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रेपो रेट में इजाफा: महंगाई पर असर पड़े न पड़े, जेब जरूर ज्यादा खाली होगी 

सशंकित परिवारों ने भविष्य में अपनी आमदनी में बढ़ोत्तरी की उम्मीदें कम कर दी हैं. यह तब है जबकि हम अपनी आर्थिक स्थितियों में सुधार की भी बात कर रहे हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • अजय शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बाजार में मुद्रा के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए नीतिगत दर रेपो 0.35 फीसदी बढ़ाकर 6.25 फीसदी कर दिया है. आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि मौजूदा आर्थिक स्थिति पर विचार करते हुए एमपीसी को यह बढ़ोत्तरी जरूरी लगी. भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने बीते बुधवार को दावा किया कि रेपो रेट बढ़ने से महंगाई काबू करने में बड़ी मदद मिलेगी. हमें पता है कि चालू वित्तवर्ष के सात महीनों में आरबीआई ने ब्याज दरों में 5वीं बार बढ़ोत्तरी की है. 

महंगाई पर नहीं होगा असर
आरबीआई ने मई में 0.40, जून, अगस्त और सितंबर में 0.50-0.50-0.50 फीसदी की बढ़ोतरी की थी. विशेषज्ञों का मानना है, इससे महंगाई पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला. वजह, देश की बड़ी आबादी मुद्रा के अभाव में या कम आमदनी में जीवन काट रही है. बेरोजगारी अधिक होने से लोगों की खर्च सीमा कम हुई है. देश का व्यापार घाटा पहले ही काफी बढ़ गया है, मगर आधारभूत समस्याओं की जड़ पर प्रहार करने के बजाय सरकार पत्ते तोड़ने में लगी है.

खुशी और चिंता की खबर
हमारे लिए खुशी की भी खबर है और चिंता की भी. केंद्र सरकार के राष्ट्रीय सांख्यिकी विभाग और आरबीआई ने अपनी मौद्रिक नीति समिति की बैठक में भी अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.3 फीसदी रहने का अनुमान लगाया दिया था, मगर खुशी की बात यह है कि विश्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2022-23 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर के पूर्व अनुमान 6.5 फीसदी से बढ़ाकर 6.9 फीसदी कर दिया. बैंक ने 6 दिसंबर को भारत से संबंधित अपडेट जारी किया था. विश्व बैंक ने कहा है कि अमेरिका, यूरोप और चीन के घटनाक्रमों का प्रभाव भारत में भी देखने को मिल रहा है. विश्व बैंक को भरोसा है कि भारत मौजूदा वित्त वर्ष में 6.4 फीसदी के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पा लेगी, जिससे मुद्रास्फीति 7.1 फीसदी पर रहेगी. बहराल, विश्वबैंक के इस ताजा अनुमान पर हम खुश भी हो सकते हैं मगर उसका आधार इतना स्पष्ट नहीं है कि अचानक ऐसा क्या हो गया कि एकदम से विकास दर बढ़ गई. वास्तव में जो उम्मीद जी-20 की अध्यक्षता मिलने के आधार पर लगाई जा रही है, वो यूरोपीय और अमेरिकी देशों के लिए अधिक मुफीद है, न कि भारत के लिए. यह अध्यक्षता प्रतीकात्मक और आर्थिक संबंधों में निकटता की हो सकती है.

बढ़ रही बेरोजगारी दर
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अक्टूबर में 524 अरब डॉलर के दो साल के निचले स्तर पर पहुंचने के बाद, 18 नवंबर को एक बार फिर बढ़कर 547.25 अरब डॉलर पर पहुंच गया. डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार 82 के आसपास बना हुआ है. इससे वैश्विक बाजारों में बेहतर संकेत का हम लाभ उठाने की स्थिति में रहेंगे. लगातार डगमगाते वैश्विक और एशियाई बाजार चिंता पैदा कर रहे थे, मगर अब उनमें बढ़त देखी जा रही है. एशियाई बाजारों में भी गिरावट थमी है. विश्व बैंक के आंकड़ों में 2019 में जहां भारत में बेरोजगारी दर 5.3 फीसदी पर थी, वहीं नवंबर 2022 में यह दर बढ़कर 8.0 फीसदी पर पहुंच गई है. सेंटर फॉर मॉनेटरिंग इंडियन इकोनॉमी के मुताबिक इस वक्त बेरोजगारी दर पिछले तीन सालों में सबसे ऊंचे स्तर पर है. शहरी बेरोजगारी 7.21 से बढ़कर 8.96 फीसदी तो ग्रामीण बेरोजगारी दर 8.04 से घटकर 7.55 फीसदी हो गई है. स्पष्ट है कि गांवों से निकलकर शहरों में रोजगार तलाशने वालों को निराशा मिल रही है और गांवों में फसली सीजन होने के कारण कुछ काम मिल रहा है. यह प्रवृत्ति निराशा को बढ़ाने वाली है क्योंकि अर्थव्यवस्था को मजबूती के लिए रोजगार के अवसर बढ़ना जरूरी है. जब रोजगार बढ़ते हैं तभी आमदनी भी बढ़ती है. लोगों की क्रय क्षमता बढ़ने पर ही वो बाजार में पैसा खर्च करते हैं.  

विदेशी पूंजी निवेश में गिरावट
चालू वित्तीय वर्ष में पहली छमाही में व्यापार विकास दर बहुत उत्साह बढ़ाने वाली नहीं थी. नतीजतन, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में हमें नकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है. विदेशी पूंजी निवेश में काफी गिरावट आई है. रेपो रेट फिर से बढ़ने का नतीजा यह होगा कि विकसित देशों की पूंजी वापसी का रुख करेगी. उच्च ब्याज दरें, मांग को प्रभावित करती हैं. यही कारण है कि भारत का व्यापार संतुलन नकारात्मक हो रहा है. विश्व बैंक के आर्थिक विकास दर अनुमान को बढ़ाने से एक विश्वास वापस लौटने की उम्मीद है मगर जब तक यह स्थाई आधार पर खड़ा नहीं होगा, तब तक नतीजे उत्साहवर्धक नहीं हो सकते हैं. वाणिज्य मंत्रालय का मानना है कि पूरे साल के लिए चालू खाते का घाटा तीन फीसदी से अधिक हो सकता है, मगर अर्थ विशेषज्ञ यह घाटा 3.5 फीसदी मान रहे हैं. जब तक हम निर्यात-केंद्रित अर्थव्यवस्था बनाने पर जोर नहीं देगें तब तक सुधार की उम्मीद कम बनी रहेगी. वैश्विक अनिश्चितता के हालात भारत के लिए भी चिंताजनक रहेंगे. कोर सेक्टर्स में उत्पादन बढ़ाने के साथ ही उसकी वास्तविक खपत के बारे में भी चिंता करने की जरूरत है. हमें अगर अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है तो सबसे पहले प्रति व्यक्ति जीडीपी को मजबूत करने की दिशा में काम करने की जरूरत है, जो दुनिया के तमाम देशों की तुलना में भारत की काफी कम है. प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में भारत की रैंकिंग 205 देशों में 158 है, जबकि हम विश्व की तीसरी सबसे बढ़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ने का दावा करते हैं.

आमदनी बढ़ने की उम्मीद कम
तमाम आर्थिक कारणों से सशंकित परिवारों ने भविष्य में अपनी आमदनी में बढ़ोत्तरी की उम्मीदें कम कर दी हैं. यह तब है जबकि हम अपनी आर्थिक स्थितियों में सुधार की भी बात कर रहे हैं. नवंबर में आर्थिक स्थिति सूचकांक (आईसीसी) में 1.6 फीसदी की गिरावट आई है. शहरों में यह गिरावट तेज रही और वर्तमान इन क्षेत्रों में आर्थिक स्थिति में 3.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. ग्रामीण क्षेत्रों में मामूली कमी हुई. इन हालात में स्पष्ट है कि रेपो रेट बढ़ने से आम नौकरी पेशा और मध्यम वर्ग पर नकारात्मक असर पड़ेगा, क्योंकि यही वर्ग सबसे अधिक छोटे-छोटे लोन लेकर अपनी जरूरतें पूरी करता है. ब्याजदर उनकी व्यक्तिगत अर्थतंत्र को प्रभावित करेगा क्योंकि आमदनी कम और खर्च ज्यादा होगा. इससे उसकी क्रय क्षमता भी घटेगी, जो आने वाले वक्त में उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी. इस प्रयास से महंगाई पर मामूली असर होगा मगर स्थायी नहीं हो सकता है. यह मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए भी बहुत फायदेमंद नहीं है. उपाय, दीर्घकालिक और आमदनी आधारित किए जाने की जरूरत है.


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