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पंजाब को बहाने नहीं, बदलाव की जरूरत

राज्यसभा सांसद सुभाष बराला लिखते हैं, उत्तर भारत में सिख और हिंदू समुदायों का संबंध कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि गहरी सांस्कृतिक साझेदारी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 months ago

पंजाब को नारों के एक और दौर की जरूरत नहीं है. उसे पुनरुद्धार, दृढ़ संकल्प और ऐसी सरकार की जरूरत है जो गिरावट को केवल चर्चा का विषय नहीं, बल्कि आपात स्थिति के रूप में देखे. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मेगा रैली इसलिए महत्वपूर्ण नहीं थी कि उसने आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई, बल्कि इसलिए भी कि उसने पंजाब के सामने खड़े नैतिक और प्रशासनिक संकट को उजागर किया. नशा, अपराध, भ्रष्टाचार, सामाजिक विघटन, किसानों की परेशानी और यह बढ़ती भावना कि राज्य फिसल रहा है जबकि सत्ता में बैठे लोग केवल दिखावे में उलझे हैं. हालिया रिपोर्टों के अनुसार अमित शाह ने इस मुकाबले को “बदलाव” का नाम देते हुए दो साल में नशामुक्त पंजाब और सत्ता में आने पर धर्मांतरण विरोधी कानून का वादा किया.

इस स्थिति को गंभीर बनाता है केवल भाषण नहीं, बल्कि तात्कालिकता और जड़ता के बीच का अंतर. पंजाब का नशा संकट कोई काल्पनिक राजनीतिक आरोप नहीं है. यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति, कानून-व्यवस्था की चुनौती और सामाजिक घाव है. राज्य के नशा मुक्ति तंत्र से जुड़ी हालिया रिपोर्टें भी यह संकेत देती हैं कि इस समस्या से निपटने की व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं. नशा मुक्ति पंजीकरण पोर्टल में तकनीकी समस्याओं से लेकर सरकारी सेवाओं तक पहुंच पर विवादित प्रतिबंध तक, तस्वीर यह दिखाती है कि सरकार उसी संकट को संभालने में संघर्ष कर रही है जिससे निपटने का वह दावा करती है.

आप सरकार पर सवाल

यहीं पर आम आदमी पार्टी पंजाब मॉडल सवालों के घेरे में आता है. यह स्वच्छ शासन और नई राजनीतिक संस्कृति के वादे के साथ सत्ता में आई थी. लेकिन वास्तविकता में प्रदर्शन के दावों और जमीनी स्थिति के बीच खाई बढ़ती गई है. नशे, गैंगस्टरवाद, कृषि संकट और संस्थागत थकान से जूझ रहे राज्य को केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस और आत्मप्रशंसा से नहीं चलाया जा सकता. शासन कोई सामाजिक मीडिया रणनीति नहीं है. यह सख्त कार्रवाई, पुनर्वास, आर्थिक पुनरुद्धार और सामाजिक विश्वास का गंभीर कार्य है. इन सभी मोर्चों पर वर्तमान सरकार या तो प्रतिक्रियात्मक दिखती है या दिशाहीन.

सामाजिक ताने-बाने पर असर

पंजाब का संकट केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है. यही कारण है कि अवैध या जबरन धर्मांतरण पर अमित शाह की टिप्पणियों ने उन लोगों के बीच चिंता पैदा की है जो मानते हैं कि कमजोर समुदायों को पहचान आधारित संघर्ष में धकेला जा रहा है, बजाय उन्हें सम्मान, रोजगार, शिक्षा और न्याय देने के. एक स्वस्थ समाज में आस्था व्यक्तिगत निर्णय का विषय होती है, न कि दबाव, लालच या राजनीतिक सौदेबाजी का, जहां सामाजिक निराशा बढ़ती है, वहां शोषणकारी ताकतों को अवसर मिलता है.

इतिहास से सीख

पंजाब का इतिहास इसे इस तरह के विघटन से बचाने वाला होना चाहिए था. उत्तर भारत में सिख और हिंदू समुदायों का संबंध कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि गहरी सांस्कृतिक साझेदारी है. गुरु तेग बहादुर इसका सबसे उज्ज्वल उदाहरण हैं, जिनका बलिदान औरंगजेब के शासनकाल में कश्मीरी ब्राह्मणों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के रूप में याद किया जाता है. माना जाता है कि उन्होंने जबरन धर्मांतरण के खिलाफ खड़े होकर अपने प्राणों का बलिदान दिया.

भाजपा का व्यापक दृष्टिकोण

इसी व्यापक संदर्भ में पंजाब में भाजपा की राजनीति को समझना चाहिए. यह केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि व्यवस्था, निवेश, न्याय और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के माध्यम से राज्य के आत्मविश्वास को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है. भारतीय जनता पार्टी यह भी कह सकती है कि उसने राष्ट्रीय स्तर पर 1984 के सिख विरोधी दंगों जैसे मुद्दों पर जांच प्रक्रिया के जरिए जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाए हैं.

विकास ही समाधान

विकास का मुद्दा यहां केंद्रीय है. पंजाब केवल आक्रोश से नहीं संभलेगा. उसे ऐसी सरकार चाहिए जो नशा मुक्ति को एक मिशन के रूप में देखे, खेती को उत्पादकता और आय के नजरिए से समझे और युवाओं को निराशा से निकालकर उद्यम की ओर ले जाए. इसके लिए बेहतर पुलिसिंग, तेज न्याय प्रक्रिया, सीमा सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार, खेलों को बढ़ावा, कौशल विकास, कृषि आधारित उद्योग और प्रभावी पुनर्वास व्यवस्था जरूरी है.

अब चुनाव बदलाव का

पंजाब ने भारत को सैनिक, संत, किसान, उद्यमी और शहीद दिए हैं. यह डर के आगे झुकने वाली भूमि नहीं रही. लेकिन राज्यों का पतन केवल बाहरी आक्रमण से नहीं, बल्कि आंतरिक शिथिलता से भी होता है. आज कई पंजाबी इसी शिथिलता को महसूस कर रहे हैं. ऐसे में राज्य के सामने बहानों का रास्ता या अनुशासित बदलाव का, ये दो विकल्प स्पष्ट है.

दिशा की जरूरत

आप सरकार को मौका मिला, लेकिन समस्याएं और जटिल हो गईं. अब सवाल सीधा है. यदि कोई सरकार युवाओं को नशे से, समाज को अव्यवस्था से, किसानों को अनिश्चितता से और समुदायों को शोषण से नहीं बचा सकती, तो वह आखिर क्या बेहतर कर रही है? पंजाब को इनकार नहीं, दिशा चाहिए. और यही दिशा अब भाजपा जनता के सामने विकल्प के रूप में रख रही है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और यह अनिवार्य रूप से प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते.)

अतिथि लेखक- सुभाष बराला, राज्यसभा सदस्य


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