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'सफलता कोई केक का टुकड़ा नहीं है जिसे आपको भूख लगी और खा लिया'

विशेष रूप से अलग-अलग पदों पर अधिकारियों का चयन राजनीतिक रूप से तय किया जाता है और मंत्री अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते हैं, जिसके कारण राष्ट्र को भारी कीमत चुकानी पड़ती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

हरदयाल सिंह

विनम्रता और स्पष्टवादिता के साथ लिखी गई, डॉ अशोक गांगुली की आत्मकथा (आफ्टरनेस - होम एंड अवे, पेंगुइन, 2022) हमें उनके जीवन, समय और हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL) जिस संगठन का उन्होंने नेतृत्व किया उसके बारे में बहुत कुछ बताती है. ये किताब पिछली पीढ़ी के एक अन्य प्रतिष्ठित HUL सीईओ, प्रकाश टंडन की तीन किताबों पंजाबी सागा, जिसमें पंजाबी सेंचुरी, बियॉन्ड पंजाब और रिटर्न टू पंजाब (रूपा एंड कंपनी 2001) के खिलाफ बेंच-मार्क है,) जोकि एक साहित्यिक क्लासिक बन गई है.

HUL में भारत में काम करना आसान नहीं

दोनों कहानियों में बहुत समानता है. दोनों लेखकों ने विदेश में कई साल बिताए, लेकिन प्रकाश टंडन के मामले में पंजाबी और अशोक गांगुली के मामले में बंगाली उन्हें अपने जन्‍मस्‍थान को लेकर हमेशा गर्व था. वे किसी भी संस्‍कृति में रहे लेकिन कभी अपने घर को नहीं भूलते थे. दोनों अच्छे संवाद में माहिर थे और आसानी से सभी प्रकार के लोगों के साथ संबंध स्थापित कर सकते थे. अब वो भले ही थोक व्यापारी हो, खुदरा विक्रेता, स्टॉकिस्ट, ग्राहक आदि कोई भी हो हर किसी के साथ आसानी से घुल मिल जाते थे.

लेकिन यह प्रकाश टंडन थे जिन्होंने अपने कामकाजी जीवन में सबसे बड़ी चुनौती का सामना किया. वह कंपनी में पहले वाचाबद्ध (covinented) भारतीय प्रबंधक थे. यूके में आठ साल बिताने के बाद, जहां उन्होंने अर्थशास्त्र में डिग्री ली और चार्टर्ड अकाउंटेंसी की, उन्होंने पाया कि भारत में यूनिलीवर में काम करना आसान नहीं था, वहां भारतीयों के खिलाफ भेदभाव व्याप्त था. इस तरह के रवैये के बावजूद टंडन ने अपने काम पर ध्यान केंद्रित किया और कई उपलब्धियां हासिल करने में कामयाब रहे. 1961 तक वे कंपनी के सीईओ बन गए. इसका श्रेय उनके इंग्लिश सीनियरों के साथ-साथ अपने स्वयं के पूर्वाग्रहों की परवाह किए बिना प्रतिभा को प्रोत्साहित करने के रवैये को जाता है.

निर्णय लेने की प्रक्रिया बेहद जटिल 

टंडन और गांगुली दोनों ही पीटर ड्रकर से सहमत होंगे कि आधुनिक संगठनों में निर्णय लेने की जटिल प्रकृति के कारण-चाहे वे सरकारी, अर्ध-सरकारी या निजी हों-उन्हें चलाने वाले व्यक्ति को अच्छा श्रोता होना चाहिए. इसके साथ-साथ उसे अच्छे अंतर-व्यक्तिगत (Interpersnol) और वैचारिक कौशल (conceptual  skill) की आवश्यकता होती है और वह टीम वर्क में विश्वास करता हो. इसका मतलब यह है कि उसे अक्सर यह भूलना पड़ता है कि वह कभी मार्केटिंग, सेल्स या फाइनेंस का आदमी था और उसे अपने उस व्यवसाय पर फोकस करना चाहिए जो आज उसके सामने है.

यदि वह सरकार में एक मंत्रालय का नेतृत्व कर रहा है, तो उसे एक बड़े राष्ट्रीय हित को समझने में सक्षम होना चाहिए जो कि उसके मंत्रालय के विशिष्ट हित से परे हो सकता है. लेकिन ऐसे बहुत से लोग नहीं हैं जो ऐसा कर सकते हैं: इसलिए अच्छे संगठनों को उत्तराधिकार की योजना बनाने में काफी समय देना पड़ता है. HUL ने ऐसा ही किया और खुद प्रकाश टंडन जैसे सक्षम सीईओ की पाइपलाइन तैयार की, जिससे ये अभियान शुरू हुआ. ठीक यही वह जगह भी है जहां मौजूदा समय में भारत सरकार कमजोर है. विशेष रूप से अलग-अलग पदों पर अधिकारियों का चयन राजनीतिक रूप से तय किया जाता है और मंत्री अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते हैं, जिसके कारण राष्ट्र को भारी कीमत चुकानी पड़ती है.

भारत सरकार में नियुक्‍त हों बेहतरीन अधिकारी 

हालांकि ऐसा हमेशा नहीं था. बी.के.नेहरू अपनी पुस्‍तक ‘नाइस गाइज एंड सेकेंड’ (पेंगुइन इंडिया, 2000) में लिखती हैं तत्‍कालीन भारत सरकार में पूर्व ब्रिटिश ने एक प्रतिष्ठित अधिकारी को भारत सरकार के लिए बेहतरीन अधिकारियों को नियुक्‍त करने की जिम्‍मेदारी दी. उन्‍होंने इस काम के लिए देश में कई जगह दौरा किया. उनकी सिफारिशों पर, भारत सरकार ने कम उम्र से ही शीर्ष नेतृत्व की भूमिकाओं के लिए अधिकारियों को नियमित रूप से तैयार करना शुरू कर दिया.

उन्हें 45 वर्ष की आयु तक सचिव नियुक्त कर दिया जाता था और उनके द्वारा 55 साल में सेवानिवृत्‍त होने तक उनके द्वारा किए गए अच्‍छे और बूरे कामों के लिए उन्‍हें जिम्मेदार ठहराया जाता था. साथ ही जो अन्‍य सक्षम ICS अधिकारियों को प्रांतीय सरकारों में अपना भाग्य तलाशने के लिए मजबूर किया जाता था. अधिकांश पर्यवेक्षक इस दृष्टिकोण को वर्तमान समय में पूरी तरह से यूटोपियन और अव्यवहारिक मानेंगे. लेकिन अगर सिस्टम को सुधारना है तो यह सुधार ठीक वैसा ही है, जिसकी आज आवश्यकता है. आजादी के बाद प्रदर्शन पर ध्यान दिए बिना सुनिश्चित पदोन्नति, हमारी सार्वजनिक प्रबंधन प्रणालियों का अभिशाप रही है.

गांगुली सफलता के बारे में क्या सोचते हैं?

गांगुली कहते हैं कि यह सफलता कोई केक का टुकड़ा नहीं है जिसे आपको भूख लगी और आपने उसे खा सकते हैं. वे कहते हैं कि इसके बारे में जुनूनी होने के बजाय आपको इस बारे में अधिक चिंता करनी चाहिए कि आप अपनी टीम के सदस्यों को कैसे विकसित कर सकते हैं. HUL का भी हमेशा से यही मानना ​​रहा है. जब प्रकाश टंडन से पूछा गया कि क्या उन्हें इस बात की चिंता है कि हिंदुस्‍तान लीवर के इतने सारे अधिकारी अपने शुरुआती प्रशिक्षण के तुरंत बाद दूसरी इंडस्‍ट्री में चले गए तो इस पर उन्होंने जवाब दिया कि ‘इसे भारतीय उद्योग में लीवर के योगदान के तौर पर देखा जाना चाहिए’. गुरचरण दास ने पुष्टि की कि जब वे P&G का नेतृत्व कर रहे थे, तब उन्होंने भी आवश्यकता से अधिक प्रशिक्षुओं की भर्ती की थी.

उद्ययम‍शीलता को देना चाहिए था बढ़ावा 

ये सभी नेता निराशाजनक लाइसेंस परमिट राज की अक्षमताओं से जूझ रहे थे. उस अवधि के दौरान, कश्मीर में अपनी वार्षिक छुट्टियों पर गए टंडन ने एक उद्यमी युवक को राष्ट्रीय राजमार्ग में सुनसान जगह पर एक पेट्रोल बंक स्थापित करते देखा. धीरे-धीरे इस साइट ने दूसरों को आकर्षित किया. इसके बाद एक पंचर मरम्मत की दुकान, फिर एक ढाबा और बाद में एक किराने की दुकान खुल गई. धीरे-धीरे, साइट एक हलचल भरी बस्ती में बदल गई. वो दिखने में अच्‍छा नहीं था लेकिन जीवंत था. टंडन उत्सुकता से पूछते हैं: क्या सरकार ने अपनी त्रुटिपूर्ण समाजवादी नीतियों पर भरोसा करने के बजाय ऐसी उद्यमशीलता का समर्थन किया? अगर ऐसा किया  होता तो क्‍या देश को इससे अधिक लाभ नहीं होता?

(लेखक मुख्य आयकर आयुक्त रह चुके है और ‘मोरल कम्पास- फाइंडिंग बैलेंस एंड पर्पस इन एन इम्परफेक्ट वर्ल्ड’ हार्पर कॉलिन्स इंडिया, 2022 के लेखक हैं)

 


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