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आखिर क्यों गिर रहा है रुपया, बिल्कुल आसान भाषा में समझिए

ऐसा नहीं है कि रुपया हमेशा से ही इतना कमजोर रहा है. 1947 में एक डॉलर की कीमत सिर्फ 3.33 रुपये थी, जो 1985 में बढ़कर 12.38 रुपये हो गई.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

नई दिल्ली: देश आजकल दो चिंताओं में लिपटा हुआ है, विराट कोहली के बल्ले से रन क्यों नहीं बन रहे और डॉलर के मुकाबले रुपया पतला क्यों होता जा रहा है. खैर विराट कोहली का बैट आज नहीं तो कल बोलेगा, क्योंकि ये तो कोहली भाई के हाथ में हैं, एक सेंचुरी और पब्लिक खुश, लेकिन अगर रुपया सेंचुरी की तरफ बढ़ गया तो नई मुसीबत खड़ी हो जाएगी.

रुपया गिर क्यों रहा है और डॉलर मजबूत क्यों हो रहा है, अगर आपको लगता है कि इस सवाल से मुझे क्या लेना देना, इससे मेरी सेहत पर क्या ही फर्क पड़ेगा. तो भाई साहब जरा इस बात को गांठ बांध लीजिए कि अगर रुपया पतला होगा तो आपकी सेहत भी ठीक नहीं रहेगी. ये बात आपको इस आर्टिकल के खत्म होने से पहले पहले समझ आ जाएगी. 

रुपये की कीमत कौन तय करता है

तो सबसे पहले यही समझ लेते हैं कि रुपये डॉलर के मुकाबले कमजोर और मजबूत कैसे होता है, मतलब आप सुनते होंगे कि रुपया आज 10 पैसे मजबूत हो गया या 10 पैसे कमजोर हो गया, ये कैसे तय होता है. सोचिए अगर एक डॉलर की कीमत एक रुपये होती तो लाइफ कितनी मस्त और आसान होती, इस जिरह बहस की नौबत ही नहीं आती, लेकिन ऐसा नहीं है. 1 डॉलर के लिए आपको आजकल 79 रुपये खर्च करने होंगे. हालांकि ऐसा नहीं है कि रुपया हमेशा से ही इतना कमजो रहा है. 1947 में एक डॉलर की कीमत सिर्फ 3.33 रुपये थी, जो 1985 में बढ़कर 12.38 रुपये हो गई और धीरे धीरे 1995 में 32.42 रुपये और आज की तारीख में ये 79 डॉलर के ऊपर है. 

अब आते हैं अपने मूल सवाल पर कि रुपये की कीमत आखिर तय कौन करता है, कोई राजा, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति... तो इसका जवाब है इनमें से कोई नहीं. रुपये की कीमत के पीछे सारा खेल डिमांड सप्लाई का है. अब आप कहोगे की डिमांड सप्लाई का खेल तो सामानों की खरीद फरोख्त में होता है, इसमें रुपया और डॉलर कहां से आ गया. तो इसे ऐसे समझिए कि लोग करेंसी देकर करेंसी खरीदते हैं. जैसे आप अगर रूस घूमने जाएंगे तो वहां खर्च करने के लिए आपको रूबल्स चाहिए, तो पहले आप रुपये देकर रूबल्स खरीदेंगे और फिर होटल, कैब, खाने का बिल चुकाएंगे. इसके लिए जगह जगह करेंसी एक्सचेंज खुले होते हैं. इस सीन में आप रुपये देकर रूबल्स खरीद रहे हैं, इसमें रूबल्स मजबूत होगा. ऐसे ही मान लीजिए कोई अमेरिकी कंपनी भारत में अपना प्लांट या फैक्ट्री लगाना चाहती है तो उसे रुपयों की जरूरत पड़ेगी, वो भारत में पहले अपने डॉलर्स को रुपये में कन्वर्ट करेगी और फिर बिजनेस सेटअप पर खर्च करेगी. तो यहां पर अमेरिकी कंपनी ने डॉलर देकर रुपये खरीदे हैं. अगर आपको अब भी लगता है कि इससे आपको क्या लेना-देना तो इसको अब ऐसे समझिए कि अगर 1 डॉलर की कीमत अभी 79 रुपये है तो आपको आईफोन के लिए 1 लाख रुपये चुकाने होते हैं. अगर एक डॉलर की कीमत बढ़कर 85 या 90 रुपये हो गई तो आपको आईफोन के लिए 1 लाख से ज्यादा देने होंगे. क्योंकि आईफोन का भारत में इंपोर्ट होता है. जिसका पेमेंट डॉलर में करना होता है. तो मोटा मोटा ये कॉन्सेप्ट आपको समझ आया होगा कि लोग करेंसी खरीदते हैं और यही डिमांड सप्लाई की चेन रुपये की कीमत तय करती है.  

सरकार कुछ करती क्यों नहीं

अब सवाल ये उठता है कि अगर रुपया कमजोर हो रहा है तो देश का रिजर्व बैंक और सरकार कुछ करती क्यों नहीं. देखिए सभी देशों के पास अपना फॉरेक्स रिजर्व होता है, यानी डॉलर का भंडार, जो तब काम आता है जब हमें विदेश कर्ज चुकाना होता है. रिजर्व बैंक जब ये देखता है कि रुपये बहुत कमजोर हो रहा है तो वो सरकार से इस बारे में बात करता है और जरूरत पड़ने पर बाजार में कुछ डॉलर को बेच देता है जिससे मार्केट में डॉलर की सप्लाई बढ़ जाती है. इसके अलावा सरकार इंपोर्ट को भी सख्त कर देती है ताकि बाहर से सामान न मंगवा सकें और डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर न हो. क्योंकि इंपोर्ट में आप रुपया देकर डॉलर खरीदते हैं जिससे रुपया और कमजोर होता है. सरकार एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने वाली पॉलिसी का ऐलान करती है, ताकि विदेशों के लोग भारत से सामान खरीदें जिससे रुपये की डिमांड बढ़ेगी और ये मजबूत होगा. इसलिए किसी देश को अपनी करेंसी को मजबूत रखना है तो उसे अपने एक्सपोर्ट को बढ़ाने पर फोकस करना चाहिए और इंपोर्ट को घटाने की कोशिश. 

रुपया क्यों गिर रहा है?

अब रुपया गिर क्यों रहा है, इसके कई जवाब है या यूं कह लीजिए कि कई वजहें हैं. सबसे बड़ी वजह है कि कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त तेजी चल रही है, कच्चा तेल 100 डॉलर के पार चला गया है. हम अपनी जरूरत का 80 परसेंट तेल इंपोर्ट करते हैं, जिससे रुपया कमजोर होता है. पूरी दुनिया में सुस्ती का माहौल है, भारत भी इससे अछूता नहीं है, निवेशक भारत से पैसा निकालकर डॉलर में निवेश कर रहे हैं, जिससे रुपया कमजोर हो रहा है. पिछले साल तक भारत में कई बड़ी कंपनियों के IPO आए, जिसमें विदेशी निवेशकों ने पैसे डाले लेकिन जब बाजार गिरने लगा तो निवेशकों ने अपना पैसा निकाल लिया अमेरिका लगातार ब्याज दरें बढ़ा रहा है, जुलाई के अंत में भी US फेड ब्याज दरें बढ़ाएगा. इससे डॉलर असेट्स पर मिलने वाला रिटर्न बढ़ेगा और भारत की मुश्किलें भी बढ़ेंगी.

1 डॉलर 1 रुपये के बराबर हो तो?
अगर 1 डॉलर के मुकाबले रुपया 79 डॉलर है तो क्या रिजर्व बैंक फिर से इसे 1 रुपया नहीं कर सकता. इसका जवाब है, अगर रिजर्व बैंक ऐसा कर भी सकता तो करेगा नहीं. क्योंकि 1 डॉलर अगर 1 रुपये के बराबर हो जाएगा तो इससे भारत का ही नुकसान है. भारत के IT और तमाम सेक्टर्स के प्रोफेशनल्स अमेरिका के लिहाज से काफी सस्ते होते हैं और इसलिए अमेरिकी कंपनियां उन्हें नौकरी देती है. अब अगर डॉलर-रुपया बराबर हो गया तो उसे भारत के प्रोफेशनल्स को हायर करने की क्या जरूरत, वो अमेरिकी को ही नौकरी दे देगा. इसके अलावा जिस किसी के पास भी थोड़ा पैसा है वो देश छोड़कर फुर्र हो जाएगा. दोनों देशों के बीच कारोबार व्यापार का पूरा इको सिस्टम ही चौपट हो जाएगा. क्योंकि कोई अमेरिकी कंपनी भारत सस्ते वर्कर्स और किफायती बिजनेस सेटअप देखकर आती है वो क्यों आएगी, वो अमेरिका में ही अपना बिजनेस लगाएगी. 

 

 


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