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ऑपरेशन सिंदूर: कैसे भारत ने प्राचीन ज्ञान और AI को आधुनिक युद्ध में जोड़ा?

प्रियंका शर्मा कैन्तुरा लिखती हैं ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ एक सैन्य प्रतिकार नहीं था, यह उस पवित्र सिंदूर की वापसी थी, जो भारत की बेटियों के माथे से मिटा दिया गया था.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भारतीय परंपरा में, शक्ति सिर्फ एक देवी नहीं है। यह एक ऊर्जा है, एक सिद्धांत है, और एक रणनीति है. हाल ही में हुआ ऑपरेशन सिंदूर, जिसमें भारत ने पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली पर तेज और सटीक हमला किया, केवल सैन्य कौशल नहीं था. यह चलती हुई शक्ति थी- दुर्गा का संतुलित नियंत्रण, काली की निर्भीक सटीकता, और सरस्वती का मौन कथा-नियंत्रण.

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देवी महात्म्यम में, दुर्गा महिषासुर की अराजकता को शांत भाव से देखती हैं, अपनी ऊर्जा को धीरे-धीरे और संयम से एकत्र करती हैं, और केवल सटीक क्षण पर अपना क्रोध प्रकट करती हैं. ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना ने इसी संयमित रणनीतिक निर्माण को प्रतिबिंबित किया.
इस हालिया हमले में, भारतीय वायुसेना ने डिकॉय विमान भेजे, जो सुखोई-30 और मिग-29 जैसे प्रतीत हो रहे थे, ताकि पाकिस्तानी वायु रक्षा प्रणाली को उजागर किया जा सके. दुश्मन ने गोलीबारी की. हमने देखा, हमने सीखा और फिर, सटीकता से प्रहार किया, जैसे दुर्गा ने महिषासुर के अनेक रूपों को देखने के बाद अपना क्षण चुना. यह आवेग में आया क्रोध नहीं था; यह संयमित अग्नि, रणनीतिक शांति, सटीकता थी.

दुर्गा की शक्ति के अंतर्गत, भारत ने अपने उपग्रहों, AWACS और ग्राउंड-आधारित रडार सिस्टम को जोड़कर 360-डिग्री उच्च स्तरीय युद्ध क्षेत्र जागरूकता का निर्माण किया. भारत सिर्फ प्रतिक्रियाशील नहीं था, वह पूर्व-सक्रिय था. आकाशतीर द्वारा संचालित, हमारी नई एआई-एकीकृत रक्षा प्रणाली ने आकाश में एक अदृश्य ढाल बना दी, जो ऊँचाई पर तैनात S-400s, MRSAMs, आकाश मिसाइलों और एंटी-एयरक्राफ्ट गनों को निर्बाध रूप से जोड़ती है. जैसे दुर्गा के अस्त्रों ने स्वर्ग में असुरों को रोका, वैसे ही इस अग्नि गुंबद ने सुनिश्चित किया कि कोई भी दुश्मन हथियार भारत की पवित्र भूमि को न छू सके। हर पाकिस्तानी हमला विफल हो गया.

यह सिर्फ अग्नि-शक्ति नहीं थी, यह पूर्वदृष्टि थी. इससे पहले कि शक्ति दुश्मन का नाश करे, उसने खुद को मज़बूत किया और सुरक्षा सुनिश्चित की। उसने युद्ध शुरू होने का इंतजार नहीं किया; वह बहुत पहले से तैयार थी.

महिषासुर ने सोचा था कि उसने देवताओं को चकमा दे दिया, उसने दुर्गा के धैर्य की गणना नहीं की थी.

काली की निर्दय स्पष्टता: ब्रह्मोस के प्रहार
काली प्रतीक्षा नहीं करती, वह विनती नहीं करती, वह धर्म को खतरे में डालने वाले को सर्जन जैसी सटीकता से काट देती है. एक बार जब भारत ने रणनीतिक धोखा अभियानों और वास्तविक समय खुफिया जानकारी की मदद से युद्ध क्षेत्र का मानचित्रण कर लिया, तो हवाई हमला शुरू हुआ.

मिसाइलें दागी गईं, जिनमें लगभग 15 ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलें शामिल थीं, प्रत्येक अत्यधिक सटीकता के साथ, एक समन्वित हमले में, पहले नौ आतंकी ठिकानों को जमीनदोज कर दिया गया. बाद में, लक्षित बारह में से ग्यारह पाकिस्तानी वायुसेना के ठिकाने कुछ ही मिनटों में निष्क्रिय कर दिए गए.

जैसे काली ने रक्तबीज का सामना किया, जिसकी हर रक्तबूँद एक नए राक्षस को जन्म देती थी, भारत ने एक ऐसे दुश्मन का सामना किया जिसने लंबे समय से भ्रम, विषमता और प्रॉक्सी युद्ध पर भरोसा किया था, लेकिन काली गुणा की अनुमति नहीं देती, वह खतरे को जड़ से निगल जाती है. हर ब्रह्मोस प्रहार उसकी तरह था – तीव्र, अंतिम और अपरिवर्तनीय.

पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उनके प्रमुख रडार और वायु निगरानी केंद्र को निष्क्रिय कर दिया गया, जिनमें लाहौर स्थित केंद्र भी शामिल था, जो पश्चिमी वायु रक्षा नेटवर्क की आँख और कान था.  यह कोई क्रोध से उपजा हमला नहीं था. यह शून्यता की गति थी, शांत जागरूकता से उत्पन्न निर्णायक कार्रवाई.
जल्द ही जैकबाबाद, सर्गोधा और नूर खान (जो जीएचक्यू रावलपिंडी के निकट है) पर प्रहारों ने उन्हें घुटनों पर ला दिया, नियंत्रित विनाश, कोई नागरिक लक्ष्य नहीं, कोई अराजकता नहीं, सिर्फ स्पष्टता, यह भारत का नियंत्रण खोना नहीं था, यह भारत का नियंत्रण पुनः प्राप्त करना था. यह प्रतिशोध की अग्नि नहीं थी, यह व्यवस्था को पुनः जाग्रत करने की अग्नि थी.

जैसे काली ने बेहोश शिव के वक्ष पर नृत्य कर अपने क्रोध को रोका, वैसे ही भारत भी वहीं रुका जहाँ पाठ पढ़ाया गया, न उससे आगे, न उससे अधिक.

सरस्वती का कथा-नियंत्रण: शांत, स्वच्छ संदेश
किसी भी युद्ध में, धारणा की भी लड़ाई होती है. सरस्वती, ज्ञान और स्पष्टता की देवी, जो न केवल वाणी, रणनीति और सत्य को संचालित करती हैं, बल्कि वह रणनीतिक मौन भी रखती हैं जब शब्द हानिकारक हो सकते हैं. भारत ने कथा अनुशासन का पालन किया – न कोई अतिरिक्त टिप्पणी, न समय से पहले उत्सव, न झूठे दावे, केवल परिणामों की शांत पुष्टि, वह भी सही समय पर, 

जब अभियान के बीच में गलत सूचना फैली, जैसे कि भारतीय लड़ाकू विमानों को गिराए जाने के दावे, भारत ने शांत रहकर दुश्मन को अपने कदमों का पता नहीं चलने दिया, समय लिया और जब लक्ष्य पूरे हो गए तब सीधी सच्चाई से उसका जवाब दिया, न किसी को हमारे युद्ध कक्षों में झाँकने दिया, न ही किसी झूठ को जनभावना को विकृत करने दिया. यह स्पष्टता के माध्यम से युद्ध था, शोरगुल के माध्यम से नहीं.

जैसे सरस्वती अज्ञानता को तर्क से नहीं, बल्कि प्रकाश से पराजित करती हैं, वैसे ही भारत ने तथ्यों को कल्पनाओं को मिटाने दिया.
तीन शक्तियाँ- एक अभियान, स्थायी शक्ति,
1. दुर्गा की दूरदर्शिता और संयम
2. काली की सटीकता और अंतिमता
3. सरस्वती की रणनीतिक अभिव्यक्ति

ऑपरेशन के प्रत्येक चरण ने शक्ति के शाश्वत रूपों के साथ सामंजस्य स्थापित किया, जो कभी महिषासुर और रक्तबीज जैसे राक्षसों का वध करने के लिए उपयोग में लाए गए थे, अब आतंकवाद के संरक्षकों को निष्क्रिय करने के लिए प्रवाहित हुए. भारत ने केवल जोर से नहीं प्रहार किया. भारत ने सही जगह प्रहार किया, और ऐसा करके उस प्राचीन ज्ञान को जागृत किया, जो अब मंदिरों में नहीं, बल्कि रणनीति कक्षों, कॉकपिटों और कमांड सेंटर्स में जीवित है.

ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य प्रतिकार नहीं था, यह उस पवित्र सिंदूर की वापसी थी, जो भारत की बेटियों के माथे से मिटा दिया गया था और इसका प्रतिशोध कौन ले सकता था सिवाय उस देवी के, जो रक्त को अपना मुकुट बनाती हैं – दुर्गा, काली और सरस्वती, जो हमारी सेनाओं के माध्यम से उदित हुईं- प्रचंड, संतुलित और अडिग, यह स्वयं दिव्य नारी शक्ति थी जिसने पलटवार किया. पाकिस्तान के लिए, यह केवल एक हमला नहीं था – यह वह लाल रेखा थी, जिसे पार करने का दुस्साहस वे नहीं कर सकते.


(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.)
अतिथि लेखिका-प्रियंका शर्मा कैन्तुरा,
प्रियंका शर्मा कैन्तुरा एक लेखिका, वक्ता और ब्रांड-प्रतिष्ठा-परिवर्तन-संस्कृति संप्रेषण की विशेषज्ञ हैं. उन्होंने महादेवी – द अनसीन ट्रुथ बिहाइंड एग्ज़िस्टेंस और माय जिफ्फीज – नैरेशन ऑफ मोमेंट्स अनअडल्टरेटेड एंड अनपैकेज्ड जैसी पुस्तकें लिखी हैं, जिन्हें पौराणिकता और सामाजिक विषयों की उनकी गहराई से पड़ताल के लिए सराहना मिली है. उन्हें इंदिरा प्रियदर्शिनी अवार्ड 2023 और टाइम्स पावर आइकॉन 2018 सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं. वह मिथक और पौराणिकता के बीच अंतर स्पष्ट करने और सार्थक संवाद को प्रोत्साहित करने को लेकर प्रतिबद्ध हैं. प्रियंका प्रमुख प्रकाशनों के लिए लिखती हैं और अकादमिक व साहित्यिक मंचों पर बोलती हैं.


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