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डिजिटल बदलाव के लिए तैयार है Asia Pacific, लेकिन बदलाव की गति को लेकर है चिंतित- रिपोर्ट

क्या बिज़नेस और सरकार के नेता इस बदलाव की क्रांति को सही दिशा दे सकते हैं? Ipsos Understanding Asia रिपोर्ट में यही सवाल उठाया गया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

एशिया-पैसिफिक क्षेत्र (जिसमें भारत समेत 11 देश शामिल हैं) के लोग, नई तकनीक और AI को अपनाने के बावजूद, भविष्य को लेकर काफी चिंतित हैं. यह जानकारी इप्सॉस (Ipsos) की एक नई रिपोर्ट में सामने आई है. इप्सॉस, जो मार्केट रिसर्च में ग्लोबल लीडर है, ने Global Trends: Understanding Asia रिपोर्ट जारी की. यह रिपोर्ट एशिया-पैसिफिक क्षेत्र को प्रभावित करने वाले खास मुद्दों पर गहराई से नजर डालती है.

यह रिपोर्ट Ipsos Global Trends के 8वें एडिशन के डेटा पर आधारित है. इस सर्वे में 50 देशों के 50,000 लोगों से बातचीत की गई, जो इप्सॉस के इतिहास का सबसे बड़ा पब्लिक सर्वे है. 2025 तक एशिया-पैसिफिक के उपभोक्ताओं के लिए तीन प्रमुख रुझान (Trends):

Technowonder (तकनीक की अद्भुत दुनिया)

दुनिया के कई हिस्सों में लोग AI के फायदों और नुकसानों पर बंटे हुए हैं, लेकिन एशिया में लोग तकनीकी प्रगति को लेकर उत्साहित हैं. एशिया-पैसिफिक में 68% लोग मानते हैं कि AI दुनिया पर सकारात्मक असर डाल रहा है, जबकि ग्लोबली यह आंकड़ा सिर्फ 57% है.  वहीं चीन नए टेक्नोलॉजी को अपनाने में सबसे आगे है और सर्वे में शामिल 50 देशों में पहले स्थान पर है.

हालांकि, इसके बावजूद, कई APAC देशों ने AI को लेकर चिंताएं जाहिर की हैं. भारत में 2013 से अब तक, 19% ज्यादा लोग मानते हैं कि तकनीकी प्रगति उनके जीवन को नुकसान पहुंचा रही है. जापान में यह आंकड़ा 18% बढ़ा है. वहीं AI और डेटा सुरक्षा को लेकर चिंताएं काफी ज्यादा हैं. एशिया-पैसिफिक में 70% लोग इस बात से परेशान हैं कि कंपनियां उनकी जानकारी कैसे इकट्ठा कर रही हैं. यह डर फिलीपींस (86%), थाईलैंड और सिंगापुर (दोनों 81%) में सबसे अधिक है. 

पुराने तरीकों की ओर वापसी (Retreat to old systems)
  
दिलचस्प बात यह है कि एशिया के युवा (खासतौर पर Gen Z) भविष्य को लेकर चिंतित हैं. एशिया-पैसिफिक के 57% Gen Z ने कहा कि वे चाहते कि वे अपने माता-पिता के बचपन के समय में बड़े हुए होते यह आंकड़ा वैश्विक स्तर (51%) से अधिक है. ब्रांड्स इस नॉस्टेल्जिया ट्रेंड (पुरानी यादों) का फ़ायदा उठा सकते हैं, जहां वे पुराने समय की परंपराओं को आधुनिक इनोवेशन के साथ जोड़कर पेश करें.

जलवायु परिवर्तन पर सहमति (Climate convergence)

जलवायु परिवर्तन (climate change) को लेकर सहमति है कि यह सच है और तुरंत कार्रवाई की ज़रूरत है. 10 में से 8 (84%) लोग मानते हैं कि अगर एशिया-पैसिफिक के देशों ने अपनी आदतें नहीं बदलीं, तो पर्यावरणीय आपदा होगी. वहीं ऑस्ट्रेलिया में यह चिंता 2013 के बाद से 15% बढ़ गई है.

एशिया-पैसिफिक के 73% लोग कहते हैं कि वे पहले से ही पर्यावरण बचाने के लिए जितना कर सकते हैं, कर रहे हैं. यह भावना खासतौर पर इंडोनेशिया (91%), थाईलैंड (89%), और फिलीपींस (87%) में सबसे अधिक है. वहीं 75% लोग मानते हैं कि कंपनियां पर्यावरण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही हैं. भारत, ताइवान, इंडोनेशिया और थाईलैंड के अधिकांश लोगों को लगता है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है. 

Ipsos के अधिकारियों का क्या कहना है?

Ipsos APEC के CEO हैमिश मुनरो ने कहा कि जैसे-जैसे एशिया-पैसिफिक का आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव एक जटिल और आपस में जुड़े हुए विश्व में बढ़ रहा है, इस क्षेत्र को समझने का महत्व पहले से कहीं ज्यादा हो गया है. यह रिपोर्ट दिखाती है कि उपभोक्ता और नागरिक तेज़ी से बदलती दुनिया में, खासतौर पर तकनीकी विकास, सामाजिक बदलाव और जलवायु परिवर्तन को लेकर क्या सोचते और महसूस करते हैं. यह एक ऐसा क्षेत्र है जो बदलाव को अपनाने के लिए तैयार है, लेकिन चाहता है कि बिज़नेस आगे बढ़कर नेतृत्व करें और बदलाव के इस सफर का मार्गदर्शन करें. 

जहां तक जलवायु परिवर्तन की बात है, उपभोक्ता मानते हैं कि ब्रांड्स का महत्वपूर्ण रोल है पर्यावरण पर हानिकारक प्रभावों को कम करने में ब्रांड्स के लिए यह एक बड़ा मौका है कि वे पर्यावरणीय नेतृत्व दिखाएं और जलवायु परिवर्तन की कोशिशों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित करें.

वहीं Ipsos इंडिया के CEO अमित अडारकर ने कहा कि भारत की कहानी मुख्य रूप से दो प्रमुख समूहों पर आधारित है – शहरी जनता और डिजिटल भारतीय. शहरी जनता इंटरनेट के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती. वहीं डिजिटल भारतीय, डिजिटल थकान (fatigue) महसूस कर रहे हैं और अपनी ज़िंदगी को आसान बनाना चाहते हैं.

भारत में स्वतंत्रता (individualism) के ट्रेंड को अपनाना दिलचस्प रहा. लोग तकनीक को अपनी स्थिति सुधारने और सीखने के लिए एक सहायक और साथी के रूप में देख रहे हैं. यह ट्रेंड खासतौर पर मिलेनियल्स और जेन Z में दिखा और इसे सकारात्मक माना गया.  हालांकि, चिंता की बात यह है कि भारतीयों में जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता घट रही है, जबकि यह समस्या सबको प्रभावित कर रही है. भारतीय ‘शुतुरमुर्ग नीति’ (Ostrich Policy) अपना रहे हैं, यानी तत्काल खतरे को नजरअंदाज करना और इसे भविष्य की समस्या मानना, यह एक गंभीर चिंता का विषय है.
 


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