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वोडाफोन आइडिया: सरकार के लिए क्या नुकसान का सौदा बनेगी ये डील?

सरकार दूसरी बार वोडाफोन आइडिया की मदद कर रही है. हर दिन यह और साफ हो रहा है कि यह आर्थिक सुधार की कहानी नहीं, बल्कि सरकार की तरफ से बड़ी कंपनियों को बार-बार बचाने की कहानी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

पलक शाह

 

भारत सरकार खुद को वोडाफोन आइडिया (Vi) नाम की एक वित्तीय समस्या में फंसा चुकी है. वह लगातार करदाताओं के पैसे इस डूबती हुई टेलीकॉम कंपनी में डाल रही है, जिससे बाहर निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं दिख रहा. सरकार पर इस निवेश का भारी बोझ है, जिसे शायद ही वापस पाया जा सके. लेकिन दूसरी तरफ, बिरला समूह के प्रमोटर बिना किसी जवाबदेही के कंपनी का नियंत्रण और सभी रणनीतिक फायदे उठाते जा रहे हैं.

दिसंबर 2024 तक, Vi का कुल कर्ज ₹2.3 लाख करोड़ तक पहुंच चुका था, जिसे चुकाना कंपनी के लिए नामुमकिन है. इसमें ₹77,000 करोड़ का AGR बकाया और ₹1.4 लाख करोड़ का स्पेक्ट्रम कर्ज शामिल है, जो सीधे सरकार को देना है. सच्चाई यह है कि Vi शायद कभी भी यह कर्ज नहीं चुका पाएगी, फिर भी सरकार इसे करदाताओं के पैसे से जिंदा रखने की कोशिश कर रही है.

ऐसा क्यों हो रहा है? इसका कारण आर्थिक डर और कुछ कंपनियों को दिया जाने वाला खास फायदा है. अगर Vi डूबती है, तो इससे बाजार में घबराहट फैल सकती है, सरकार की छवि खराब हो सकती है, और निवेशकों को गलत संकेत मिल सकता है. इसके अलावा, Vi बंद होने से लाखों नौकरियां जा सकती हैं, बैंकों पर दबाव बढ़ सकता है, और 20 करोड़ ग्राहकों को परेशानी हो सकती है. इन सब से बचने के लिए सरकार हर हाल में Vi को जिंदा रखना चाहती है, भले ही इससे देश की आर्थिक सेहत और बाजार में प्रतिस्पर्धा को नुकसान हो.

इक्विटी कन्वर्जन का बड़ा धोखा

इस कहानी का नया मोड़ यह है कि सरकार ने Vi में अपनी हिस्सेदारी 23% से बढ़ाकर 49% कर ली है. यह हिस्सा कर्ज को इक्विटी में बदलकर लिया गया है. लेकिन यह जनता के पैसे को बचाने की कोशिश नहीं, बल्कि सिर्फ एक दिखावा है. सरकार के पास अब बहुमत की हिस्सेदारी तो आ गई, लेकिन कंपनी के संचालन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है, बिरला समूह अभी भी कंपनी को चला रहा है. सरकार के इस कदम को आर्थिक स्थिरता दिखाने की कोशिश कहा जा रहा है, लेकिन असल में यह सिर्फ कॉरपोरेट्स को बचाने की चाल है, जिसका पूरा बोझ करदाताओं को उठाना पड़ेगा.

सबसे खराब बात यह है कि यह इक्विटी कन्वर्जन वित्तीय समझदारी के खिलाफ है. Vi 3,695 करोड़ नए शेयर जारी करेगी, जिनका फेस वैल्यू ₹10 प्रति शेयर होगा. लेकिन सरकार इन्हें बाजार कीमत से 47% ज्यादा कीमत पर खरीदेगी, जो पूरी तरह से गैर-तार्किक है. भारत के कंपनी कानून के अनुसार, इक्विटी का मूल्यांकन फेस वैल्यू से कम नहीं हो सकता. लेकिन जब किसी कंपनी की कुल संपत्ति से ज्यादा उसका कर्ज और देनदारियां हों और वह हर दो साल में बेलआउट मांगती हो, तो ऐसी कंपनी का असली मूल्य क्या है? ऐसे में सरकार ने Vi के शेयर ₹10 में क्यों खरीदे?

यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने Vi को बचाने के लिए कदम उठाया है. 2021 में एक ‘राहत पैकेज’ दिया गया था, जिसके तहत फरवरी 2023 में Vi के ₹6,133 करोड़ के ब्याज को इक्विटी में बदल दिया गया. लेकिन यह पैकेज असल में Vi के प्रमोटरों को बचाने का एक तरीका था, जहां नुकसान का बोझ जनता पर डाला गया.

सितंबर 2025 में जब कर्ज चुकाने की मियाद खत्म होगी, तब Vi को हर साल ₹40,000 करोड़ का भुगतान करना होगा—जो उसकी वित्तीय हालत को देखते हुए असंभव है. लेकिन इस नए बेलआउट के कारण सरकार ने सिर्फ दो साल के लिए इस समस्या को टाल दिया है. नतीजा यह होगा कि Vi आगे भी सरकार पर निर्भर बनी रहेगी और यह टेलीकॉम कंपनी सरकार की जिम्मेदारी बनी रहेगी. आज Vi के लगभग 60 लाख छोटे निवेशक हैं. क्या वे सच में यह मानते हैं कि सरकार के पास कोई जादू की छड़ी है जो इस डूबती हुई कंपनी को बचा सकती है?

कोई रास्ता नहीं, कोई योजना नहीं

तो सरकार की बड़ी योजना क्या है? सच्चाई यह है कि कोई ठोस योजना है ही नहीं. सरकार सिर्फ इस उम्मीद पर टिकी हुई है कि अगले दो सालों में वह अपनी हिस्सेदारी किसी निजी खरीदार को बेच देगी. लेकिन हकीकत यह है कि जब तक कंपनी का भारी कर्ज नहीं कम किया जाता या सरकार खुद भारी नुकसान उठाने को तैयार नहीं होती, तब तक कोई निवेशक Vi को खरीदने के लिए आगे नहीं आएगा. यह खतरनाक दांव सिर्फ और ज्यादा आर्थिक संकट पैदा करेगा, और इसका पूरा बोझ फिर से करदाताओं पर पड़ेगा.

हर गुजरते दिन के साथ यह साफ हो रहा है कि यह किसी आर्थिक सुधार की कहानी नहीं, बल्कि सरकार द्वारा बार-बार एक निजी कंपनी को बचाने की कोशिश है. भारत सरकार अब Vodafone Idea के साथ फंस चुकी है और इससे निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं दिख रहा.

टेलीकॉम मंत्री से कुछ असहज सवाल

• सरकार ने Vi के प्रमोटरों से यह क्यों नहीं पूछा कि वे अपनी दूसरी कंपनियों को नए शेयर जारी करके वहां से पैसा जुटाएं, बजाय इसके कि जनता के पैसे का इस्तेमाल किया जाए?

• अगर Vi के मौजूदा प्रमोटर नए पैसे लाने को तैयार नहीं हैं और उनकी हिस्सेदारी 10% से भी कम रह गई है, तो फिर सरकार उन्हें अब भी कंपनी चलाने की अनुमति क्यों दे रही है? यह खास फायदा क्यों?

• जब सरकार की हिस्सेदारी 49% हो गई है, तो क्या यह सुनिश्चित किया जाएगा कि CAG (नियंत्रक और महालेखा परीक्षक) Vi के पूंजीगत खर्च (CapEx) और परिचालन खर्च (OpEx) की जांच करे, ताकि यह पता चले कि जनता का पैसा कहां जा रहा है?

• जब टाटा ग्रुप को भारती एयरटेल को अपनी मोबाइल सेवा बेचने से पहले ₹50,000 करोड़ (7.3 अरब डॉलर) का कर्ज चुकाने के लिए मजबूर किया गया था और रिलायंस कम्युनिकेशंस को डूबने दिया गया था, तो फिर Vi को क्यों बचाया जा रहा है?

(लेखक- पलक शाह, "द मार्केट माफिया - क्रॉनिकल ऑफ इंडिया’s हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कबाल दैट वेंट स्कॉट-फ्री" किताब के लेखक हैं. पलक शाह पिछले दो दशकों से मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन जैसे प्रमुख पिंक पेपरों में काम किया है. वह 19 साल की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग से जुड़े थे, लेकिन कुछ सालों में इस क्षेत्र में काम करने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि अपराध की संरचना बदल चुकी थी और वह संगठित गिरोह, जैसा कि मुंबई ने 80 के दशक में देखा था, अब अस्तित्व में नहीं थे.  'व्हाइट मनी' अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझने के उनके जुनून ने पलक को वित्त और नियामकों की दुनिया में पहुंचा दिया.)
 


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