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अमेरिकी शुल्कों से जूझ रहे भारतीय निर्यातक, ठोस कदम न उठाने पर वैश्विक प्रतिस्पर्धा खोने का खतरा: GTRI

जीटीआरआई की रिपोर्ट में कहा गया– शुल्क 3% से बढ़कर 50% तक, जबकि ब्राज़ील ने तुरंत 5.6 अरब डॉलर का राहत पैकेज दिया

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago

अमेरिका के ऊँचे शुल्कों से भारतीय निर्यातक मुश्किल में हैं और एक अग्रणी व्यापार नीति थिंक टैंक ने चेतावनी दी है कि सरकार की चुप्पी और देरी से भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी शुल्क भारतीय वस्तुओं पर पिछले एक साल में 3 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुँच गए हैं. समूह ने कहा कि भारत को तत्काल निलंबित सहायता योजनाओं को बहाल करना चाहिए और लंबित व्यापार सुविधा उपायों को लागू करना चाहिए ताकि निर्यातकों को स्थायी नुकसान से बचाया जा सके.

रिपोर्ट ने भारत और ब्राज़ील की तुलना करते हुए कहा कि दोनों पर 1 अगस्त 2025 से समान शुल्क लगाए गए थे. लेकिन ब्राज़ील ने तुरंत 46,600 करोड़ रुपये (5.6 अरब डॉलर) का राहत पैकेज घोषित किया. कर प्रोत्साहन बढ़ाए. कृषि निर्यात नए बाज़ारों की ओर मोड़े और डब्ल्यूटीओ में कानूनी लड़ाई शुरू की. इसके उलट भारत ने अब तक कोई औपचारिक कदम नहीं उठाया.

जीटीआरआई ने कहा, “ब्राज़ील के विपरीत, भारत के निर्यातक बिना किसी राहत के फंसे हुए हैं. देर से कार्रवाई करने से शुल्क का झटका घरेलू नीति की उपेक्षा के साथ और गंभीर हो जाएगा.”

ठप पड़ी योजनाओं को फिर से शुरू करने की मांग
रिपोर्ट में कहा गया कि सबसे अहम है मार्केट एक्सेस इनिशिएटिव (MAI) और इंटरेस्ट इक्वलाइजेशन स्कीम (IES) की बहाली. दोनों योजनाएँ मौजूदा वित्त वर्ष में निलंबित कर दी गई हैं. जिससे विशेषकर एमएसएमई निर्यातकों को नुकसान हो रहा है.

एमएआई, जो भारतीय कंपनियों की अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों में भागीदारी के लिए धन उपलब्ध कराती थी, को इस साल कोई आवंटन नहीं मिला. निर्यातकों ने अप्रैल-अगस्त के बीच अहम अवसर खो दिए. जीटीआरआई ने कहा कि इस योजना का बजट 250 करोड़ से बढ़ाकर 2,500 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष किया जाए और फंड एक साल पहले जारी किए जाएँ.

आईईएस, जो निर्यातकों के लिए 5-7 प्रतिशत तक उधारी लागत घटाती थी, अप्रैल 2025 से निलंबित है. इससे वस्त्र, चमड़ा, हस्तशिल्प और इंजीनियरिंग जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को भारी लागत का सामना करना पड़ रहा है. रिपोर्ट ने 15,000 करोड़ रुपये सालाना बजट और पाँच साल की गारंटी के साथ योजना को फिर से शुरू करने की सिफारिश की.

अधूरी घोषणाएँ और अटकी परियोजनाएँ
जीटीआरआई ने कहा कि कई बड़े उपाय कागज़ों तक ही सीमित हैं. 2025-26 के बजट में घोषित 2,250 करोड़ रुपये वाली एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन (EPM) अभी तक शुरू नहीं हुई है. भारत ट्रेड नेट नामक डिजिटल सिंगल विंडो भी अटकी हुई है. जिससे निर्यातकों को अब भी 30 से ज्यादा दस्तावेजों से जूझना पड़ता है.

ई-कॉमर्स एक्सपोर्ट हब्स, जिनका ऐलान 2023 में हुआ था, भी धरातल पर नहीं आ सके. जीटीआरआई का अनुमान है कि इन्हें चालू करने से सालाना 10-15 अरब डॉलर का अतिरिक्त निर्यात संभव है.


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