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भारत की विदेश नीति को फिर से आकार दे रहा PM मोदी का नया ग्लोबल दक्षिणी आर्क

PM मोदी की यात्रा ने भारत की नई वैश्विक रणनीति को दर्शाया है, जो साझेदारी और सहयोग पर आधारित है. यह भारत को विश्व मंच पर एक मजबूत, विश्वसनीय नेता के रूप में स्थापित करता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

एक दुनिया जो बढ़ती खंडित होती जा रही है, उसमें भारत चुपचाप अपने वैश्विक रुख को उन इलाकों तक फैला रहा है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया दौरा – घाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, अर्जेंटिना, ब्राजील और नामीबिया तक फैला यह विविध सर्किट – पश्चिम अफ्रीका, कैरेबियन, लैटिन अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका में फैला हुआ है. यह दौरा G7 या BRICS की बैठकों के जैसी सुर्खियाँ नहीं बटोरता, लेकिन इसका दीर्घकालिक महत्व गहरा हो सकता है.

यह अभियान केवल एक फोटो-ऑप या सॉफ्ट-पावर का प्रदर्शन नहीं है. यह भारत की विदेश नीति को पुन: संतुलित करने का एक सूक्ष्म प्रयास है, जिसमें एक “ग्लोबल सदर्न आर्क” तैयार किया जा रहा है – एक रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरेखण, जो भारत को एक बहुध्रुवीय दुनिया में मध्यम शक्तियों में एक अग्रदूत के रूप में स्थापित करता है.

घाना: पश्चिमी अफ्रीका का एक प्रवेश द्वार

घाना में मोदी का स्वागत सिर्फ एक उभरती हुई एशियाई शक्ति के नेता के रूप में नहीं, बल्कि अफ्रीका की आकांक्षाओं के मित्र के रूप में किया गया. घाना पश्चिम अफ्रीका के सबसे राजनीतिक रूप से स्थिर और आर्थिक रूप से गतिशील देशों में से एक है, जो भारत के ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर और फिनटेक संपर्क के लिए एक रणनीतिक साथी बनाता है.

भारत पहले से ही घाना का एक प्रमुख व्यापारिक साथी है, लेकिन इस दौरे ने बातचीत को पैमाना-बद्ध व्यापार से क्षमता निर्माण साझेदारियों की ओर बढ़ाया. कृषि, एआई और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत द्वारा समर्थित प्रशिक्षण केंद्रों की घोषणा दीर्घकालिक प्रतिबद्धता दर्शाती है. घाना उन अफ्रीकी राज्यों को साथ ला सकता है जो बहुपक्षीय संस्थाओं जैसे यूएन सुरक्षा परिषद में सुधार के पक्ष में हैं, एक ऐसा क्षेत्र जहाँ भारत व्यापक समर्थन चाहता है.

त्रिनिदाद और टोबैगो: भारतीय महासागर से कैरेबियन तक संबंध
पोर्ट ऑफ स्पेन में मोदी का दौरा बेहद प्रतीकात्मक था. 19वीं सदी में ठेकेदार मजदूरों के वंशजों वाले विश्व की सबसे बड़ी भारतीय प्रवासी आबादी के घर के रूप में, त्रिनिदाद और टोबैगो वह भावनात्मक और सभ्यता संबंध दर्शाता है जो भारत को कैरेबियन से है.

नई सांस्कृतिक आदान-प्रदान, फिनटेक सहयोग और स्वच्छ ऊर्जा साझेदारी की घोषणाओं के साथ, भारत ने संकेत दिया कि वह केवल भावुक जुड़ाव से आगे बढ़कर 21वीं सदी की साझेदारियों में भी निवेश करने को तैयार है. क्षेत्रीय स्वास्थ्य डेटा ग्रिड और महामारी तैयारी पहल पर संयुक्त घोषणा दक्षिण-दक्षिण सहयोग की दिशा में एक ठोस कदम है, जिस दिशा में भारत लंबे समय से अग्रणी बनना चाहता है.

अर्जेंटिना और ब्राजील: लैटिन अमेरिका को आकर्षित करना
ब्यूनस आयर्स और ब्रासीलिया में मोदी के दौरे ने लैटिन अमेरिका में एक अधिक आक्रामक रुख दिखाया. दशकों तक भारत का लैटिन अमेरिका के साथ संपर्क अपूर्ण रहा, जिसमें सहयोगी सद्भाव जरूर था, लेकिन व्यापारिक संबंध अधूरे थे. वह रुझान अब बदल रहा है.

अर्जेंटिना अपने समृद्ध लिथियम भंडारों के कारण भारत की ईवी महत्वाकांक्षाओं के लिए अहम है. भारतीय सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के खिलाड़ियों के साथ संयुक्त उद्यम की बातचीत ने संकेत दिया है कि भारत चीन-नियंत्रित दुर्लभ पृथ्वी बाजारों पर अपनी निर्भरता कम करने को दृढ़ है. अर्जेंटिना ने वैश्विक खनिज शासन तंत्र में भारत की बड़ी भागीदारी के लिए भी समर्थन दिया.

ब्राजील, एक BRICS सदस्य और क्षेत्र की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में, भारत के परिचित मित्र है. फिर भी इस बार मोदी-लुला सम्मेलन ने अधिक रणनीतिक मोड़ लिया, जिसमें डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर, जलवायु वित्तपोषण और वैश्विक संस्थाओं के सुधार पर ध्यान केंद्रित किया गया. भारत के डिजिटल सार्वजनिक वस्तु प्लेटफॉर्म को ब्राज़ील की वित्तीय समावेशन संरचना से जोड़ने का प्रस्ताव विकसित लोकतंत्रों के बीच क्षैतिज तकनीकी सहयोग के लिए एक उदाहरण बन सकता है.

नामीबिया: संरक्षण, संपर्क और साझा हित
नामीबिया को इस दौरे में शामिल किया जाना अपने आप में एक संकेत है. यह केवल कूटनीतिक दिखावे की बात नहीं है, बल्कि यह ग्रह स्तर पर प्रासंगिकता से जुड़ा है. 2022 में नामीबिया ने भारत को आठ चीते भेजे थे, जो एक ऐतिहासिक प्रजाति पुनःस्थापन परियोजना का हिस्सा था. मोदी की यह यात्रा इस बात को मान्यता देती है कि संरक्षण कूटनीति अब विदेश नीति का एक मुख्य उपकरण बनती जा रही है.

लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है. नामीबिया खनिजों से भरपूर, राजनीतिक रूप से स्थिर और अटलांटिक के किनारे रणनीतिक रूप से स्थित देश है, जो भारत के लिए ग्रीन हाइड्रोजन, रेयर अर्थ्स और पोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश के लिए आदर्श स्थल बनाता है. एक ट्रांसकॉन्टिनेंटल लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर पर बातचीत शुरू हुई, जो भारत के दक्षिण अफ्रीका से लैटिन अमेरिका तक के निवेश को जोड़ सकता है, संभवतः ब्राजील के बंदरगाहों के माध्यम से.

द्विपक्षीय से परे: एक गैर-पश्चिमी बहुपक्षवाद का उभार
इन देशों को जो एक साथ जोड़ता है वह न तो भूगोल है, न संस्कृति– बल्कि आकांक्षा है. ये सभी क्षेत्रीय शक्तियाँ हैं, और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएँ हैं. भारत की रणनीति सीधी है: पश्चिमोत्तर विश्व व्यवस्था के बाद प्रभाव उन गठबंधनों से आएगा जो प्रासंगिकता पर आधारित होंगे.

इस मार्ग को चुनकर, जो वाशिंगटन, ब्रुसेल्स या बीजिंग जैसी शक्ति की गलियों से दूर है, मोदी चुपचाप भारत की पुनःस्थिति तय कर रहे हैं. किसी वैकल्पिक महाशक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे साझेदार के रूप में जो सामूहिक उत्थान को सक्षम बनाए.

उनका संदेश स्पष्ट है: भारत कोई शर्त नहीं रखता, न ही किसी संरेखण की माँग करता है, वह गरिमा और साझा विकास पर आधारित सहयोग की पेशकश करता है – एक दृष्टिकोण जो वैश्विक दक्षिण के कई देशों को आकर्षित करता है, जो महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता में मोहरे बनने से थक चुके हैं.

निष्कर्ष: शांत कूटनीति, तेज़ परिणाम
आलोचक इस दौरे को “बड़े सौदों” की कमी वाला मानकर खारिज कर सकते हैं, लेकिन वे पेड़ देखकर जंगल को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं. इसकी सफलता का असली मापदंड सुर्खियों में रहने वाले समझौतों में नहीं, बल्कि उस विश्वास, क्षमता और सहयोग के नेटवर्क में है जिसकी यह नींव रखता है.

मोदी की यह यात्रा एक गहरी सच्चाई को दर्शाती है: कि वैश्विक नेतृत्व का भविष्य प्रभुत्व में नहीं, बल्कि वितरित साझेदारी में है. और ऐसा लगता है, भारत अब उदाहरण पेश करने को तैयार है.

सिद्धार्थ अरोड़ा, अतिथि लेखक
(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति में गहरी रुचि है.)

 


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