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राज्यों को आर्थिक रूप से आश्रित बनाने वाला है मोदी सरकार का ये बजट 

2019-20 में 36.6 फीसदी के चरम पर पहुंचने के बाद, कर राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी लगातार घट रही है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • अजय शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

हम केंद्र सरकार की प्रमुख नीतियों के बड़े पैमाने पर अस्थिर करने वाले प्रभावों को अनदेखा नहीं कर सकते, जो अचानक और उनसे परामर्श किए बिना घोषित की जाती हैं. जैसे कि विमुद्रीकरण और मार्च 2020 के बाद महामारी-प्रेरित लॉकडाउन आदि. बावजूद इसके, राज्य खुद को संसाधनों के लिए बंधा हुआ पाते हैं, भले ही वे प्रभावी रूप से जुटाए गए कुल सार्वजनिक संसाधनों के छोटे हिस्से को आसानी से प्राप्त करते हैं. यह सब जानते हुए भी केंद्रीय बजट 2023-24 में राजकोषीय शक्ति का जो चरम केंद्रीकरण दिखा है, वह एक झटके के रूप में सामने आता है. 14वें वित्त आयोग ने राज्य सरकारों को कर राजस्व का 42 फीसदी आवंटित करने की घोषणा की, जो परेशानी का सबब है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकारों ने इसे बगैर न नुकुर स्वीकार कर लिया, लेकिन इसने लगभग सभी कर वृद्धि को उपकर और अधिभार के रूप में लाकर इसके चारों ओर एक रास्ता खोजने की कोशिश की, जिसे राज्यों के साथ साझा नहीं किया है. इस तरह के उपकर और अधिभार 2011-12 में कुल करों के हिस्से में लगभग 10 फीसदी से बढ़कर 2021-22 में 20 फीसदी से अधिक हो गए हैं.

घट रही राज्यों की हिस्सेदारी
2019-20 में 36.6 फीसदी के चरम पर पहुंचने के बाद, कर राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी लगातार घट रही है. 2021-22 में 33.2 फीसदी और चालू वर्ष के संशोधित अनुमानों में 31.2 फीसदी और फिर 30.4 फीसदी प्रस्तावित बजट में यह एक चौथाई से अधिक कम है, जबकि कुल कर संग्रह में राज्यों का सही हिस्सा होना चाहिए था मगर ऐसा नहीं हुआ. इससे राज्यों को, बजट में दी जाने वाली राशि में भी कमी हुई है. 2021-22 में, इस तरह के हस्तांतरण की राशि 460,575 करोड़ रुपये थी, लेकिन पिछले साल के बजट में उन्हें घटाकर 367,204 करोड़ रुपये कर दिया गया था. इस घटना में, केंद्र स्पष्ट रूप से राज्यों को और भी कम राशि स्थानांतरित करने की योजना बना रहा है, क्योंकि संशोधित अनुमान योजना के लिए केवल 307,204 करोड़ रुपये चालू वित्त वर्ष में स्थानांतरित किए जाने का बजट है. आगामी वर्ष में 359,470 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान पिछले वर्ष के बजट अनुमान से अभी भी कम है. वित्त आयोग के अधिदेशित अनुदान में पिछले कुछ वर्षों की तुलना में तेजी से कमी आई है. यह 2021-22 में 207,435 करोड़ रुपये से गिरकर 2022-23 में 173,157 करोड़ रुपये हो गया है, और केंद्र ने आने वाले वर्ष में उन पर 165,480 करोड़ रुपये से अधिक खर्च नहीं करने का प्रस्ताव बनाया है.

समाधान खोजने का कोई मंच नहीं
नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता के केंद्रीयकरण पर जोर देती है. यह केंद्रीयकरण सिर्फ संघ की राज्य सरकारों के साथ ही नहीं, बल्कि केंद्रीय मंत्रालयों में भी लागू होता है. मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री के बाद गृह मंत्रालय में वास्तविक शक्तियां निहित हैं. योजना आयोग का नाम बदलने के बाद अंतर-राज्यीय परिषद की बैठक भी पिछले छह सालों से नहीं हुई है. राज्य सरकारों की चिंताओं-समस्याओं को रखने और उनके प्रभावी समाधान खोजने का कोई एक मंच नहीं बचा है. आर्थिक नीतियों पर उचित विमर्श की कोई व्यवस्था शेष नहीं है. इसका असर यह हुआ कि राज्य सरकारों ने वित्तीय वर्ष 2019-20 में देश के कुल सार्वजनिक खर्च का लगभग 62.4 फीसदी लिया, मगर कुल संसाधनों का सिर्फ 37.3 फीसदी प्राप्त कीं. यह वास्तविक संघवाद के किसी भी आभास के लिए काफी बुरा होगा.

इनमें लगातार हो रही कटौती
मोदी सरकार रोजगार, पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा में सामाजिक खर्च के प्रमुख तत्वों में लगातार कटौती कर रही है. जैसे, ग्रामीण विकास मंत्रालय का खर्च 2021-22 में 288,446 करोड़ रुपये से घटकर 2023-24 में केवल 236,545 करोड़ रुपये कर दिया गया. इसमें भी सबसे चौंकाने वाला है महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के लिए आवंटन 89,000 करोड़ रुपये के वास्तविक अनुमानित खर्च से घटाकर केवल 60,000 करोड़ रुपये करना, जबकि यह ग्रामीण गरीबों के लिए महत्वपूर्ण जीवन रेखाओं में से एक है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पर खर्च 2022-23 के लिए अनुमानित 215,000 करोड़ रुपये से घटाकर लगभग आधा 135,000 करोड़ रुपये किया गया है. यह महामारी के दौरान दिये गये पांच किलो मुफ्त राशन को जस्टीफाई करने के लिए है. पात्र परिवार अब अपना कुल 35 किलोग्राम प्रति परिवार मुफ्त अनाज ले रहे हैं. इसमें पहले से ही 1 रुपये प्रति किलोग्राम मोटे अनाज, 2 रुपये प्रति किलोग्राम गेहूं और 3 रुपये प्रति किलोग्राम चावल पर अनुदान दिया जा रहा है. प्रति व्यक्ति अतिरिक्त पांच किलोग्राम अब उपलब्ध नहीं होगा, जो गरीबों के लिए खाद्यान्न की पहुंच को कम करता है, क्योंकि परिवारों को अब अपनी शेष आवश्यकता खुले बाजार से अधिक कीमतों पर पूरी करनी होगी. आमतौर पर, यह स्वीकार करने के बजाय कि वह खाद्य सब्सिडी को कम कर रही है, सरकार ने अपनी प्रचार योजना के जरिए इस सच को छिपाने की कोशिश की है. भूख और कुपोषण को देखते हुए, इस वक्त खाद्य अनुदान में यह कमी उचित नहीं है. कई राज्यों ने बड़ी आबादी को और अधिक रियायती कीमतों पर केंद्र द्वारा प्रदान किए गए खाद्यान्न और अन्य बुनियादी खाद्य पदार्थों को प्रदान करने की मांग की है, अब इसे प्रबंधित करना बहुत कठिन होगा.

राज्यों के लिए भीख मांगने की नौबत
महामारी के दौरान छात्रों को हुए सीखने के नुकसान के लिए अधिक निवेश की तत्काल आवश्यकता के बावजूद स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा दोनों पर खर्च वास्तविक रूप से (मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए) कम किया गया. यह केंद्र सरकार के कुल स्वास्थ्य खर्च के लिए भी सही व्यवस्था नहीं है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और एकीकृत बाल विकास सेवाओं के लिए आवंटन में भी कमी की गई है. कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों के पारिश्रमिक को मुद्रास्फीति के अनुरूप रखने की कोशिश करना तो दूर, केंद्र सरकार इनके जरिए वेतन वृद्धि की उम्मीद भी तोड़ रही है. इससे वो राज्य सरकारें प्रभावित है, जो इन कार्यक्रमों का विस्तार और सुधार करने और लोगों के लिए रहने की बेहतर बुनियादी स्थिति प्रदान करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रही थीं. यदि वे इन क्षेत्रों में अपने मौजूदा कार्यक्रमों को बनाए रखना चाहते हैं, तो उन्हें किसी तरह कुल राजस्व के अपने तेजी से सिकुड़ते शेयरों में से संसाधनों को खोजना होगा. सेवा कर के कार्यान्वयन ने राज्यों की लगभग सभी राजस्व-बढ़ाने वाली शक्तियों को केंद्र सरकार ने समाप्त कर दिया है. उत्पाद शुल्क और ईंधन और शराब पर कर, ऊर्जा शुल्क, स्टांप शुल्क जैसे कुछ कर ही राज्य सरकार के पास रह गये हैं. मजबूरन, राज्य सरकारों को संसाधनों के लिए शोर मचाने से लेकर भीख तक मांगनी पड़ती है, भले ही उन्हें नागरिकों के बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार बनाया गया है.

ताना-बाना बिगड़ने का खतरा
जिम्मेदारी और जवाबदेही के महत्वपूर्ण विकेंद्रीकरण के साथ राजनीतिक, आर्थिक और वित्तीय शक्ति की अत्यधिक एकाग्रता का यह विरोधाभासी संयोजन स्पष्ट रूप से 'सहकारी संघवाद' के साथ असंगत है. वास्तव में, यह किसी भी वास्तविक संघवाद के अनुकूल नहीं है. यह तब, जबकि विपक्षी दलों की सरकारों वाले राज्यों के प्रति केंद्र का स्पष्ट भेदभाव-शत्रुता व्यवहार दिखता है. बजट में जब यह दिखे तो, हमारा राजनीतिक ताना-बाना बिगड़ने का खतरा बना रहता है.


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