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“शहर तभी रहने लायक हैं जब वे प्रकृति के साथ संतुलन में हों”: दिया मिर्जा

दिया मिर्जा का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण हमारी रोजमर्रा की आदतों से जुड़ा हुआ है. एक बोतल कम इस्तेमाल करना, पेड़ लगाना या प्लास्टिक से दूरी बनाना, ये छोटे कदम मिलकर बड़े बदलाव की दिशा तय करते हैं.

रितु राणा 6 months ago

गुरुग्राम के चक्करपुर-वजीराबाद बंध के पास Godrej Properties की ‘Neighbours with Nature’ पहल के तहत आयोजित सस्टेनेबिलिटी इवेंट में अभिनेत्री और संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण सद्भावना दूत (UN Environment Goodwill Ambassador) व अभिनेत्री दिया मिर्जा ने हिस्सा लिया. इस पहल का उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में प्राकृतिक संपदाओं (ecological assets) के पुनर्स्थापन के महत्व को रेखांकित करना है. BW Businessworld की सीनियर कॉरेस्पॉन्डेंट रितु राणा से बातचीत में उन्होंने पर्यावरण, शहरीकरण और व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर विस्तार से अपने विचार साझा किए. पेश हैं इस विशेष साक्षात्कार के विस्तृत अंश :

सवाल: गोदरेज की ‘Neighbours with Nature’ पहल को आप किस नजर से देखती हैं?

दिया मिर्जा: यह पहल मेरे वैल्यू सिस्टम से पूरी तरह मेल खाती है. चक्करपुर-वजीराबाद बंध जैसे इकोलॉजिकल कॉरिडोर का पुनर्स्थापन (restoration) बहुत जरूरी है. क्योंकि ये क्षेत्र जैव विविधता (biodiversity) को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं. आज शहरों के तेजी से फैलाव के कारण प्राकृतिक स्थान खत्म हो रहे हैं. ऐसे में अगर कंपनियां आगे आकर इन क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने का काम करती हैं. तो यह बहुत सकारात्मक कदम है.

यह सिर्फ पर्यावरण संरक्षण नहीं. बल्कि लोगों को प्रकृति से दोबारा जोड़ने का भी प्रयास है, जो आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है.

सवाल: आपने शहरीकरण और प्रकृति के संतुलन को लेकर क्या अनुभव किया?

दिया मिर्जा: “शहरीकरण ने हमें उन प्राकृतिक प्रणालियों से दूर कर दिया है. जिन पर हम निर्भर हैं. Godrej Properties की ‘Neighbours with Nature’ पहल यह याद दिलाती है कि अगर हम संरक्षण और पोषण का विकल्प चुनें, तो हमारे शहरों में भी प्रकृति सार्थक रूप से मौजूद रह सकती है. कोई शहर तब कहीं अधिक रहने योग्य बनता है. जब वह नेचर पॉजिटिव होता है. Godrej Miraya की मेरी यात्रा ने इस बात को और मजबूत किया कि आज के समय में असली लग्जरी अति (excess) में नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ संतुलन बनाने में है.”

सवाल: रियल एस्टेट सेक्टर में सस्टेनेबिलिटी को लेकर आप क्या बदलाव देखती हैं?

दिया मिर्जा: “यह देखना उत्साहजनक है कि Godrej Properties जैसे डेवलपर्स अब वैश्विक सस्टेनेबिलिटी मानकों, जैसे Indian Green Building Council के प्लैटिनम सर्टिफिकेशन के साथ खुद को जोड़ रहे हैं. इससे यह सुनिश्चित होता है कि इमारतें और स्पेस लंबे समय तक पर्यावरणीय जिम्मेदारी को ध्यान में रखकर डिजाइन और निर्मित किए जा रहे हैं. यह मुझे उम्मीद देता है कि हमारे शहरों का भविष्य सुरक्षित हाथों में है. मुझे खुशी है कि मैं ऐसी पहल का हिस्सा हूं. जो चुपचाप लेकिन सार्थक तरीके से इस बदलाव को आगे बढ़ा रही है.”

सवाल: आपके अनुसार भविष्य का एक आदर्श शहर कैसा होना चाहिए और “प्रकृति से जुड़ाव” जैसी पहल इसमें कैसे योगदान दे सकती है?

दिया मिर्जा: मेरे अनुसार आदर्श शहर वह होगा जहाँ लोग अपनी सब्ज़ियों. भोजन और प्राकृतिक संसाधनों को महत्व दें. और शहर का विकास प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर किया जाए. हर स्कूल में बच्चों द्वारा उगाए गए सब्ज़ी बगीचे हों. बच्चों के पास खेलने की खुली जगह हो. और वे स्वच्छ. स्वस्थ और प्राकृतिक वातावरण में रहें.

ऐसे शहरों में लोग अधिक पैदल चलें. साइकिल चलाएँ और निजी वाहनों की बजाय सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें. साथ ही. कम आय वर्ग के लोग भी जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से सुरक्षित रहें. और सभी को बेहतर जीवन गुणवत्ता मिले.

“प्रकृति से जुड़ाव” जैसी पहल इस दिशा में एक मजबूत कदम है. क्योंकि यह हमें अपने प्रोजेक्ट्स की सीमाओं से बाहर निकलकर समुदाय के साथ मिलकर काम करने और पर्यावरण की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित करती है. यह पहल हमें याद दिलाती है कि छोटे-छोटे कदम, जैसे पेड़ों की रक्षा करना या लोगों को जागरूक करना भी बड़े बदलाव ला सकते हैं. जब पूरा समुदाय मिलकर काम करता है. तब ही एक आदर्श और टिकाऊ शहर का सपना साकार हो सकता है.

सवाल: आपने हाल ही में एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) द्वारा आयोजित एक समिट में बयान दिया था कि आपने करीब 15 हजार प्लास्टिक बोतलों को पर्यावरण में जाने से रोका है, यह कैसे संभव हुआ?

दिया मिर्जा: जी हां, मैंने करीब 15,000 प्लास्टिक बोतलों को पर्यावरण में जाने से रोका है और यह केवल एक आदत बदलने से संभव हुआ. हम अक्सर बाहर जाते समय पानी साथ लेकर नहीं चलते और हर जगह नई प्लास्टिक बोतल खरीद लेते हैं, चाहे वह होटल हो, ऑफिस मीटिंग हो या कोई इवेंट. मैंने 2015 से यह तय किया कि मैं हमेशा अपनी रिफिलेबल बोतल साथ रखूंगी. अगर हम यह समझें कि एक प्लास्टिक बोतल को पूरी तरह खत्म होने में लगभग *450 साल तक का समय* लग सकता है. तो यह छोटा कदम कितना बड़ा असर डाल सकता है. यह साफ हो जाता है. भारत में हर साल करोड़ों टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. जिसमें सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का बड़ा हिस्सा है. ऐसे में अगर हर व्यक्ति अपनी एक आदत बदल ले. तो इसका सामूहिक प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है.

सवाल: आपने अपने जीवन में और कौन-कौन से बदलाव किए हैं जो पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण हैं?

दिया मिर्जा: मेरे लिए सस्टेनेबिलिटी सिर्फ एक विचार नहीं. बल्कि जीवनशैली है. मैं कुछ बुनियादी बातों का हमेशा ध्यान रखती हूं जैसे मैंने सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग पूरी तरह बंद कर दिया है. हमेशा अपने बैग में कपड़े का थैला रखती हूं. जिससे प्लास्टिक बैग लेने की जरूरत नहीं पड़ती. घर में कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर (segregation) डिस्पोज किया जाता है.

इसके अलावा. मैं खास मौकों पर गिफ्ट देने के बजाय लोगों के नाम पर पेड़ लगवाती हूं. अब तक हजारों पेड़ लगाए जा चुके हैं. फैक्ट के तौर पर देखें. तो एक पेड़ अपने जीवनकाल में लगभग 1 टन तक कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर सकता है और वातावरण को शुद्ध करता है. इसलिए यह पहल सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक प्रभाव डालने वाली है.

सवाल: क्या आपको लगता है कि व्यक्तिगत स्तर पर लिए गए फैसले वास्तव में बड़े बदलाव ला सकते हैं?

दिया मिर्जा: बिल्कुल. और यही सबसे महत्वपूर्ण बात है. हम अक्सर सोचते हैं कि जब तक बड़े स्तर पर नीतियां नहीं बदलेंगी. तब तक कुछ नहीं होगा. लेकिन सच्चाई यह है कि बदलाव की शुरुआत व्यक्तिगत स्तर से ही होती है. अगर 100 लोग रोज एक प्लास्टिक बोतल कम इस्तेमाल करें. तो सालभर में यह संख्या *36,500 बोतलों* तक पहुंच जाती है. अब सोचिए. अगर लाखों लोग ऐसा करने लगें. तो इसका प्रभाव कितना व्यापक होगा.

इसी तरह, जब लोग अपने छोटे-छोटे फैसलों, जैसे पानी बचाना. प्लास्टिक से बचना. पेड़ लगाना, पर ध्यान देते हैं तो यह एक कलेक्टिव मूवमेंट बन जाता है.

निष्कर्ष

दिया मिर्जा के अनुसार. पर्यावरण संरक्षण केवल नीतियों या बड़े अभियानों तक सीमित नहीं है. बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की आदतों और सोच से जुड़ा है. शहरों को बेहतर और रहने योग्य बनाने के लिए जरूरी है कि हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाएं, क्योंकि असली विकास वही है. जो पर्यावरण के साथ मिलकर आगे बढ़े.


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