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फेविकोल जैसी मजबूत जोड़ी में कैसे आई दरार, क्या है IndiGo से गंगवाल की जुदाई की कहानी?

राकेश गंगवाल ने हाल ही में एक बड़ी ब्लॉक डील के जरिए देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेच दी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

ऐसे समय में जब एविएशन सेक्टर में एंट्री एयर टर्बुलेंस में फंसे विमान जितनी ही जोखिमभरी थी, राहुल भाटिया और राकेश गंगवाल ने इंडिगो को लॉन्च किया.  अपने अनुभव और रणनीति की बदौलत उन्होंने इंडिगो की सफलता की कहानी लिखी. दोनों के बीच गज़ब का तालमेल था. मार्केट की ज़रूरत के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता और बाजार की चुनौतियों को हर हाल में मात देने के जुनून ने इस जोड़ी को सफल लीडर के रूप में पेश किया. फिर अचानक फेविकोल सी मजबूत नज़र आने वाले इस रिश्ते में दरार आ गई.  राकेश गंगवाल इंडिगो का कॉकपिट छोड़कर बाहर आ गए. 

11,000 करोड़ के शेयर बेचे
साल 2022 की शुरुआत में राकेश गंगवाल ने कंपनी के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया और धीरे-धीरे कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बेचने की घोषणा कर डाली. यानी उन्होंने इंडिगो को हमेशा के लिए अलविदा कहना का मन बना लिया था. इसके बाद वह बीच-बीच में अपनी हिस्सेदारी घटाते चले गए और अभी हाल ही में उन्होंने ब्लॉक डील के जरिए लगभग 11,000 करोड़ रुपए शेयर बेच दिए. बताया जा रहा है कि अब राकेश गंगवाल की इंडिगो में कोई हिस्सेदारी शेष नहीं है. जून 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, राकेश गंगवाल के पास कंपनी की लगभग 6 प्रतिशत इक्विटी थी. जबकि उनके फैमिली ट्रस्ट द चिंकरपू फैमिली ट्रस्ट के पास 13.49% हिस्सेदारी थी.

2006 में हुई थी शुरुआत 
इंडिगो की शुरुआत साल 2006 में राहुल भाटिया ने राकेश गंगवाल के साथ मिलकर की थी. आज के समय में यह देश की सबसे बड़ी एयरलाइन है. एविएशन सेक्टर में इंडिगो की बाजार हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से ज्यादा है. राहुल भाटिया दिल्ली के रहने वाले हैं, जबकि राकेश गंगवाल अमेरिका में रहते हैं. बिज़नेस की डोर दोनों को करीब लेकर आई थी. गंगवाल कई बड़ी एयरवेज कंपनियों में काम कर चुके थे. उन्हें एविएशन सेक्टर की काफी नॉलेज थी. लिहाजा, भाटिया ने उनके सामने एयरलाइन शुरू करने का प्रस्ताव रखा. दोनों ने तमाम चुनौतियों के बावजूद इस दिशा में कदम बढ़ाया. इंडिगो को 2004 में ही लाइसेंस मिल गया था, लेकिन इसकी सेवाएं 2006 तक शुरू हो सकीं क्योंकि उसके पास विमान नहीं थे.

गंगवाल की बदौलत मिले प्लेन 
राकेश गंगवाल ने अपने कांटेक्ट और अनुभव का इस्तेमाल करते हुए एयरबस से उधार पर 100 विमान हासिल किए और इस तरह चार अगस्त 2006 को इंडिगो ने अपनी पहली उड़ान भरी. हालांकि, नई-नवेली इंडिगो के सामने चुनौतियों का अंबार था. उसे ज्यादा से ज्यादा यात्रियों को अपनी तरफ आकर्षित करना था, ताकि आकाश में मौजूद दूसरी दिग्गज कंपनियों के बीच खुद को बचाए रखा जाए. नई एयरलाइन पर भरोसा एकदम से नहीं होता, इसलिए इसकी संभावना ज्यादा नहीं थी कि अमीर यात्री इंडिगो के लिए अपनी फेवरेट एयरलाइन से नाता तोड़ेंगे. ये वो दौर था जब हवाई सफर आज जितना आसान नहीं था. इसकी सबसे बड़ी वजह थी किराया. इसलिए इसे अमीरों का साधन करार दे दिया गया था. इसी को ध्यान में रखते हुए IndiGo ने पहले आम यात्रियों पर फोकस का निर्णय लिया.

काम कर गया दांव 
कहने का मतलब है कि इंडिगो ने सस्ते हवाई टिकट पर जोर दिया. महंगे पेशे में सस्ते की पेशकश जोखिम भरा काम तो था, लेकिन राहुल भाटिया और राकेश गंगवाल ने दांव खेला और उनका ये दांव काम कर गया. इंडिगो के टिकट हाथों बिकने लगे और कंपनी जोखिम की आशंका को दूर छोड़ती हुई आगे निकल गई. इंडिगो ने बड़ी छलांग लगाने के लिए छोटे-छोटे मुद्दों पर भी गौर किया. उदाहरण के तौर पर कंपनी ने अपने टर्नअराउंड समय को कम करने के लिए कई ऐसे कदम उठाए, जिनकी बदौलत उसके विमानों के फेरे बढ़ गए. जाहिर है जब फेरे बढ़ेंगे तो मुनाफा भी होगा. इस तरह, कंपनी देश की सबसे बड़ी एयरलाइन बन पाई. 

मनमुटाव और मनभेद
अक्सर सफलता की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद अपनों में मनमुटाव और मनभेद उजागर हो जाते हैं. इंडिगो के मामले में भी ऐसा हुआ. राकेश और राहुल की सफल जोड़ी में पहले वाली अंडरस्टैंडिंग  का अभाव नज़र आने लगा. उनके बीच मुद्दों पर असहमति आम हो गई. दोनों में इस बात को लेकर झगड़ा हुआ कि एयरलाइन को कौन और कैसे चलाएगा. 2022 की शुरुआत में जब इंडिगो ने राहुल भाटिया को प्रबंध निदेशक के रूप में नामित किया, तब गंगवाल ने निदेशक पद इस्तीफे से दे दिया. बताया जाता है कि गंगवाल ने कंपनी के आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन के नियमों में बदलाव की मांग की थी, लेकिन उनकी मांगों को स्वीकार नहीं किया गया. गंगवाल इससे इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने इंडिगो से पूरी तरह नाता तोड़ने का ऐलान कर डाला. हाल ही में कंपनी में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने के साथ ही उन्होंने बाकायदा ऐसा कर दिखाया है. 


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