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इस्पात आत्मनिर्भरता में कोकिंग कोल सबसे बड़ी चुनौती, कब मिलेगी आयात से आज़ादी?
90% आयात निर्भरता के बीच धुलाई क्षमता, तकनीकी नवाचार और नीतिगत सुधारों पर टिकी रणनीतिक मजबूती
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago
भारत का इस्पात क्षेत्र एक निर्णायक मोड़ पर है. वित्त वर्ष 2025 में 6.4 प्रतिशत की दर से अर्थव्यवस्था के विस्तार और निर्माण, ऑटोमोबाइल तथा अवसंरचना क्षेत्र की तेज़ी से जुड़ी मांग ने देश की कोकिंग कोल (कोक बनाने वाली कोयला) पर निर्भरता को पहले से अधिक अहम बना दिया है. दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक होने के बावजूद भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 90 प्रतिशत कोकिंग कोल आयात करता है. यह उस देश के लिए विडंबना है जो रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भरता) हासिल करने का लक्ष्य रखता है.
एसएंडपी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में कुल आयात 56.90 मिलियन मीट्रिक टन रहा, जो 2023 के 56.54 और 2022 के 57.01 मिलियन मीट्रिक टन के आसपास ही है.
ईवाई-पार्थेनन के बिज़नेस कंसल्टिंग पार्टनर विनायक विपुल ने कहा, “भारत की कोकिंग कोल पर आयात निर्भरता केवल सप्लाई-चेन की कमजोरी नहीं है, यह इस्पात क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा के लिए एक रणनीतिक जोखिम है. आत्मनिर्भरता तभी संभव होगी जब हम केवल आपूर्ति बढ़ाने के बजाय पूरे कोकिंग कोल वैल्यू चेन का ढांचागत एकीकरण करें.”
आत्मनिर्भरता
इंडियन स्टील एसोसिएशन (ISA) और ईवाई-पार्थेनन की हालिया रिपोर्ट India’s coking coal strategy: Building resilience through innovation, sustainability and policy के अनुसार, भारत ने FY24 में 66.8 मिलियन टन कच्चा कोकिंग कोल निकाला, लेकिन औद्योगिक मानकों के अनुरूप धुलाई के बाद केवल 5 मिलियन टन ही उपयोग योग्य हुआ.
रिपोर्ट ने बताया कि अधिकांश भंडारों में 25–35 प्रतिशत राख और सल्फर की अधिकता है, जो उन्हें इस्पात उत्पादन के लिए अनुपयुक्त बनाती है. झरिया क्षेत्र, जहां 12 बिलियन टन भंडार मौजूद हैं, आग और धंसान की समस्याओं से जूझ रहा है.
हालांकि नीति आयोग को प्रस्तुत आर श्रीकांत की एक पूर्व रिपोर्ट के अनुसार, 1 अप्रैल 2023 तक भारत में प्राइम कोकिंग कोल के 5.1 बिलियन टन और मीडियम कोकिंग कोल के 16.5 बिलियन टन मापित भंडार उपलब्ध थे. रिपोर्ट ने कहा कि देश के पास पर्याप्त भंडार है जिसे धोकर 16–18 प्रतिशत राख स्तर तक लाया जा सकता है ताकि इस्पात संयंत्रों और कोक ओवन के लिए धातुकर्म कोल उपलब्ध हो सके.
इंडियन स्टील एसोसिएशन के महासचिव और कार्यकारी प्रमुख आलोक सहाय ने कहा, “भारत की आत्मनिर्भरता धुलाई तकनीक और अवसंरचना में बड़े सुधार पर निर्भर करती है. इसके लिए वॉशरी डेवलपर-ऑपरेटर मॉडल, भूमिगत खदानों का मशीनीकरण और फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी बेहतर करना ज़रूरी है.”
विपुल का मानना है कि भविष्य डिजिटल तकनीक पर टिका है. उन्होंने कहा, “कोकिंग कोल सप्लाई चेन का भविष्य हमारी क्षमता पर निर्भर करता है कि हम प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स, ऑटोमेशन और डिजिटल ट्विन जैसी तकनीकों का खनन और ब्लेंडिंग प्रक्रियाओं में कैसे उपयोग करते हैं.”
आईएसए रिपोर्ट के अनुसार भारत की वॉशरियां औसतन केवल 32 प्रतिशत क्षमता पर काम कर रही हैं. हैवी मीडिया साइक्लोन और फ्लोटेशन कॉलम जैसी उन्नत तकनीक का सीमित उपयोग हुआ है. स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) के संजय अग्रवाल ने कहा, “बढ़ी हुई धुलाई क्षमता और डेवलपर-ऑपरेटर मॉडल को लागू करना घरेलू कोल की गुणवत्ता और लॉजिस्टिक्स सुधारने के लिए आवश्यक है.”
ओडिशा और झारखंड में रेल जाम, खनन के लिए कम फंड और भूमि अधिग्रहण की चुनौतियां विस्तार की राह में बाधा बनी हुई हैं. दूसरी ओर, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक व्यापार नीतियों के बदलाव से आयात लागत अस्थिर रहती है.
हरित मार्ग की ओर
विशेषज्ञ मानते हैं कि कोकिंग कोल में आत्मनिर्भरता की कोशिश को भारत के डिकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों से भी संतुलित करना होगा. इस्पात क्षेत्र राष्ट्रीय ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 12 प्रतिशत योगदान देता है.
इस्पात कंपनियां ब्लास्ट फर्नेस में हाइड्रोजन और नेचुरल गैस इंजेक्शन, इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस, और बायोचार जैसी नवीकरणीय तकनीक का परीक्षण कर रही हैं. पल्वराइज्ड कोल इंजेक्शन की दक्षता में सुधार हुआ है. नेशनल हाइड्रोजन मिशन के तहत कुछ मिलों ने हाइड्रोजन-समृद्ध स्थितियों के परीक्षण भी किए हैं.
सरकार ने भी कदम उठाए हैं. वाणिज्यिक खनन में 100 प्रतिशत एफडीआई, रेवेन्यू-शेयरिंग नीलामी, तेज़ पर्यावरणीय मंजूरी और वॉशरी के लिए पूंजी सब्सिडी की घोषणा की गई है. मिशन कोकिंग कोल का लक्ष्य 2030 तक धुले हुए कोल का उत्पादन तीन गुना बढ़ाकर 15 मिलियन टन करना है.
हालांकि निवेशकों की प्रतिक्रिया ठंडी रही है. FY23 में कोयला क्षेत्र में केवल 13 मिलियन डॉलर का एफडीआई आया जबकि FY25 में भारत का कुल एफडीआई प्रवाह 80 बिलियन डॉलर से अधिक रहा.
आगे की राह
विशेषज्ञ मानते हैं कि आत्मनिर्भरता का अर्थ पूर्ण स्वतंत्रता नहीं बल्कि रणनीतिक लचीलापन है. इसका मतलब है धुलाई क्षमता बढ़ाना, आयात स्रोतों में विविधता लाना और सामरिक भंडार तैयार करना.
सहाय ने कहा कि भारत की यात्रा “ऐसी नीतिगत और परिचालन सुधारों पर निर्भर करेगी जो कोल की गुणवत्ता को स्थिरता के साथ जोड़ें.”
आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती भंडार की कमी नहीं बल्कि रूपांतरण दक्षता है. वर्तमान में केवल 7–8 मिलियन टन कोकिंग कोल धुलकर मिलता है जिसका यील्ड लगभग 33 प्रतिशत है. विशेषज्ञों का कहना है कि 2030 तक क्षमता को 140 मिलियन टन तक बढ़ाना और एआई-आधारित ब्लेंडिंग के साथ फाइन-कोल ट्रीटमेंट अपनाना घरेलू आपूर्ति हिस्सेदारी को 10–12 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत से अधिक तक ले जा सकता है.
विपुल ने कहा कि सीबीएम क्षेत्रों में फंसे भंडार को खोलना और नई खदानों के विकास का समय 50–65 महीनों से घटाकर 36 महीने से कम करना ज़रूरी है. समर्पित कोकिंग कोल कॉरिडोर वाले माइनिंग-स्टील क्लस्टर से लॉजिस्टिक लागत घटेगी और ‘स्मार्ट कॉरिडोर’ मॉडल की बचत दोहराई जा सकेगी.
विशेषज्ञ मानते हैं कि हाइड्रोजन-आधारित डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI), स्क्रैप रीसाइक्लिंग, नवीकरणीय ऊर्जा का एकीकरण और कार्बन कैप्चर जैसी हरित तकनीकों का विस्तार भारत की नेट-ज़ीरो महत्वाकांक्षा को मजबूत करेगा. साथ ही, त्वरित मंजूरियां, भूमि अधिग्रहण में तेजी और डिजिटल उपकरणों का उपयोग खनन व लॉजिस्टिक्स में उत्पादकता बढ़ाएगा.
भविष्य के लिए तैयार कार्यबल और सरकार-उद्योग की साझी भागीदारी से ही भारत का कोकिंग कोल तंत्र प्रतिस्पर्धी, स्थायी और लचीला औद्योगिक विकास स्तंभ बन पाएगा.
(यह लेख नवनीत सिंह द्वारा लिखा गया है)
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