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मोदी के आगे छोटा है राहुल का व्यक्तित्व, लेकिन ये सवाल बन सकते हैं परेशानी

मोदी व्यतित्व के आगे राहुल का व्यक्तित्व बहुत छोटा है, जो विरासत से निकलकर आया है सियासी संघर्ष से नहीं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • अमर आनंद, वरिष्ठ पत्रकार

कांग्रेस पार्टी के लिए दक्षिण से 'उत्तर' की तलाश करते बारिश में भीगते राहुल गांधी अपने सवालों को और तीखा करते हुए नजर आ रहे हैं और सत्ता शिखर पर बैठे मोदी को घेरने की भरपूर कोशिश करते दिख रहे हैं. राहुल की 'भारत जोड़ो' यात्रा को जनता का रिस्पॉन्स ये बता रहा है कि सत्ताधारी बीजेपी की ओर से प्रचारित 'पप्पू' 2024 में पास होने के लिए कड़ा इम्तिहान दे रहे हैं. युवा काल तक सत्ता सुख से निकलकर आए राहुल जीवन के मध्य काल में विपक्ष के एक नेता की पूरी भूमिका निभा रहे हैं ये उनके तेवर से लग रहा है.

कौन सही है, कौन गलत?
दरअसल ईडी की करवाई के विरोध में पदयात्रा कर चुके राहुल की देशभर में पदयात्रा को इससे जोड़कर भी देखा जाना चाहिए. जिन जांच एजेंसियों का राहुल और उनकी पार्टी ने मोदी और शाह के खिलाफ 2013 तक उपयोग किया, वही जांच एजेंसियां अब राहुल के खिलाफ अपना काम कर रही हैं. कौन कितना सही है और कितना गलत इसका फैसला भारत में अदालत और जनता की अदालत ही करती है और उन्हें ही करने देना चाहिए. नरेंद्र मोदी सिर्फ राहुल गांधी के निशाने पर नहीं हैं, बल्कि वो अपने से पराए हो चुके नीतीश कुनार के निशाने पर भी हैं. राहुल की इस सियासी अंगड़ाई से पहले नीतीश कुमार दिल्ली कूच का ऐलान कर चुके हैं और राहुल से भी मिल चुके हैं. 

...तो हो सकती है मुसीबत
आरजेडी के पोस्टर में नीतीश बाकायदा अर्जुन बनकर मोदी से महाभारत करने को तैयार दिख रहे हैं और उनके सारथी के रूप में कृष्ण बनाकर तेजस्वी को दिखाया गया है. जबकि लालू विष्णु के विराट रूप में हैं और उनके इस रूप में खुद राहुल गांधी का भी चेहरा है. यानी नीतीश की पीएम बनने की हसरत के लिए लालू की कसरत तेज हो गई है. दिल्ली एनसीआर पहुंचने का सपना लेकर नीतीश के साथ पटना मे मंच साझा करना भी इसी हसरत और कसरत का हिस्सा नजर आता है. भारत को अंतरराष्ट्रीय पटल पर मान और अभिमान दिलाने वाले नरेंद्र मोदी, राम और गंगा के जरिए हिंदू जनमानस को और खेल आयोजनों और 5जी के जरिए युवाओं को अपने पक्ष में मोड़ रहे हैं. उनके व्यतित्व के आगे राहुल का व्यक्तित्व बहुत छोटा है, जो विरासत से निकलकर आया है सियासी संघर्ष से नहीं. लेकिन आर्थिक नीतियों, मंहगाई, बेरोजगारी और कुछ पूंजीपति मित्रों को फायदा देने के राहुल के सवाल अगर जनता के सवाल बन गए और 2024 में उन सवालों को जगह मिल गई, तो सत्ताधारी पार्टी बीजेपी को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा.

बदल रहा सियासी परिदृश्य
पचास पार के राहुल की पार्टी सत्तर पार के मोदी से मुकाबले के लिए 80 वर्ष तक पहुंच चुके नेता को कमान देने की प्रक्रिया में है. सियासी परिदृश्य तेजी से रंग बदल रहा है. इस परिदृश्य में में अरविंद केजरीवाल भी दिखाई दे रहे हैं. लेकिन असली लड़ाई 2024 की है, जहां नरेंद्र मोदी को खतरा विपक्ष के किसी भी नेता से नहीं दिखाई दे रहा है. न तो पटना के नीतीश कुमार से और न ही दिल्ली के केजरीवाल से. मोदी को अगर किसी से खतरा है तो पार्टी संसदीय बोर्ड से दरकिनार किए गए विकास के सबसे तेज धावक नितिन गडकरी से. गडकरी अगर उनके प्रतिद्वंद्वी बने तब भी खतरा है और रेस से बाहर हुए तब भी खतरा है. गडकरी की ताकत न सिर्फ उनका विकासोन्मुखी होना है, बल्कि मंदिर की हिमायत करते-करते बीजेपी को फिर से केंद्र में लाने की चाहत के बीच दिल्ली की मस्जिद के दरवाजे तक पहुंच चुके संघ से उनकी नजदीकी भी है.

विश्लेषण में जुटा संघ
संघ भी अपने विश्लेषण में जुटा है. प्रधानसेवक भी काम पर हैं, उनके कामकाज का आकलन कर रहे स्वयंसेवक भी. यह आकलन भी तेज़ी से किया जाने लगा है कि मोदी पार्टी के आगे के सत्ता मार्ग में लिए कितने उपयोगी हैं. इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि 2024 तक अगर मोदी की लोकप्रियता कम होती दिखाई पड़ी तो उनकी जगह योगी आदित्यनाथ को पीएम उम्मीदवार बना दिया जाए, हालांकि अभी दूर-दूर तक इसकी कोई संभावना नहीं नजर आ रही. जब से बीजेपी की सियासत में गुजरात का अंदाज प्रभावी हुआ है, तब से गैर गुजराती खासतौर से नजर अंदाज समझे जा रहे हैं. महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश से दबी-छुपी सियासी हसरतों को अवसर नहीं मिल पा रहा है. 2024 से ठीक पहले ये सारी हसरतें अरमान बनने के लिए बेताब नजर आएंगी और अलग - अलग जरिए और नजरिए से अपनी बातों को परवान चढ़ाएंगी. 

मोदी पार्टी के लिए अपरिहार्य 
हालांकि इन सबको मैनेज करने के लिए फाइनल राउंड की तैयारी में जुटे मोदी और शाह का सियासी हुनर ही काफी है. पार्टी और विपक्ष में कई प्रत्यक्ष और परोक्ष शत्रु होने के बावजूद नरेंद्र मोदी पार्टी के लिए अपरिहार्य और विपक्ष के लिए अपराजेय हैं और पार्टी का मार्गदर्शक मंडल उनसे कोसों दूर नजर आ रहा है. हालांकि सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास की बात करने वाले नरेंद्र मोदी का मकसद कितना मुमकिन है, इसका पता 2024 में ही चलेगा.


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