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बाजारों, राज्य नवाचार और निजी साझेदारियों के जरिये कृषि परिवर्तन पर पुनर्विचार
ये नीतियां जमी हुई व्यवस्था को तोड़ने का प्रयास नहीं करेंगी. इसके बजाय, वे मौजूदा अवसरों का उपयोग कर विकल्पों को अधिक लाभकारी सिद्ध करने पर केंद्रित होंगी. यह दृष्टिकोण भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं और उनके लचीले, अनुकूलनशील विकास की क्षमता का सम्मान करता है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago
भारतीय कृषि, एक ऐसा क्षेत्र जो देश की 46 प्रतिशत श्रम शक्ति को रोजगार देता है और जीडीपी में 18 प्रतिशत का योगदान करता है, बावजूद इसके दशकों से दबाव में है. मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट, भूजल का क्षय और बढ़ती इनपुट लागत ने किसानों के लिए लगातार तनाव की स्थिति पैदा की है.
यह संकट अनदेखा नहीं रहा है. वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं ने समाधान सुझाए हैं. वर्ष 2020 में सरकार ने कृषि कानूनों के जरिये सुधार की कोशिश की, लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते यह प्रयास विफल हो गया. जिस कृषि व्यवस्था ने हरित क्रांति को संभव बनाया था, वही आज भारतीय राज्य की संरचना में गहराई से जमी हुई है.
लेकिन सुधार का मतलब तोड़फोड़ होना जरूरी नहीं है. साठ साल पहले, हरित क्रांति के शिल्पकारों ने पहले से मौजूद व्यवस्था को खत्म नहीं किया था, उन्होंने समानांतर बुनियादी ढांचा खड़ा किया, जो इतना प्रभावी था कि किसानों ने उसे स्वेच्छा से अपनाया. आज की चुनौती भी इसी दृष्टिकोण से लाभ उठा सकती है: ऐसे बाजार और वैल्यू चेन तैयार करना जो किसानों के विकल्प बढ़ाएं और सफलता के नए रास्ते खोलें.
स्तंभ एक: जल संकट को बाज़ार अवसर के रूप में देखना
भारत का भूजल खतरनाक गति से घट रहा है. पंजाब में जल स्तर हर साल लगभग एक फ़ुट गिर रहा है. इसी रफ्तार से चलता रहा तो अगले दो दशकों में एक्विफ़र सूख सकते हैं.
इस संकट में निकट भविष्य का अवसर जल-संरक्षण तकनीकों में है. पंजाब के धान और गेहूं के खेतों में किए गए वैज्ञानिक फील्ड परीक्षणों से पता चलता है कि प्रिसिजन इरिगेशन, रियल-टाइम मिट्टी निगरानी और ऑटोमेटेड कंट्रोल्स से पानी की बड़ी बचत हो सकती है. फसल विविधीकरण से और भी अधिक लाभ मिलता है. चावल के एक किलोग्राम उत्पादन में 2,000 से 5,000 लीटर पानी लगता है. वहीं मिलेट्स, जो हरित क्रांति से पहले आम फसलें थीं, 25 से 30 प्रतिशत कम वर्षा में उग जाती हैं और अधिक प्रोटीन, फाइबर व सूक्ष्म पोषक तत्व देती हैं. ये क्लाइमेट-स्मार्ट फसलें जल्दी पकती हैं, खराब मिट्टी में भी पनपती हैं और सूखा-रोधी होती हैं.
स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ता तेजी से मिलेट्स जैसे प्राचीन अनाज अपना रहे हैं. कंपनियों के लिए यहां दोहरे निवेश के अवसर हैं: मौजूदा फसलों के लिए प्रिसिजन इरिगेशन, और प्रोसेसिंग उपकरण, भंडारण व वितरण नेटवर्क के साथ नई वैल्यू चेन का निर्माण. लेकिन दोनों ही रास्तों के लिए राज्य का समर्थन आवश्यक है, बिजली, सड़कें, बाज़ार कनेक्टिविटी और शिक्षा. इन अवसरों को खोलने के लिए राज्य और निजी कंपनियों के बीच साझेदारी जरूरी होगी.
स्तंभ दो: राज्य-स्तरीय प्रयोग क्षेत्र
जहां राष्ट्रीय स्तर पर कृषि सुधार कठिन है, वहीं राज्य स्तर पर सुधार के वास्तविक अवसर मौजूद हैं. राजस्थान इसका अच्छा उदाहरण है. राज्य ने 2022-23 में 100 प्रोसेसिंग यूनिट्स के लिए 40 करोड़ रुपये के साथ मिलेट प्रमोशन मिशन शुरू किया. 2024 में, मक्का, बाजरा, सरसों, मूंग, ज्वार और मोठ की खेती के लिए 33 लाख किसानों को मुफ्त बीज वितरित किए गए. आज राजस्थान भारत के कुल मिलेट उत्पादन का 26 प्रतिशत और 2024 में 4,43,000 मीट्रिक टन की वृद्धि के साथ बाजरे के उत्पादन का 41 प्रतिशत हिस्सा देता है.
लेकिन केवल बुनियादी ढांचा पर्याप्त नहीं है. जैसा कि हमने भारत के डेयरी उद्योग में देखा, क्षमता निर्माण भी सावधानीपूर्वक करना पड़ता है. उदयपुर में सेवा मंदिर जैसे सिविल सोसाइटी संगठनों ने स्वयं सहायता समूहों में महिलाओं किसानों का समर्थन किया है. महिलाओं ने लाभदायक मिलेट प्रोसेसिंग उद्यम खड़े किए हैं, जिससे वे उन प्रोसेसिंग मार्जिन को हासिल कर पाईं जो आमतौर पर बिचौलियों के पास चले जाते हैं.
यहां मॉडल स्पष्ट है. राज्य जिलों को टिकाऊ कृषि ज़ोन के रूप में नामित कर सकते हैं, जहां बीज, इनपुट, प्रोसेसिंग, भंडारण और एक्सटेंशन सेवाओं सहित पूरा इकोसिस्टम हो. सिविल सोसाइटी संगठन किसान-स्वामित्व वाले उद्यमों को इनक्यूबेट कर सकते हैं और सहकारी समितियों को गुणवत्ता मानकों व प्रमाणन हासिल करने में मदद कर सकते हैं. राज्यों को इसलिए लाभ होता है क्योंकि वर्षा-आधारित क्षेत्रों में मिलेट्स को सब्सिडी देना, उन चावल फसलों को सब्सिडी देने से सस्ता पड़ता है जो एक्विफर को खाली करती हैं.
व्यवसायों को निवेश की स्पष्टता मिलती है, वे ऐसे दूरदर्शी राज्यों के साथ साझेदारी कर सकते हैं जहां बुनियादी ढांचा और किसान सहकारी समितियां पहले से मौजूद हों.
स्तंभ तीन: निजी-सार्वजनिक खरीद साझेदारियां
कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के अनुसार, भारत दुनिया के 41 प्रतिशत मिलेट्स का उत्पादन करता है, लेकिन उत्पादन का 1 प्रतिशत से भी कम निर्यात करता है. वित्त वर्ष 2024 में भारत ने 1,46,000 टन मिलेट निर्यात किया, जिससे 70.89 मिलियन अमेरिकी डॉलर की कमाई हुई, जो संभावनाओं का केवल एक छोटा हिस्सा है.
यहां एक स्पष्ट अवसर मौजूद है. एक हालिया अध्ययन के अनुसार, वैश्विक मिलेट बाज़ार 2025 में 12.60 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया और 2030 तक इसके 16.04 अरब अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान है. मिलेट्स को शामिल करने वाले फंक्शनल फूड्स, कमोडिटी अनाजों की तुलना में 40 से 60 प्रतिशत तक अधिक कीमत प्राप्त करते हैं.
मुख्य बाधा निर्यात-ग्रेड प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और भरोसेमंद प्रमाणन प्रणाली की है. निर्यात बाज़ारों के लिए FDA/USDA मानकों के अनुरूप सुविधाएं, ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन, ट्रेसबिलिटी सिस्टम और कोल्ड स्टोरेज की आवश्यकता होती है.
24Mantra और Just Organik जैसी कंपनियों ने इन बाधाओं को पार कर अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में जगह बनाई है, लेकिन ये उदाहरण अभी सीमित हैं. बड़े पैमाने पर विस्तार के लिए राज्य के समर्थन की आवश्यकता होगी.
APEDA और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय बुनियादी ढांचे और प्रमाणन कार्यक्रमों के लिए सहायता प्रदान करते हैं.
इस क्षेत्र में नए अवसर उभर रहे हैं. इस वर्ष भारत को अमेरिका के मुकाबले, जो वर्तमान में वैश्विक मिलेट उत्पादन में अग्रणी है, यूरोपीय संघ के साथ व्यापार में अप्रत्याशित टैरिफ लाभ मिला है. हाल ही में अंतिम रूप दिए गए मुक्त व्यापार समझौते, जिसे ‘सभी समझौतों की जननी’ बताया जा रहा है, भारत को यूरोपीय बाज़ारों तक आसान पहुंच देता है, जिसमें कुछ कृषि उत्पाद भी शामिल हैं, जिनमें संभवतः प्रोसेस्ड मिलेट उत्पाद शामिल होंगे. यदि राज्य और निजी क्षेत्र प्रभावी ढंग से सहयोग करें, तो यह भारत के लिए वर्षों में सबसे बड़ा अवसर हो सकता है, यूरोपीय किराना स्टोर्स की शेल्फ़ पर मिलेट उत्पाद पहुंचाने का और भारतीय किसानों को वह प्रीमियम दिलाने का, जिसे उपभोक्ता चुकाने को तैयार हैं.
शरीन जोशी, अतिथि लेखिका
(शरीन जोशी जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फॉरेन सर्विस में इंटरनेशनल डेवलपमेंट की एसोसिएट प्रोफेसर और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस में सीनियर फेलो हैं. उन्होंने येल यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी और रीड कॉलेज से मैथेमेटिक्स-इकोनॉमिक्स में बीए किया है. उनका शोध असमानता, मानव पूंजी निवेश और दक्षिण एशिया में जमीनी सामूहिक कार्रवाई पर केंद्रित है. उनका काम विकास अर्थशास्त्र, जनसंख्या अध्ययन, पर्यावरण अध्ययन और जेंडर स्टडीज में प्रकाशित हुआ है. शेरीन विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र, हेवलेट फ़ाउंडेशन, भारत सरकार, राजस्थान सरकार और कई गैर-लाभकारी संगठनों के लिए परामर्शदाता के रूप में भी कार्य कर चुकी हैं.)
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