000 करोड़ के स्किलिंग प्रोग्राम और मुख्यमंत्री भत्तों के साथ. वहीं, चुनाव आयोग की जब्तियाँ ₹71 करोड़ नकद और शराब, इस मुकाबले की गंभीरता दिखाती हैं, जबकि मतदाता सूची से 68.5 लाख नाम हटाए जाने पर नाराजगी बढ़ी है.

बिहार की सीमा से परे भी इस चुनाव की गूंज सुनाई दे रही है. NDA की निर्णायक जीत दिल्ली में मोदी की राजनीतिक ताकत को और मजबूत करेगी, जहाँ आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू जैसे क्षेत्रीय नेता अहम भूमिका में हैं. लेकिन अगर नतीजे उलटे पड़े, तो नीतीश कुमार की पाला बदलने वाली राजनीति BJP के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है, जिससे लोकसभा में उसकी 293 सीटों की बढ़त पर असर पड़ेगा. वैश्विक स्तर पर भी अमेरिकी कारोबारी लॉबी बिहार के नतीजों को मोदी के सुधारवादी इरादों के पैमाने के रूप में देख रही है, खासकर तब, जब ट्रंप के टैरिफ और H-1B वीज़ा पाबंदियों के खतरे मंडरा रहे हैं. बिहार की 10 अरब डॉलर की रेमिटेंस अर्थव्यवस्था, जो प्रवासी मजदूरों पर टिकी है, अंतरराष्ट्रीय बाजारों से गहराई से जुड़ी है. “कमजोर जनादेश भारत की सप्लाई-चेन नीति को चीन से दूर ले जाने की दिशा में धीमा कर सकता है,” एक अमेरिकी थिंक-टैंक की रिपोर्ट चेतावनी देती है.

6 और 11 नवंबर को मतदान और 14 नवंबर को नतीजों के साथ, बिहार के 7.6 प्रतिशत बेरोज़गारी दर और जातीय विभाजन ईबीसी, यादव और पसमांदा मुसलमानों के चलते मुकाबला बेहद रोमांचक हो गया है. क्या मोदी का जादू और नीतीश की रणनीति विपक्ष को कुचल देगी, या 2020 की तरह फिर से मामूली अंतर नतीजे तय करेगा? जब ₹1 लाख करोड़ इस चुनाव पर दांव पर लगे हों, तो इतना तो तय है, बिहार का फैसला इसकी सीमाओं से कहीं आगे तक गूंजेगा.


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