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क्या लोकसभा चुनाव से पहले काबू में आ जाएगी महंगाई?

रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़े बताते हैं कि सकल पारिवारिक बचत और घरेलू जीडीपी सबसे खराब हालत में है. यह 4 फीसदी है, जो पिछले 30 साल में सबसे कम है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • अजय शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

वैश्विक और घरेलू कारणों से आगामी वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के पहले महंगाई काबू में आ जाएगी. इस रणनीति पर भारतीय रिजर्व बैंक काम कर रहा है. यह निष्कर्ष आरबीआई के डिप्टी गवर्नर माइकल देबव्रत पात्रा की टीम के आंकड़ों से सामने आया है. उनका दावा है कि घरेलू अर्थव्यवस्था 2023 तक 3,700 अरब डॉलर की होगी. भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में ब्रिटेन से आगे बना रहेगा. आरबीआई ने दावा किया कि वृहत आर्थिक मोर्चे पर स्थिरता मजबूत बनी हुई है. टीम के आंकड़े बताते हैं कि महंगाई को संतोषजनक दायरे में लाना मौद्रिक नीति का पहला लक्ष्य था, जिसे फिलहाल हासिल कर लिया गया है. अगला लक्ष्य 2023 में महंगाई को काबू में लाकर 2024 में लक्ष्य के मुताबिक महंगाई को काबू करना है. केंद्र और राज्यों ने राजकोषीय मजबूती को बढ़ाया है. संकेतकों के आधार पर चालू खाता घाटा कम होने की ओर बढ़ रहा है. यह 4.4 फीसदी पहुंच गया है. हालांकि, भारत का उभरता हुआ बाजार बीते साल की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई दे रहा है, लेकिन 2023 में उनका सबसे बड़ा जोखिम अमेरिकी मौद्रिक नीति और डॉलर से है.

रिपोर्ट से सामने आई चिंता
वैश्विक संस्था ऑक्सफैम ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2023 में अपनी रिपोर्ट  'सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट: द इंडिया स्टोरी' पेश की, जिसके मुताबिक, भारत में जहां वर्ष 2020 में अरबपतियों की संख्या 102 थी, वहीं 2022 में यह आंकड़ा 166 पर पहुंच गया है. यानी दो साल में 64 अरबपति बढ़ गए. यह रिपोर्ट स्विट्जरलैंड के दावोस में हुई वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्लूईएफ) में पेश की की गई. इसमें चिंता की बात यह है कि केवल 5 फीसदी अमीर भारतीयों के पास देश की कुल संपत्ति का 62 फीसदी हिस्सा मौजूद है, जबकि गरीब 50 फीसदी आबादी की संपत्ति में केवल 3 फीसदी की हिस्सेदारी है. कोरोना महामारी काल में देश के अरबपतियों की संपत्ति हर मिनट 121 फीसदी यानी करीब 2.5 करोड़ रुपये बढ़ी. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2020 में कोरोना महामारी शुरू होने के बाद से नवंबर 2021 तक जहां अधिकतर भारतीयों को नौकरी संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा, वहीं देश के बड़े अमीर मालामाल होते गये. ऐसे समय में जब देश मुश्किलों से जूझ रहा था और बेरोजगारी दर ऊंची बनी हुई थी, तब यह बढ़ोतरी नीतियों को लेकर चिंता पैदा करती है. भारत में आय और संपत्ति में बढ़ते असंतुलन को दूर करने के उपाय के लिए देश की सामाजिक आर्थिक नीतियों में सुधारकर ही निकाले जा सकते हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य तथा बुनियादी संरचना में निवेश बढ़ाना बेहद जरूरी है. अमीरों पर वेल्थ और कारपोरेट टैक्स बढ़ाने की फुलप्रूफ व्यवस्था की जाये, जिससे ये बुनियादी काम पूरे किये जा सकते हैं. 

बढ़त बनाए रखेगा भारत
स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2023 की पांच दिन चली सालाना बैठक से अर्थव्यवस्था के लिए एक अच्छी खबर भी आई है. वहां जलवायु, युद्ध और आर्थिक मुद्दों पर गहन चर्चा हुई. इस बार फोरम में भारत ने खुद को मजबूत तरीके से पेश किया है. साल 2023 में, वैश्विक मंदी की आशंका बनी हुई है. ऐसे में किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के श्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद कम है. रिपोर्ट के मुताबिक, विश्व बैंक संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए केवल 0.5% और चीन के लिए 4.3% की तुलना में 6.6% की वृद्धि का अनुमान लगा रहा है. इसमें उम्मीद की जा रही है कि भारत अपनी बढ़त को बनाए रखेगा, अगर ऐसा संभव हुआ तो, वो 2026 में दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले जर्मनी को भी पीछे छोड़ देगा. यही नहीं, साल 2032 में जापान को तीसरे पायदान से पछाड़ देगा. उम्मीद की जा रही है कि 2035 तक 10 ट्रिलियन डॉलर के सकल घरेलू उत्पाद के साथ भारत तीसरा देश बन जाएगा. भारत की अर्थव्यवस्था वर्तमान में लगभग 3.5 ट्रिलियन डॉलर की है, जो दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. डब्ल्यूईएफ के संस्थापक और कार्यकारी चेयरमैन क्लॉस श्वाब ने कहा कि एक बंटी हुई दुनिया में भारत का एक सुनहरा स्थान है. उन्होंने कहा कि भारत विश्व व्यवस्था में एक प्रमुख स्तंभ के रूप में उभर रहा है. हम जानते हैं कि भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी लक्ष्य भारत को विश्व की तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करना है. बकौल मोदी पूरी दुनिया भारत की तरफ उम्मीदों की नजर से देख रही है और यहां निवेश को आतुर है. हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है, जो हमारी ताकत है, जिसकी प्रतिभा और ज्ञान को पूरी दुनिया लेना चाहती है.

IMF ने दुनिया को चेताया
यहां हमें उन चिंताओं पर बात करना भी जरूरी है, जो वैश्विक मंच से सामने आई हैं. अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) प्रमुख क्रिस्टलीना जॉर्जीवा ने विश्व समुदाय से व्यावहारिक और सहयोगपूर्ण रुख बनाये रखने का अनुरोध करते हुए कहा कि आपस में विभाजित होने से वैश्विक जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में 7 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है. जॉर्जीवा ने बताया, अगर हम अब भी एकजुट नहीं हुए तो हमें अर्थव्यवस्था और अपने नागरिकों के हित के खिलाफ बड़े जोखिम का सामना करना होगा. उन्होंने कहा कि अगर मध्यम अवधि की वृद्धि संभावनाओं को देखें तो आपूर्ति शृंखला से जुड़े मसलों को हल करने का तरीका हमारी वृद्धि संभावनाओं को निर्धारित कर देगा. उन्होंने चेताया कि दुनिया को व्यावहारिक और सहयोग करने वाले रुख के साथ ही, समय रहते श्रम बाजार की स्थिति पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है. यह संकट भारत में काफी गंभीर है. मौजूदा हालात में आवश्यक है कि समान प्रतिस्पर्धा और रोजगार के अधिकतम अवसर पैदा करने वाली नीतियों पर सरकार काम करें. जब यह नीति बनेगी और लगातार आगे बढ़ने की दिशा में काम होगा, तभी अर्थव्यवस्था वैश्विक मंदी से बच सकेगी. इसके लिए महंगाई के साथ ही बेरोजगारी कम करना भी बेहद जरूरी है.

घरेलू GDP के हालात खराब
रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़े बताते हैं कि सकल पारिवारिक बचत और घरेलू जीडीपी सबसे खराब हालत में है. यह 4 फीसदी है, जो पिछले 30 साल में सबसे कम है. यह दर्शाता है कि किस तरह सामाजिक आर्थिक असमानता और घरेलू हालात हैं. चंद पूंजीपतियों के भरोसे अर्थव्यवस्था को सुपरफास्ट बताया जाता है मगर पूरे देश का आंकलन करने से यह पता चलता है कि देश में आर्थिक हालात ठीक नहीं हैं. घरेलू कर्ज भी लगातार बढ़ रहा है. देश के नागरिक, जिनमें युवा, किसान और कामगार शामिल हैं, आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं. पीपीटी अर्थव्यवस्था से देश खुशहाल नहीं बनता है. उससे चुनावी माहौल बनाया जा सकता है मगर वास्तव में आमजन को राहत देने की जरूरत होती है. वही होता नहीं दिखता, सिवाय चुनावी मौसम के. इसे समझना बेहद जरूरी है.


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