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डॉलर की मजबूती के बाद भी अमेरिका में क्यों बढ़ी महंगाई, जानें इस बारे में एक्सपर्ट की राय

एक्सपर्ट के मुताबिक अमेरिका में महंगाई का फिलहाल डॉलर की मजबूती से ऐसा कोई खास लेना-देना नहीं है. महंगाई का वहां पर 9 फीसदी के पार चले जाने के कारण दूसरे हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

नई दिल्लीः (अनंत पालीवाल) महंगाई का आलम पूरे विश्व में है. यह भारत समेत उन देशों में भी हैं जहां डॉलर के मुकाबले अन्य देशों की करेंसी कमजोर है और अमेरिका में भी, जहां महंगाई का आंकड़ा इस बार 9 फीसदी के पार चला गया है. वहां पर ये हाल तब है जब अमेरिकी डॉलर यूरो को अगर छोड़ दें तो फिर अन्य करेंसी के मुकाबले काफी मजबूत स्थिति में है.

महंगाई का नहीं है डॉलर की मजबूती से लेना देना

 एक्सपर्ट के मुताबिक अमेरिका में महंगाई का फिलहाल डॉलर की मजबूती से ऐसा कोई खास लेना-देना नहीं है. महंगाई का वहां पर 9 फीसदी के पार चले जाने के कारण दूसरे हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर आलोक पुराणिक के मुताबिक अमेरिका में  ज्यादातर लोग काम पर वापस नहीं लौटे हैं. कोरोना के शुरू होने के बाद अमेरिकी प्रशासन ने लोगों के खाते में रुपये भेजना शुरू किया ताकि वो अपनी जरूरतों को पूरा कर सकें. हालांकि अब कोरोना के केस वहां पर कम हो गए हैं, लेकिन लोगों को हर महीने एकमुश्त पैसा मिलने से मुफ्तखोरी की आदत पड़ गई है. इसलिए महंगाई बढ़ गई है.

अमेरिका में पड़ा वस्तुओं की सप्लाई पर असर

वहीं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अरूण कुमार ने BW Buisnessworld Hindi से बातचीत में कहा कि लेबर वर्कफोर्स को अमेरिका में जो राशि उनके गुजारे के लिए मिल रही थी, वो अब मिलनी बंद हो गई है. इसके बावजूद भी लोग काम पर लौट नहीं रहे हैं. महिलाएं जो वर्कर्स के हिसाब से काम करती थी, वो अभी भी घरों में रह रही हैं, क्योंकि कोरोना की वजह से उनके बच्चे भी घरों में हैं. ऐसे में उनको अभी घर बैठ कर ज्यादा काम नहीं मिल रहा है. इससे वहां पर उत्पादन और वस्तुओं की सप्लाई पर असर पड़ा है, जिससे सारी वस्तुएं महंगी हो गईं हैं.

महंगाई में बढ़ोतरी

 HDFC Bank के चीफ इकोनॉमिस्ट अभिक बरूआ के मुताबिक अमेरिका में पेट्रोल, ग्रोसरी, रेंट, डेंटल केयर तक सबकुछ बहुत ज्यादा महंगा हो चुका है. वहीं वर्कर्स की शॉर्ट सप्लाई की वजह से उनको मिलने वाले प्रति घंटे मजदूरी में 1 फीसदी की कमी पिछले एक महीने में देखी गई है और यह पिछले एक साल के मुकाबले 3.6 फीसदी कम है. अरूण कुमार के मुताबिक अमेरिका के असंगठित क्षेत्र में जो डिमांड पहले थी वो कम हो गई है या फिर संगठित क्षेत्र में शिफ्ट हो गई है. सप्लाई बिलकुल न के बराबर रह गई है.

विश्व भर में डॉलर क्यों हो रहा है मजबूत

अब एक सवाल यहां पर भारत के नजरिए से ये भी उठ रहा है कि अमेरिका में डॉलर की मजबूती के बावजूद महंगाई है तो वहां ऐसा क्यों हो रहा है? इसका जवाब है महंगाई से निपटने में डॉलर का मजबूत होना भी मदद नहीं कर सकता है. बरूआ के मुताबिक करेंसी का मजबूत या फिर कमजोर होना और महंगाई में उतार चढ़ाव होना दो अलग-अलग पहलू हैं. इनको अगर एक ही नजर से देखेंगे तो आपको एकबारगी लगेगा कि दोनों एक दूसरे से जुड़े हैं लेकिन अर्थशास्त्र की नजर में ऐसा नहीं है.

प्रोफेसर आलोक पुराणिक के हिसाब से कच्चे तेल की मांग कोरोना के बाद पूरे विश्व में बढ़ रही है, जिससे तेल की कीमतों में भी वृद्धि हो गई है. चीन ने जहां कच्चे तेल का स्टोरेज शुरू कर दिया है, वहीं यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस से कच्चा तेल नहीं आ रहा है. रूस के पास पूरी दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार है.  

कच्चे तेल की कीमतों में कोरोनाकाल में पहले बहुत कमी हुई थी. अब तेजी की वजह से भी डॉलर मजबूत हो गया है.

प्रोफेसर अरूण कुमार के मुताबिक आज डॉलर खासतौर पर अमेरिकी डॉलर की जो इमेज पूरे विश्व में है वो रिजर्व करेंसी के तौर पर है. आप भारत या फिर किसी अन्य देश की करेंसी को बाहर लेकर के जाते हैं तो उसको वो वैल्यू नहीं मिलेगी. वहीं अगर आपके पास डॉलर होंगे तो आपकी इज्जत काफी बढ़ जाएगी. डॉलर उतना ही भरोसेमंद है जितना की गोल्ड. जैसे गोल्ड की पूरे विश्व में वैल्यू है वैसे ही डॉलर की है.

भारत के रुपये में कमजोरी क्यों?

RBI की एक रिपोर्ट के अनुसार, जून के महीने में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफपीआई) द्वारा 49,469 करोड़ रुपये निकाल लिए गए जो कि मार्च 2020 के बाद सबसे ज्यादा है. रुपये में जो कमजोरी आई है उसके पीछे यह एक बहुत बड़ा कारण है. 2022-23 में एफपीआई द्वारा कुल 1.2 लाख करोड़ रुपये भारतीय इक्विटी मार्केट से निकाल लिए है. डॉलर इंडेक्स में मजबूती होना दूसरा सबसे बड़ा कारण है जिससे रुपया कमजोर हुआ है.

VIDEO: डॉलर और यूरो की वैल्यू बराबर हुई, जानिए क्या हैं इसके मायने


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