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वैश्विक मंदी और महंगे कर्ज से क्यों चरमराए शेयर बाजार?

अल्पकालिक अस्थिरता की आशंका के बावजूद, जो निवेशक सूचित रहते हैं और रणनीतिक फैसले लेते हैं, वे भविष्य में मिलने वाले अवसरों का लाभ उठा सकते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

दुनियाभर की विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में वित्तीय बाजार भारी उथल-पुथल का सामना कर रहे हैं. पहले की तरह यह गिरावट किसी एक अचानक झटके का परिणाम नहीं है, बल्कि यह मैक्रोइकॉनॉमिक (सामूहिक आर्थिक) और भू-राजनीतिक कारकों के मेल से पैदा हुई है. वैश्विक स्तर पर प्रमुख शेयर सूचकांक जैसे S&P, नैस्डैक, FTSE और DAX ने हाल के उच्चतम स्तरों से 10 से 15 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की है, जो यह दर्शाता है कि यह गिरावट केवल किसी एक बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि एक समन्वित वैश्विक प्रवृत्ति बन गई है.

अप्रैल 2025 में 4 ट्रिलियन डॉलर बाजार पूंजीकरण का नुकसान
ब्लूमबर्ग के अनुसार, सिर्फ कुछ हफ्तों में ही अप्रैल 2025 के दौरान वैश्विक बाजार पूंजीकरण में 4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की भारी गिरावट आई है, जिससे निवेशकों में गहरी चिंता फैल गई है. भारत का शेयर बाजार भी इससे अछूता नहीं रहा. BSE सेंसेक्स और NSE निफ्टी दोनों में 6 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है, जिससे लगभग ₹15 लाख करोड़ की पूंजी का नुकसान हुआ है. इस गिरावट के चलते विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारी बिकवाली कर रहे हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ा है और स्थानीय शेयर बाजार भी प्रभावित हुए हैं.

इस शेयर बाजार में आई भारी गिरावट की जड़ तीन प्रमुख कारणों में छुपी है. पहला कारण है अत्यधिक मुद्रास्फीति, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप के कई हिस्सों में। वर्ष 2023 और 2024 के दौरान लगातार ब्याज दरें बढ़ाए जाने के बावजूद, आवासीय लागत और श्रम लागत अब भी काफी अधिक बनी हुई हैं, जो सेवा क्षेत्र में मुद्रास्फीति के मुख्य कारण हैं. अमेरिका में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मार्च 2025 में सालाना आधार पर 3.5 प्रतिशत बढ़ा, जिससे फेडरल रिजर्व को अपनी नीतिगत ब्याज दर 5.2 प्रतिशत से ऊपर बनाए रखनी पड़ी, जो पिछले बीस वर्षों में सबसे अधिक है.

दूसरा कारण है वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अस्थिरता में हाल के महीनों में तेजी से हुआ इजाफा. इसका मुख्य कारण अमेरिका-चीन, रूस-यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष और मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव है. इन घटनाओं ने वैश्विक सप्लाई चेन को बुरी तरह बाधित किया है और तेल की कीमतों में भारी वृद्धि की है. इससे मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक विकास बनाए रखने के प्रयासों में और अधिक चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं.
तीसरा और शायद सबसे अहम कारण है वैश्विक आर्थिक वृद्धि में सुस्ती. आने वाले समय में वैश्विक मंदी और कमजोर कॉरपोरेट कमाई की आशंका बढ़ रही है, जिसका सीधा असर बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर पड़ा है, और यह प्रभाव अब विश्वभर के इक्विटी मूल्यांकन पर भी साफ़ दिखाई दे रहा है. इन कमजोर कॉरपोरेट नतीजों ने बिकवाली के दबाव को और बढ़ाया है, जिससे आर्थिक अनिश्चितता और गहराती जा रही है.

2008 की वित्तीय संकट, जो बैंकिंग क्षेत्र में प्रणालीगत विफलताओं के कारण उत्पन्न हुआ था, या 2020 की महामारी जनित गिरावट, जो आर्थिक गतिविधियों के अचानक रुक जाने से हुई थी. इनसे भिन्न, आज की अस्थिरता का कारण केंद्रीय बैंकों द्वारा जानबूझकर की गई मौद्रिक सख्ती है, जिसका उद्देश्य चल रही महंगाई से निपटना है. इसका वित्तीय प्रभाव उल्लेखनीय रहा है. भारत में खुदरा निवेशक, जिनमें से कई ने कोविड-19 के बाद के उछाल के दौरान शेयर बाजार में कदम रखा था, अब अपने शानदार पोर्टफोलियो को नकारात्मक होते देख रहे हैं. एसआईपी पर मिलने वाला रिटर्न सपाट हो गया है या घाटे में चला गया है, जबकि अधिकांश सेक्टर्स में म्यूचुअल फंड के एनएवी गिर रहे हैं. वे स्टार्टअप्स जो प्राइवेट इक्विटी और वेंचर फंडिंग पर निर्भर हैं, अब वैल्यूएशन में कटौती देख रहे हैं, वहीं कंपनियों को ऊँचे ब्याज दरों के कारण अपने पूंजी विस्तार योजनाओं को टालना पड़ रहा है.

इस अनिश्चितता के दौर में निवेशकों को घबराने की जरूरत नहीं है. इसके बजाय, उन्हें अपने पोर्टफोलियो के लिए एक अत्यंत रणनीतिक और विविधीकृत दृष्टिकोण अपनाना चाहिए. समझदारी से निवेश करना आवश्यक है ताकि एक संतुलित पोर्टफोलियो तैयार किया जा सके. एक संतुलित पोर्टफोलियो में 40 प्रतिशत निवेश लार्ज-कैप इक्विटी में, 20 प्रतिशत फिक्स्ड इनकम में, 15 प्रतिशत डिफेंसिव सेक्टर्स में, 15 प्रतिशत सोना या अन्य कमोडिटीज में और 10 प्रतिशत वैश्विक निवेश में होना चाहिए, साथ ही 6 से 9 महीनों के खर्च के लिए लिक्विडिटी रिजर्व भी होना चाहिए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निवेशकों को सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान्स (SIPs) को जारी रखना चाहिए, ताकि रूपया लागत औसत (rupee cost averaging) का लाभ उठाया जा सके और बाजार को टाइम करने से बचा जा सके.

वे सेक्टर जिनके लिए भारत के लिए उभरते हुए बाज़ार के अवसर खुले हैं, जैसे कि वस्त्र (टेक्सटाइल्स), इलेक्ट्रॉनिक्स और स्पेशलिटी केमिकल्स अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के बाद, वे आर्थिक चक्रों के प्रति कम संवेदनशील होते हैं और अपने स्थिर नकद प्रवाह (cash flow) के कारण बाज़ार गिरावट के दौरान बेहतर प्रदर्शन करने की संभावना रखते हैं. भारत के संदर्भ में, हेल्थकेयर, यूटिलिटीज और एफएमसीजी जैसे डिफेंसिव सेक्टर्स को आमतौर पर सुरक्षित और स्थिर माना जाता है. सुरक्षित निवेश विकल्पों के लिए, निवेशकों को सोने और सरकारी बॉन्ड्स (sovereign bonds) में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी चाहिए, क्योंकि ये परंपरागत रूप से ऊँची महंगाई और मुद्रा अस्थिरता के समय सुरक्षा कवच (hedge) के रूप में काम करते हैं. इसके अलावा, RBI फ्लोटिंग रेट बॉन्ड्स, सरकारी प्रतिभूतियाँ (government securities), और शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट म्यूचुअल फंड्स जैसे फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रूमेंट्स स्थिर रिटर्न देते हैं और पोर्टफोलियो जोखिम को कम करने के लिए आमतौर पर सुरक्षित माने जाते हैं.

मूल रूप से, वर्तमान बाजार में सुधार (market correction) कोई अभूतपूर्व घटना नहीं है. भले ही यह तेज और अस्थिर करने वाला हो, यह एक व्यापक मैक्रोइकनॉमिक बदलाव को दर्शाता है, जिसमें वैश्विक केंद्रीय बैंक महंगाई पर नियंत्रण को प्राथमिकता दे रहे हैं. अल्पकालिक अस्थिरता की उम्मीद की जा सकती है, लेकिन जो निवेशक जानकारीपूर्ण और रणनीतिक फैसले लेते हैं और अनुशासित संपत्ति आवंटन (disciplined asset allocation) का पालन करते हैं, वे भविष्य के अवसरों का सहज रूप से लाभ उठा सकेंगे.

अतिथि लेखिका: नेहा छाबड़ा रॉय,  एसोसिएट प्रोफेसर - फाइनेंशियल मॉडलिंग एंड रिस्क मैनेजमेंट (FMRM), NMIMS, बेंगलुरू


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