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आशा की नई तकनीक: रोबोटिक ऑर्थोपेडिक सर्जरी से बदलते जीवन

रोबोटिक ऑर्थोपेडिक सर्जरी सिर्फ एक तकनीकी विकास नहीं, बल्कि एक मानवीय क्रांति है। यह उन लोगों के लिए एक नई आशा लेकर आई है, जिन्होंने दर्द, असफलताओं और निराशा को झेला है।

रितु राणा 6 months ago

कई बार असफल सर्जरी के बाद 35 साल के राहुल चतुर्वेदी की जिंदगी  बिस्तर तक सीमित हो गई थी, लेकिन आज वह बिना दर्द के लंबी ड्राइव कर रहे हैं, पहाड़ों की सैर कर रहे हैं और अपनी जिंदगी को फिर से जी रहे हैं, जानते हैं कैसे? दरअसल यह एक नई तकनीक यानी रोबोटिक्स की मदद से मुमकिन हो पाया है, इस नवीन ‘ऑर्थोपेडिक सर्जरी’ ने उनके साथ साथ सैकड़ों लोगों की उम्मीदों को फिर से जिंदा किया है. ऑर्थोपेडिक्स सर्जरी की इस नई तकनीक ने पिछले दशक में जबरदस्त क्रांति ला दी है. खासकर जब बात हो जोड़ों की सर्जरी की, तो अब पारंपरिक तरीके पीछे छूटने लगे हैं. 

पिछले 15 वर्षों से अर्थोपेडिक सर्जरी के क्षेत्र में काम कर रहे पटपड़गंज स्थित मैक्स सुपर स्पेशैलिटी अस्पताल के प्रधान सलाहकार डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा ने बताया रोबोटिक असिस्टेड सर्जरी अब न केवल अधिक सटीक और सुरक्षित हो गई है, बल्कि इससे मरीजों की रिकवरी भी तेज और प्रभावी हो रही है. आइए, जानते हैं उन प्रेरणादायक कहानियों को, जहां रोबोटिक्स ने असंभव को संभव कर दिखाया और लोगों की जिंदगी में नई उम्मीद जगाई है.

रोबोटिक-असिस्टेड घुटना प्रत्यारोपण: सबसे सफल और लोकप्रिय अनुप्रयोग
ऑर्थोपेडिक्स में रोबोटिक्स का सबसे प्रभावशाली उपयोग Robotic-Assisted Knee Replacement में देखा गया है. यह तकनीक:
1. 3D मैपिंग और कंप्यूटर-नियंत्रण की मदद से सर्जन को हर कट और इम्प्लांट की सटीक स्थिति निर्धारित करने में मदद करती है.
2. सर्जिकल सटीकता में सुधार लाती है.
3. मुलायम ऊतकों को न्यूनतम नुकसान पहुंचाती है, जिससे रिकवरी तेज़ होती है.
4. और घुटने के लंबे समय तक कार्यशील रहने में सहायता करती है.

पारंपरिक बनाम रोबोटिक सर्जरी: क्या फर्क है?
पारंपरिक घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी में इम्प्लांट की स्थिति सर्जन के अनुभव और आंखों की सटीकता पर निर्भर करती है. इसके विपरीत, रोबोटिक तकनीक:
1. सटीक नियंत्रण और स्थिरता प्रदान करती है.
2. घुटने को संतुलित करती है जिससे गति अधिक प्राकृतिक लगती है.
3. इम्प्लांट का जीवनकाल बढ़ाती है क्योंकि घिसाव और ढीलेपन की संभावना कम होती है.

भारत में बढ़ती स्वीकार्यता: सुलभता और आत्मनिर्भरता की ओर
अर्थोपेडिक सर्जन डॉ. दीपक अरोड़ा ने कहा भारत में हर साल 5 लाख से अधिक घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी होती हैं. रोबोटिक तकनीक की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है, और कई अग्रणी अस्पताल अब रोबोटिक प्लेटफ़ॉर्म्स में निवेश कर रहे हैं. खास बात यह है कि MISSO जैसे स्वदेशी रोबोटिक सिस्टम ने इस तकनीक को भारतीय मरीजों के लिए अधिक सुलभ और किफायती बना दिया है, जो ‘मेड इन इंडिया’ पहल की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

विशेषकर अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों में, रोबोटिक-असिस्टेड ऑर्थोपेडिक सर्जरी अब एक सामान्य प्रैक्टिस बन चुकी है. वैश्विक स्तर पर, इस क्षेत्र का बाज़ार हर साल 25–30% की दर से बढ़ रहा है, जो दर्शाता है कि सर्जन और मरीज दोनों ही इस तकनीक में भरोसा जता रहे हैं.

रोबोटिक्स के निर्विवाद फायदे
रोबोटिक ऑर्थोपेडिक सर्जरी के लाभ स्पष्ट हैं:
1. बेहतर सर्जिकल सटीकता
2. तेज रिकवरी और कम अस्पताल में भर्ती समय
3. कम रीविजन दर (Revision Surgery की जरूरत कम)
4. लंबे समय तक टिकने वाले इम्प्लांट्स
5. मरीज की जीवन गुणवत्ता में सुधार

अन्य ऑर्थोपेडिक प्रक्रियाओं में भी विस्तार
डॉ. अरोड़ ने कहा जैसे-जैसे तकनीक और मशीन लर्निंग में सुधार होता जा रहा है, रोबोटिक्स की पहुंच घुटने की सर्जरी से आगे बढ़कर अन्य जॉइंट रिप्लेसमेंट, रीढ़ की सर्जरी और ट्रॉमा के मामलों तक हो सकती है. तो आइए डॉ. अरोड़ा द्वारा की गई कुछ सफल सर्जरी की केस स्टडी पर एक नजर डालते हैं-

केस स्टडी 1 : रोबोटिक तकनीक और ऑर्थोपेडिक सर्जरी से जुड़ी टूटी हड्डियां
नाम: आंचल वासने
उम्र: 45 वर्ष
निवास: बंदायूं, उत्तर प्रदेश

बदायूं की रहने वाली 45 वर्षीय आँचल वासने की जिंदगी अचानक एक ऐसे मोड़ पर आ गई, जहाँ हर रास्ता बंद सा दिख रहा था. एक दिन, एक हादसे में वह तीन मंजिला इमारत से नीचे गिर गईं. यह गिरावट सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी गहरी थी.

हादसे के बाद आँचल के शरीर की कई हड्डियाँ टूट चुकी थीं दाहिने हाथ और पैर की हड्डियाँ चकनाचूर, फेमर बोन पूरी तरह क्षतिग्रस्त, साथ ही शरीर में भीषण दर्द, सूजन और शॉक की स्थिति थी. स्थिति इतनी गंभीर थी कि डॉक्टरों को उन्हें 22 दिन तक वेंटिलेटर पर रखना पड़ा. उन 22 दिनों में आँचल जिंदगी और मौत के बीच झूलती रहीं.
हादसे के बाद इलाज की तलाश शुरू हुई. एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल, एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर, परिवार हर संभव प्रयास कर रहा था. लेकिन हर जगह से सिर्फ़ यही जवाब मिला कि हड्डियाँ अब नहीं जुड़ेंगी, चलना अब संभव नहीं है और मरीज को जीवनभर बिस्तर पर रहना पड़ेगा. एक दिन आँचल के पति के मित्र ने सलाह दीएक बार डॉ. दीपक अरोड़ा से मिलिए, शायद वो कुछ कर सकें. यह आखिरी उम्मीद थी. आँचल और उनका परिवार पटपड़गंज स्थित मैक्स अस्तपताल पहुँचे और डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा से मुलाकात की.

डॉ. अरोड़ा ने केस का गहन विश्लेषण करते हुए  पुराने एक्स-रे और स्कैन की गहराई से समीक्षा की. चोटों की गंभीरता को समझा और शरीर की मूवमेंट और रिकवरी की संभावनाओं का आकलन किया. फिर उन्होंने कहा "यह असंभव नहीं है. हम कोशिश करेंगे, और आँचल फिर से चल सकेंगी."

इलाज की प्रक्रिया
इसके बाद शुरू हुआ एक लंबा लेकिन सटीक चिकित्सा सफर, जिसमें रोबोटिक तकनीक और ऑर्थोपेडिक सर्जरी ने मिलकर कमाल कर दिखाया.
1. टूटी हड्डियों को जोड़ा गया.
2. अत्याधुनिक इम्प्लांट्स लगाए गए.
3. कई जटिल सर्जरीज को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया.
4. रोबोटिक सर्जरी ने कट्स और इम्प्लांट पोज़िशनिंग में माइक्रोलेवल की सटीकता सुनिश्चित की.
5. फिजियोथेरेपी और रिहैबिलिटेशन का विस्तृत प्रोग्राम शुरू किया गया.
6. हर प्रक्रिया को मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम और नवीनतम तकनीकों के सहयोग से पूरा किया गया.

परिणाम: बिस्तर से उठकर दोबारा जीवन की ओर
कुछ महीनों बाद, आँचल फिर से अपने पैरों पर खड़ी थीं. आज, वह न सिर्फ़ चल सकती हैं, बल्कि अपने घर के सभी काम भी खुद करती हैं. वह मुस्कुराकर कहती हैं "मैंने सोचा था अब कभी नहीं चल पाऊंगी, लेकिन डॉ. अरोड़ा ने मुझे ज़िंदगी दी."

केस स्टडी 2 : सरकारी अधिकारी शरद की घुटना प्रत्यारोपण से नई जिंदगी
नाम: आर. शरद
उम्र: 22 वर्ष
निवास: बरेली, उत्तर प्रदेश
पेशा: सरकारी कर्मचारी, Comptroller and Auditor General of India (CAG)

साल 2023 में, जब शरद महज 20 वर्ष के थे, एक सामान्य दिन उनके जीवन की दिशा हमेशा के लिए बदल गया. ऑफिस से लौटते वक्त उन्हें अचानक सनस्ट्रोक हुआ और वे एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए. इस हादसे में उनकी फीमर बोन (जांघ की हड्डी) गंभीर रूप से टूट गई. इलाज के शुरुआती दौर में फ्रैक्चर की मरम्मत की गई, लेकिन उसके बाद शुरू हुआ एक लंबा संघर्ष व लगातार दर्द, सूजन, और जोड़ों में जकड़न ने उनकी गतिशीलता लगभग समाप्त कर दी. धीरे-धीरे वे चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ हो गए. नौकरी छोड़नी पड़ी, सामाजिक जीवन ठहर गया, और वे डिप्रेशन की स्थिति में पहुंच गए.

पारंपरिक उपचार विफल, परिवार की चिंता बढ़ी
परिवार ने देशभर में कई डॉक्टरों और अस्पतालों से संपर्क किया. लेकिन किसी भी उपचार से शरद को स्थायी राहत नहीं मिली. लगातार दर्द और असहायता ने शरद को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ दिया था. एक गंभीर निर्णय के बाद परिवार ने दिल्ली के प्रसिद्ध ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा से संपर्क किया, डॉ. दीपक अरोड़ा ने बताया कि इतनी कम उम्र में टोटल नी रिप्लेसमेंट करना एक बड़ा क्लिनिकल चैलेंज था. शरद के घुटने की हड्डी की स्थिति पारंपरिक सर्जरी के लिए उपयुक्त नहीं थी. हमने केस का विस्तार से अध्ययन किया और यह निर्णय लिया कि रोबोटिक असिस्टेड तकनीक और विशेष इम्प्लांट का उपयोग करके टोटल नी रिप्लेसमेंट किया जाए.

इलाज की प्रक्रिया
शरद के केस को बारीकी से प्लान किया गया. उन्नत रोबोटिक तकनीक और युवा मरीजों के लिए बनाए गए विशेष इम्प्लांट्स की मदद से सर्जरी को अंजाम दिया गया. प्रक्रिया में अत्यधिक सटीकता और संयम की आवश्यकता थी, जिसे अनुभवी टीम ने सफलतापूर्वक पूरा किया. सर्जरी के कुछ ही महीनों बाद शरद ने अपने पैरों पर फिर से खड़ा होना शुरू किया. धीरे-धीरे उन्होंने चलना, बाइक और कार चलाना, और अंततः अपनी नौकरी पर लौटना शुरू कर दिया. आज वे बिना किसी दर्द या असुविधा के सामान्य जीवन जी रहे हैं, जो न केवल उनके लिए, बल्कि चिकित्सा समुदाय के लिए भी एक प्रेरणास्पद उपलब्धि है.

भारत में दुर्लभ मामला: कम उम्र में घुटना प्रत्यारोपण
डॉ अरोड़ा ने बताया कि भारत में इतनी कम उम्र में टोटल नी रिप्लेसमेंट के मामले दुर्लभ होते हैं. यह केस बताता है कि यदि सटीक डायग्नोसिस, आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञता मिल जाए, तो असंभव भी संभव हो सकता है. यह रही आपकी दी गई सामग्री को आधारित एक पेशेवर, स्पष्ट और प्रेरणादायक केस स्टडी, जिसमें बीमारी, सर्जरी की असफलताएं, खतरे, इलाज की प्रक्रिया और परिणामों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है:

केस स्टडी 3 : बार-बार असफल सर्जरी के बाद, जब बचाने की उम्मीद भी टूट चुकी थी – उसी पैर पर फिर से खड़ा हुआ इंसान
रोगी का परिचय
नाम: राहुल चतुर्वेदी
उम्र: 35 वर्ष
निवास: रामप्रसाद कॉलोनी, आनंद विहार (दिल्ली)
पेशा: सीनियर टेक्निकल अकाउंट मैनेजर, हांगकांग बेस्ड कंपनी

साल 2014 की एक रात, ऑफिस की नाइट शिफ्ट के बाद राहुल अपने दोस्त के साथ बाइक पर घर लौट रहे थे. रास्ते में उन्हें नींद लग गई और वे सड़क हादसे का शिकार हो गए. दुर्घटना इतनी गंभीर थी कि उनकी फीमर बोन (जांघ की हड्डी) कई टुकड़ों में टूट गई. पहला इलाज एक निजी अस्पताल में हुआ, लेकिन सर्जरी विफल रही. संक्रमण, सूजन और असहनीय दर्द के चलते राहुल का चलना-फिरना तो दूर, करवट लेना भी मुश्किल हो गया.

इलाज के असफल प्रयास: कई सर्जरी, बढ़ती जटिलताएं
2014 से 2016 के बीच, राहुल ने तीन अलग-अलग जगहों पर सर्जरी करवाईं:
1. पहली सर्जरी (दिसंबर 2014): असफल.
2. दूसरी सर्जरी (निजी अस्पताल): फिर से रॉड डाली गई, लेकिन सूजन और दर्द और बढ़ गया.
3. तीसरी सर्जरी (सरकारी अस्पताल): डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए. कहा गया कि अब हड्डियों में न तो रॉड डाली जा सकती है, न प्लेट लग सकती है. हड्डियाँ इतनी कमजोर थीं कि  मामूली दबाव में टूट सकती थीं.

इन वर्षों में राहुल लगभग बिस्तर पर ही सीमित हो गए. नौकरी छूट गई, आत्मविश्वास टूट गया, और मानसिक स्थिति भी प्रभावित होने लगी. मार्च 2022 में होली के दिन, एक मामूली फिसलन से राहुल फिर गिर पड़े. जिस हड्डी को किसी तरह जोड़ा गया था, वह दोबारा टूट गई. जब उन्होंने फिर से सरकारी अस्पताल में दिखाया, तो डॉक्टरों ने कहा "अब पैर काटना पड़ सकता है." राहुल के मुताबिक "उस दिन लगा कि अब जिंदगी यहीं खत्म हो गई. सब कुछ अंधकार में डूब गया."

एक दोस्त ने राहुल को दिल्ली के प्रसिद्ध ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा के बारे में बताया. सितंबर 2022 में उन्होंने डॉ. अरोड़ा से परामर्श लिया.
डॉ. दीपक अरोड़ा बताते हैं: राहुल का केस बेहद जटिल था. हड्डियाँ कई बार की सर्जरी के बाद भी नहीं जुड़ी थीं. संक्रमण और संरचनात्मक कमजोरी को देखते हुए हमें एक विस्तृत प्लानिंग करनी पड़ी.

उन्नत तकनीक और सूक्ष्म सर्जरी
1. काउंसलिंग और मानसिक तैयारी: राहुल को विश्वास दिलाना कि उनका इलाज संभव है.
2. एडवांस इमेजिंग: डिजिटल स्कैन और 3D प्लानिंग के माध्यम से सटीक स्थिति का विश्लेषण.
3. विशेष इम्प्लांट का उपयोग: राहुल की कमजोर हड्डियों के अनुसार कस्टमाइज्ड इम्प्लांट.
4. बोन ग्राफ्टिंग तकनीक: जहां हड्डी का प्राकृतिक पुनर्निर्माण नहीं हो सकता था, वहां बोन ग्राफ्ट का सहारा लिया गया.
5. इन्फेक्शन कंट्रोल: पिछली सर्जरियों से उत्पन्न संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए विशेष प्रोटोकॉल.सर्जरी सफल रही. डॉक्टर ने छह महीने तक आराम और धीरे-धीरे पुनर्वास की सलाह दी.

परिणाम : पूरी तरह से नई जिंदगी
राहुल ने डॉक्टर की सलाह का पूरी तरह पालन किया. जून 2023 में वे वापस ऑफिस जाने लगे. आज वे बिना सहारे चल सकते हैं लंबी ड्राइव पर जा सकते हैं (यहां तक कि पहाड़ों तक) चाइना तक ट्रैवल कर चुके हैं और सबसे बड़ी बात, अब दर्द मुक्त जीवन जी रहे हैं. 

केस स्टडी 4 : दोनों हिप रिप्लेसमेंट के बाद 'दिव्यांग' कहे जाने वाला मेकअप आर्टिस्ट बना आत्मविश्वास से भरा रनवे मॉडल 
रोगी का परिचय
नाम: गौरव
उम्र: 29 वर्ष
निवास: दिल्ली
पेशा: मेकअप आर्टिस्ट और रनवे मॉडल

गौरव एक प्रोफेशनल मेकअप आर्टिस्ट और रनवे मॉडल हैं. उनके लिए चलना, पोज़ देना और आत्मविश्वास से स्टेज पर उतरना ही पेशे का अहम हिस्सा था, लेकिन कुछ साल पहले उनकी जिंदगी में ऐसा मोड़ आया जिसने उन्हें शारीरिक ही नहीं, मानसिक रूप से भी तोड़ दिया. गौरव बताते हैं लोग मुझे पीछे से 'लंगड़ा' कहकर बुलाते थे. बाइक चलाना तो दूर, चलना भी मुश्किल हो गया था. मुझे लगा, मेरी उम्र में इतनी बड़ी बीमारी मुझे ही क्यों मिली? मैं नौकरी खो चुका था, और ऑफिस तक भी नहीं जा सकता था.

बीमारी का कारण: AVN – जब हड्डियों में खून पहुंचना बंद हो जाए
गौरव के दोनों कूल्हों की हड्डियों (Hip Joints) में Avascular Necrosis (AVN) नामक बीमारी हो गई थी, यह एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें हड्डियों को रक्त सप्लाई बंद हो जाती है और हड्डी धीरे-धीरे खराब होने लगती है. इस बीमारी में तेज दर्द होता है. चलना-फिरना असंभव हो जाता है और मरीज का आत्मविश्वास पूरी तरह टूट जाता है.

इलाज की असफल कोशिशें और डर
गौरव ने कई डॉक्टरों से सलाह ली. कई डॉक्टरों ने इलाज से इनकार कर दिया या कहा “सर्जरी के बाद भी शायद आप कभी सामान्य नहीं चल पाएंगे. आप लंगड़ा हो सकते हैं.” इन बातों से गौरव और उनका परिवार पूरी तरह निराश हो गया. वे मानसिक तनाव और सामाजिक उपेक्षा के दौर से गुजरने लगे.
गौरव की मां पहले से ही डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा की मरीज रह चुकी थीं, उन्होंने बेटे के बारे में बताया और डॉ. अरोड़ा ने तुरंत मिलने के लिए बुलाया.

सर्जिकल प्रक्रिया: दोनों हिप्स का रिप्लेसमेंट 
सितंबर 2022 को गौरव की Bilateral Total Hip Replacement (दोनों कूल्हों का पूरा प्रत्यारोपण) की सर्जरी की गई.  डॉ. दीपक अरोड़ा बताते हैं गौरव का केस बहुत जटिल था. उनकी उम्र महज़ 29 वर्ष थी और दोनों हिप जॉइंट पूरी तरह नष्ट हो चुके थे. सबसे बड़ी चिंता यही थी कि क्या वे दोबारा मॉडलिंग कर पाएंगे? हमने अत्याधुनिक तकनीक और सटीक योजना से सर्जरी की.

सर्जरी में उपयोग की गई तकनीकें:
1. मिनिमली इनवेसिव अप्रोच (कम कट और कम रक्तस्राव)
2. हाई-ड्यूरेबिलिटी इम्प्लांट्स
3. कंप्यूटर गाइडेड प्लानिंग
4. त्वरित रिकवरी प्रोटोकॉल

सर्जरी के कुछ ही हफ्तों बाद गौरव ने चलना शुरू कर दिया, गौरव ने बताया कि एक महीने बाद उन्होंने अपने आप को परखा और वह अकेले ट्रेन से खाटू श्याम मंदिर गए और उस वक्त एक बार भी नहीं लगा कि उनकी हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी हुई है. उन्हें लगा जैसे मैंने नया जन्म लिया है.

गौरव फिर से रनवे पर लौटे
आज गौरव आत्मविश्वास से भरे स्टेज पर उतरते हैं, वॉक करते हैं, पोज देते हैं और अपने काम में पहले से ज्यादा सक्रिय हैं उनकी चाल में सिर्फ रफ्तार नहीं, बल्कि उम्मीद की एक कहानी चलती है.

निष्कर्ष: रोबोटिक ऑर्थोपेडिक सर्जरी, नई जिंदगी का रास्ता
इस केस स्टडी ने यह साबित कर दिया कि रोबोटिक्स और इंसानी विशेषज्ञता का संगम असाधारण चमत्कार कर सकता है. यह तकनीक न सिर्फ मेडिकल परिणामों को बेहतर बनाती है, बल्कि लोगों को दोबारा चलने और जीने की वजह भी देती है.
 


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