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अस्थायी नजदीकियां, स्थायी भूगोल : अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों पर भारत को घबराने की जरूरत नहीं

डोनाल्ड ट्रंप की पाकिस्तान की ओर हालिया कूटनीतिक झुकाव कोई नई या स्थायी रणनीति नहीं है, बल्कि यह अमेरिका और पाकिस्तान के बीच भूगोल आधारित लेन-देन की उसी पुरानी पटकथा का हिस्सा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

जब डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में आर्मी चीफ असीम मुनीर के नेतृत्व वाली पाकिस्तान की सेना को रिझाने की कोशिश की, तो यह भारत को चिढ़ाने के लिए की गई चाल जैसी लगी. पाकिस्तान को तेल की खोज में मदद करने, पाकिस्तानी वस्तुओं पर हल्का टैरिफ लगाने और सामरिक “इनाम” देने की उनकी बातों ने स्वाभाविक रूप से नई दिल्ली में चिंता पैदा की. फिर भी, इस सारी हलचल के बावजूद, यह न तो कोई नई बात है और न ही कोई खास खतरनाक. इतिहास दिखाता है कि अमेरिका–पाकिस्तान संबंध एक अनुमानित चक्र का पालन करते हैं: वाशिंगटन इस्लामाबाद पर भारत पर दबाव बनाने या रणनीतिक भूगोल हासिल करने के लिए निर्भर करता है, अल्पकालिक लाभ देता है, और संकट समाप्त होते ही पीछे हट जाता है, जिससे पाकिस्तान फिर हाशिए पर रह जाता है.

सुविधा का रिश्ता, विश्वास का नहीं
सात दशकों से अधिक समय से, अमेरिका–पाकिस्तान संबंध सामरिक निकटता और उपेक्षा के बीच झूलते रहे हैं. साझेदारी या गठबंधन की बातों के पीछे शायद ही कोई ठोस आधार होता है. मूल रूप से, यह मूल्यों की मित्रता नहीं, बल्कि उपयोगिता का रिश्ता है, भूगोल के बदले सहायता, पहुंच के बदले हथियार, वादों के बदले आज्ञाकारिता. ट्रंप की पहलें, असाधारण होने के बजाय, इस पुराने पटकथा का ही विस्तार हैं.

शीत युद्ध की शुरुआत: मुद्रा के रूप में भूगोल
1950 के दशक में, पाकिस्तान ने SEATO और CENTO जैसे अमेरिका-नेतृत्व वाले गठबंधनों में भाग लिया. इसके बदले अमेरिका से आर्थिक सहायता और सैन्य उपकरणों की बाढ़ आ गई. बदले में, पाकिस्तान की स्थिति ने वाशिंगटन को शीत युद्ध के दौरान वह लाभ दिया जो उसे सबसे ज़्यादा चाहिए था: एक रणनीतिक दृष्टिकोण. पेशावर के पास अमेरिकी जासूसी ठिकाने बने, जहाँ से U-2 जासूसी विमान सोवियत क्षेत्र में घुसपैठ करते थे. फिर भी जब बात कश्मीर या भारत-पाक युद्धों की आई, तो अमेरिका तटस्थ बना रहा.

अफगान जिहाद: सह-निर्भरता की चरम सीमा
1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत आक्रमण ने इस रिश्ते को उसका “स्वर्ण युग” दिया. अरबों डॉलर और गुप्त हथियार पाकिस्तान के माध्यम से मुजाहिदीन तक पहुँचे, जिससे CIA और ISI के बीच एक गहन लेकिन सीमित साझेदारी बनी. लेकिन यह सहयोग हमेशा एक उद्देश्य के लिए था: सोवियतों को बाहर निकालना. जैसे ही मॉस्को पीछे हटा, अमेरिका की दिलचस्पी खत्म हो गई. पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर प्रतिबंध लगाए गए, और 1990 के दशक तक इस्लामाबाद फिर से अलग-थलग पड़ गया.

9/11 के बाद: एक साथ सहयोगी और विरोधी
9/11 हमलों ने इस चक्र को फिर से शुरू कर दिया. ज़मीन से घिरे अफगानिस्तान तक पहुंच पाने के लिए वाशिंगटन को एक बार फिर इस्लामाबाद की ज़रूरत पड़ी. सैन्य सहायता फिर शुरू हुई, एयरबेस दोबारा खुले, और पाकिस्तान को “प्रमुख गैर-NATO सहयोगी” का दर्जा मिला. फिर भी अविश्वास कभी खत्म नहीं हुआ. अमेरिका ने पाकिस्तान पर तालिबान को शरण देने का आरोप लगाया, भले ही वह सहयोग के लिए उस पर निर्भर रहा. 2011 का एबटाबाद छापा, जिसमें ओसामा बिन लादेन को एक पाकिस्तानी सैन्य छावनी के पास छिपा पाया गया, इस विरोधाभास को उजागर करता है: अमेरिका अब पाकिस्तान पर विश्वास नहीं करता था, लेकिन उसे अभी भी उसकी ज़रूरत थी.

भूगोल अभी भी नीति पर भारी
इस स्थायी तर्क का पाकिस्तान की शासन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था या मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है. यह पूरी तरह से उसके भूगोल से जुड़ा है. पाकिस्तान, चीन को अरब सागर तक निर्बाध पहुंच नहीं देता, अमेरिका को अफगानिस्तान और ईरान पर दृष्टिकोण प्रदान करता है, और सुनिश्चित करता है कि भारत की क्षेत्रीय प्रधानता पूर्ण न हो. भूगोल वाशिंगटन की दृष्टि में पाकिस्तान की एकमात्र अपरिवर्तनीय संपत्ति है – और यही वह कारण है कि अमेरिका बार-बार लौटता है.

ट्रंप की नवीनतम पटकथा
ट्रंप की हालिया टिप्पणियाँ इस पैटर्न में पूरी तरह फिट बैठती हैं. पाकिस्तानी वस्तुओं पर उनका 19% टैरिफ (भारत पर 25% + 25% की तुलना में), अमेरिका की ओर से तेल खोज में मदद की बात, और पाकिस्तान के जनरलों के साथ उनकी सीधी बातचीत – यह सब किसी स्थायी बदलाव का संकेत नहीं हैं. ये अल्पकालिक प्रलोभन हैं, जो पाकिस्तान को आज्ञाकारी बनाए रखने और भारत को यह याद दिलाने के लिए हैं कि वाशिंगटन के पास अभी भी दबाव के साधन हैं. नई दिल्ली के लिए सबक यह है कि घबराने के बजाय, अतीत को याद रखा जाए: अमेरिका–पाकिस्तान की हर निकटता की प्रक्रिया अंततः विघटन और निराशा में समाप्त हुई है.

भारत को विचलित होने की आवश्यकता नहीं
शीत युद्ध या 9/11 के बाद के दौर के विपरीत, आज भारत कोई असहाय दर्शक नहीं है. उसकी $4 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था, अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, क्वाड में उसकी भूमिका और बढ़ती सैन्य ताकत, एक ऐसा संतुलन प्रदान करती हैं जिसकी बराबरी पाकिस्तान नहीं कर सकता. चीन को संतुलित करने के लिए भारत पर वाशिंगटन की निर्भरता, पाकिस्तान की सामरिक आवश्यकता से कहीं अधिक है. यदि कुछ है, तो ट्रंप की यह सीमापार सक्रियता भारत के महत्व को रेखांकित करती है: अमेरिका पाकिस्तान का “उपयोग” करता है जब सुविधा होती है, लेकिन भारत में वह दीर्घकालिक निवेश करता है.

इसके अलावा, पाकिस्तान की अपनी कमजोरी उसकी प्रभावशीलता को सीमित करती है. उसका ऋण संकट, आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता, और खाड़ी देशों के बेलआउट्स पर निर्भरता, उसे पहले की तुलना में कहीं कम आकर्षक साझेदार बनाते हैं. यहाँ तक कि पाकिस्तानी सेना, जो ऐतिहासिक रूप से भूगोल को भुनाने में निपुण रही है, अब खेलने के लिए कम कार्ड रखती है.

रणनीतिक गतिरोध, न कि गठबंधन
अमेरिका–पाकिस्तान संबंधों को वास्तविक गठबंधन के बजाय बार-बार होने वाले लेन-देन के रूप में समझा जाना चाहिए. पाकिस्तान पहुंच का वादा करता है, अमेरिका सहायता देता है; दोनों उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते. न कोई पूरी तरह प्रतिबद्ध होता है, न पूरी तरह बाहर निकलता है. ट्रंप की यह पहल इस दोहराए जाने वाले नाटक का नवीनतम अंक भर है.

लेन-देन जारी है
भारत को ट्रंप की इस पहल को वैसा ही देखना चाहिए जैसा वह है: सामरिक रंगमंच. भूगोल यह सुनिश्चित करता है कि पाकिस्तान समय-समय पर वाशिंगटन के रडार पर आएगा, थोड़ी देर के लिए पुरस्कृत होगा, फिर छोड़ दिया जाएगा जब बड़ी प्राथमिकताएँ – चीन, मध्य पूर्व, या महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा – केंद्र में आ जाएंगी.

यह कोई बदलाव का संकेत नहीं, बल्कि अमेरिका–पाकिस्तान संबंधों की निरंतरता की पुष्टि है: यह दिलों का नहीं, भूगोल का विवाह है. भारत के लिए समझदारी का जवाब घबराहट नहीं बल्कि संतुलन है, यह पहचानते हुए कि अमेरिका की पाकिस्तान के साथ छेड़छाड़ अस्थायी है, संरचनात्मक नहीं.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और आवश्यक नहीं कि वे इस प्रकाशन के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हों.)

सिद्धार्थ अरोड़ा, अतिथि लेखक
(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति में गहरी रुचि है.)


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