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प्रधानमंत्री मोदी की दूरदृष्टि ने भारत के खेल वर्चस्व की आकांक्षा को प्रेरित किया

भारत का खेलों के प्रति दृष्टिकोण एक बड़ी परिवर्तनकारी प्रक्रिया से गुज़रा है, जो अब केवल मनोरंजन नहीं रहा बल्कि राष्ट्रीय विकास का एक रणनीतिक स्तंभ बन चुका है, लिखते हैं जलज दानी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

17 सितंबर 2025 को जब हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन मना रहे हैं, तब राष्ट्र उस निर्णायक मोड़ पर खड़ा है जहाँ वह वैश्विक खेल शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है. 2014 से प्रधानमंत्री की जो दूरदृष्टि रही है, उसने एक क्रांति की शुरुआत की है, जिसने खेलों को राष्ट्रीय गौरव, एकता और आर्थिक सामर्थ्य का प्रतीक बना दिया है.

2030 कॉमनवेल्थ गेम्स और 2036 ओलंपिक की मेज़बानी की बोलियों के साथ, भारत वैश्विक मंचों पर छा जाने और एक विश्वस्तरीय खेल इकोसिस्टम तैयार करने की ओर अग्रसर है. यह महत्वाकांक्षा प्रतिभाओं को विकसित करने, अधोसंरचना को आधुनिक बनाने और खेल उपकरण निर्माण क्षेत्र में क्रांति लाने पर निर्भर करती है, ताकि एथलेटिक सफलता के साथ-साथ आर्थिक वृद्धि को भी बढ़ावा दिया जा सके.

भारत का खेलों के प्रति दृष्टिकोण अब केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय विकास का एक रणनीतिक स्तंभ बन चुका है. खेलो इंडिया, फिट इंडिया मूवमेंट, टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS), खेलो भारत नीति 2025 और राष्ट्रीय खेल शासन अधिनियम जैसे कार्यक्रम एथलेटिक उत्कृष्टता के लिए एक मजबूत ढांचा तैयार कर रहे हैं.
ये पहल दो मोर्चों पर कार्य कर रही हैं:

पिछली कड़ियाँ, जमीनी स्तर की अधोसंरचना, प्रतिभा पहचान और कोचिंग प्रणाली को सुदृढ़ करना. आगे की कड़ियाँ, खिलाड़ियों को उच्च प्रदर्शन प्रशिक्षण, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और अत्याधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना.

इसका परिणाम है एक समग्र इकोसिस्टम जो गाँवों के मैदानों से लेकर वैश्विक मंचों तक प्रतिभा को पोषित करने के लिए डिजाइन किया गया है, लेकिन केवल एथलेटिक सफलता ही पर्याप्त नहीं है. वैश्विक मंच पर वास्तव में प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारत को खेल उद्योग से जुड़े उपकरणों में भी महारत हासिल करनी होगी. एक जीवंत खेल उपकरण निर्माण क्षेत्र अत्यंत आवश्यक है न केवल खिलाड़ियों को उच्च गुणवत्ता वाले और किफायती उपकरण प्रदान करने के लिए, बल्कि निर्यात और रोज़गार सृजन के माध्यम से आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए भी. वैश्विक खेल उपकरण बाज़ार, जिसकी 2024 में अनुमानित कीमत 700 अरब अमेरिकी डॉलर है, 2036 तक 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने की संभावना है, जिसमें उपकरण क्षेत्र 140 अरब डॉलर से बढ़कर 300 अरब डॉलर तक जाएगा.

भारत का वर्तमान निर्यात हिस्सा? मात्र 250 मिलियन डॉलर – यानी वैश्विक बाज़ार का 0.5 प्रतिशत से भी कम. लक्ष्य है: 2036 तक वैश्विक बाज़ार में 15 प्रतिशत हिस्सेदारी प्राप्त करना, 11 अरब डॉलर का निर्यात हासिल करना और 22 लाख प्रत्यक्ष तथा 45 लाख अप्रत्यक्ष रोज़गार उत्पन्न करना. यह केवल एक लक्ष्य नहीं है, बल्कि भारत की आर्थिक और खेल संरचना को पुनर्परिभाषित करने का एक परिवर्तनकारी अवसर है.

भारत की खेल विरासत और उसकी चुनौतियाँ
भारत का खेल उपकरण उद्योग मेरठ, जालंधर, लुधियाना और दिल्ली जैसे केंद्रों में केंद्रित है, जहाँ शिल्प कौशल और उद्यमशीलता की समृद्ध विरासत है. MSMEs क्रिकेट गियर से लेकर इन्फ्लेटेबल बॉल्स, नेट्स और फिटनेस उपकरण तक सब कुछ तैयार करते हैं, जो कुशल कार्यबल द्वारा संचालित हैं. लेकिन यह क्षेत्र बिखराव से जूझ रहा है,अधिकांश इकाइयाँ छोटी हैं, जो आधुनिक मशीनरी या स्वचालन वहन नहीं कर सकतीं. इसके अतिरिक्त, अनुसंधान एवं विकास की कमी, सीमित डिजाइन नवाचार, परीक्षण प्रयोगशालाओं की कमी, कच्चे माल की ऊँची लागत, अविकसित अधोसंरचना और लॉजिस्टिक अक्षमताएँ हैं, जिससे भारत का वैश्विक बाज़ार में हिस्सा पिछड़ गया है. ये चुनौतियाँ अपराजेय नहीं हैं, लेकिन इनके लिए त्वरित और समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है.

स्थानीय मूल्य संवर्धन और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए स्टीयरिंग कमेटी (SCALE), जो 2020 में उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के तहत स्थापित हुई थी, ने खेल उपकरण क्षेत्र को एक चैंपियन सेक्टर के रूप में चिन्हित किया है. 'आत्मनिर्भर भारत' के विज़न के अनुरूप, SCALE स्थानीय निर्माण को बढ़ावा देने, रोज़गार सृजन और 24 प्रमुख क्षेत्रों में निर्यात को विस्तारित करने की दिशा में कार्य कर रही है. 30 अगस्त 2025 को आयोजित स्पोर्ट्स गुड्स मैन्युफैक्चरिंग कॉन्क्लेव इस दिशा में एक निर्णायक कदम था.

युवा मामलों और खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया द्वारा आयोजित इस कॉन्क्लेव में नीति आयोग, FICCI, रेलवे, स्पोर्ट्सकॉम (CII), MSMEs और उद्योग नेताओं ने भाग लिया, ताकि इस क्षेत्र की वृद्धि के लिए एक रोडमैप तैयार किया जा सके. कॉन्क्लेव का मुख्य फोकस था – एकीकरण – यानी खेल उपकरण निर्माण को भारत की व्यापक आर्थिक आकांक्षाओं से जोड़ना ताकि उसके अछूते संभावनाओं को खोला जा सके.

वैश्विक वर्चस्व के लिए पाँच-सूत्रीय रणनीति
इस अवसर का लाभ उठाने के लिए भारत को एक साहसिक, पाँच-सूत्रीय रणनीति की आवश्यकता है, जिससे वह अपने खेल उपकरण क्षेत्र को वैश्विक नेतृत्व में बदल सके:

आधुनिकीकरण और विस्तार : MSMEs को सस्ती ऋण सुविधा, साझा मशीनरी हब और स्वचालन तथा उन्नत विनिर्माण के लिए प्रोत्साहनों की ज़रूरत है. तकनीक को उन्नत करने से छोटी इकाइयाँ वैश्विक दिग्गजों से प्रतिस्पर्धा कर पाएंगी, जिससे गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता सुनिश्चित हो सकेगी.

नवाचार और अनुसंधान एवं विकास (R&D) : समर्पित डिज़ाइन और परीक्षण केंद्र, साथ ही विश्वविद्यालय-उद्योग सहयोग, सामग्रियों, उपकरणों और तकनीकों में स्वदेशी नवाचार को बढ़ावा दे सकते हैं. अनुसंधान एवं विकास में निवेश करने से ऐसे उत्पाद बनेंगे जो वैश्विक मानकों पर खरे उतरें और नए मानक स्थापित करें.

अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स : प्लग-एंड-प्ले सुविधाओं से युक्त एकीकृत खेल निर्माण पार्क, बेहतर कनेक्टिविटी और सुव्यवस्थित लॉजिस्टिक्स अनिवार्य हैं. NCR के पास एक समर्पित वैश्विक बाजार स्थापित करना भारतीय खेल उपकरणों को अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की पहली पसंद बना सकता है.

वैश्विक एकीकरण : अंतरराष्ट्रीय प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहन और मजबूत ब्रांडिंग अभियानों से "मेड इन इंडिया" खेल उपकरणों की प्रतिष्ठा बढ़ सकती है. भारतीय गुणवत्ता में विश्वास स्थापित करने से वैश्विक बाज़ारों के द्वार खुलेंगे.

कौशल विकास : खेल इंजीनियरिंग, उत्पाद डिज़ाइन और खेल विज्ञान में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम भविष्य के लिए तैयार कार्यबल तैयार करेंगे. एक कुशल इकोसिस्टम प्रतिस्पर्धात्मक उद्योग की रीढ़ होता है.

एकजुट प्रयास: खेलों का भविष्य
खेल मंत्रालय के व्यापार आवंटन में खेल उपकरण निर्माण क्षेत्र को शामिल करने की सरकार की हालिया पहल कार्रवाई के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है. लेकिन सफलता सहयोग पर निर्भर करती है. निर्माताओं को निडर होकर नवाचार करना होगा, अत्याधुनिक तकनीकों और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाना होगा.

राष्ट्रीय खेल महासंघों को खाइयों को पाटना होगा, ऐसे साझेदारी को प्रोत्साहित करना होगा जो यह सुनिश्चित करें कि भारतीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिले. निजी क्षेत्र, शिक्षा जगत और सरकार को एकजुट होकर ऐसा इकोसिस्टम बनाना होगा जहाँ प्रतिभा, अधोसंरचना और विनिर्माण एक साथ फले-फूले.

2047 तक, जब भारत स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे करेगा, खेल क्षेत्र एक विकसित राष्ट्र 'विकसित भारत' के सपने को साकार करने में अहम भूमिका निभा सकता है. एक समृद्ध खेल उपकरण उद्योग न केवल हमारे एथलीटों को वैश्विक प्रतियोगिताओं में विजयी बनाने के लिए सशक्त करेगा, बल्कि लाखों नौकरियाँ पैदा करेगा, निर्यात बढ़ाएगा और भारत को विनिर्माण महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा. यह केवल एक आर्थिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि एक ऐसा आंदोलन है जो एक राष्ट्र को प्रेरित करता है, उसके लोगों को एकजुट करता है और वैश्विक मंच पर उसकी क्षमता को प्रदर्शित करता है.

प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर, आइए ओलंपिक के आदर्श वाक्य "Faster, Higher, Stronger – Together" के प्रति प्रतिबद्धता जताएं. भारत को वैश्विक खेल शक्ति बनाने की राह सामूहिक आकांक्षा और निरंतर क्रियान्वयन से शुरू होती है. आइए एक ऐसा भविष्य बनाएं जहाँ भारतीय खिलाड़ी भारतीय निर्मित उपकरणों के साथ जीत हासिल करें, और खेल उपकरण क्षेत्र आर्थिक वृद्धि और राष्ट्रीय गर्व का स्रोत बने. अब कार्य करने का समय है.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन की राय को प्रतिबिंबित करते हों.)

जलज दानी, अतिथि लेखक
(लेखक स्पोर्ट्सकॉम (CII) के अध्यक्ष हैं और SCALE (स्थानीय मूल्यवर्धन एवं निर्यात को बढ़ावा देने के लिए स्टीयरिंग कमेटी) के सदस्य हैं.)


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