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नेपाल की डिजिटल बगावत और दक्षिण एशिया का नाज़ुक संतुलन

भारत के लिए यह एक गंभीर चेतावनी है, दक्षिण एशिया के भीतर अस्थिरता न केवल उसकी सीमाओं को प्रभावित करती है, बल्कि रणनीतिक संतुलन को भी बिगाड़ सकती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

नेपाल राजनीतिक अस्थिरता का अजनबी नहीं रहा है. फिर भी इस हफ्ते भड़की विरोध की लहर ने अनुभवी पर्यवेक्षकों को भी चौंका दिया. “फेक न्यूज़” पर अंकुश लगाने के बहाने लगाए गए सरकार द्वारा सोशल मीडिया प्रतिबंध ने उस पीढ़ी को भड़का दिया, जो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अपनी जीवनरेखा और जीविका दोनों मानती है. रातों-रात काठमांडू, पोखरा और विराटनगर की सड़कों पर हजारों युवा नेपाली उमड़ पड़े, स्मार्टफोन लहराते हुए उस सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते जो अधिनायकवादी और यथार्थ से कटी हुई दिख रही थी.

गुस्सा सिर्फ फेसबुक और टिकटॉक को लेकर नहीं था. यह वर्षों से जमा हुई कुंठा का विस्फोट था: बेरोज़गारी, शीर्ष नेताओं को घेरते भ्रष्टाचार के घोटाले, और एक राजनीतिक वर्ग जो बिना बदलाव लाए वही पुराने चेहरे दोहराता रहा. प्रधानमंत्री का इस्तीफा उस संकट का नतीजा था, जिसने सरकार को वैधता से वंचित कर दिया.

काठमांडू में चिंगारी

नेपाल के प्रधानमंत्री ने लंबे समय तक एक ऐसे गठबंधन को संभाला जो दूरदर्शिता से अधिक मौके पर आधारित था. लेकिन सोशल मीडिया पर लगा प्रतिबंध ऊंट की पीठ पर आखिरी तिनका साबित हुआ. इसने विभिन्न युवा समूहों, नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं, और यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी के भीतर असंतुष्ट गुटों को एकजुट कर दिया. यह दृश्य भयावह थे: एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जो प्रेषण और पर्यटन पर निर्भर है, डिजिटल कनेक्टिविटी को बंद करना नागरिकों और निवेशकों दोनों को बिल्कुल गलत संदेश देता है.

यह इस्तीफा, जिसे “जनता की जीत” कहा गया, नेपाल की शासन प्रणाली की संरचनात्मक कमजोरी को भी उजागर करता है. पंद्रह वर्षों में बारह प्रधानमंत्रियों का बदलना किसी भी सुसंगत नीति निरंतरता को असंभव बना देता है, जिससे नेपाल आंतरिक सड़न और बाहरी हस्तक्षेप दोनों के लिए संवेदनशील बना रहता है.

ढाका की गूंज

जब भी दक्षिण एशिया में राजनीतिक कंपन होते हैं, विदेशी हस्तक्षेप की फुसफुसाहटें कभी दूर नहीं होतीं. क्या अमेरिका, जो हिमालय क्षेत्र में चीनी प्रभाव को संतुलित करना चाहता है, गुप्त रूप से अस्थिरता को बढ़ावा दे रहा है? या फिर खुद बीजिंग घटनाओं को उकसा रहा है, उस सरकार को दंडित करने के लिए जो वाशिंगटन की मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन (MCC) संधि के बहुत करीब जाती दिख रही थी?

इनमें से कोई भी सिद्धांत पूरी तरह खारिज नहीं किए जा सकते. नेपाल महान शक्तियों की प्रतिस्पर्धा में सबसे आगे है: चीन इसे बेल्ट एंड रोड का साझेदार और भारत के खिलाफ एक बफर के रूप में देखता है, जबकि अमेरिका इसे इंडो-पैसिफिक में अपने लिए एक आधार मानता है.

जो बात अजीब तरह से जानी-पहचानी लगती है, वह यह है कि नेपाल की घटनाएं पिछले साल बांग्लादेश में हुए युवाओं द्वारा नेतृत्व किए गए विरोध प्रदर्शनों से काफी मिलती-जुलती हैं. वहां भी, जमकर जमी हुई राजनीतिक शक्तियों से मोहभंग, बढ़ती असमानता, और डिजिटल स्वतंत्रता पर हमलों ने जेनरेशन-जेड को सड़कों पर ला दिया. लेकिन ढाका में अब यह एक खुला रहस्य है कि वे विरोध पूरी तरह से स्वाभाविक नहीं थे. अमेरिकी प्रशासन, जो शेख हसीना के चीन की ओर झुकाव और वाशिंगटन की शर्तों को मानने से इनकार से नाराज़ था, उन्हें एक अधिक “अनुकूल” नेतृत्व से बदलने को इच्छुक था.

जो गुस्सा भ्रष्टाचार और अधिनायकवाद के खिलाफ था, उसे बाहरी समर्थन ने न केवल बढ़ाया बल्कि उसे एक राजनीतिक दिशा भी दी. यह एक गंभीर सबक है: दक्षिण एशिया में वास्तविक घरेलू कुंठाएं बड़ी ताकतों के खेल का उर्वर मैदान बन सकती हैं.

ट्रम्प की परछाईं

कुछ भारतीय रणनीतिकार इससे भी गहरे इशारों की बात करते हैं. डोनाल्ड ट्रम्प की दूसरी सरकार पहले ही भारत को टैरिफ और पाकिस्तान के प्रति व्यवहारिक रुख से परेशान कर चुकी है. बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान जैसे तीन अशांत पड़ोसी भारत को घेरे रहते हैं, उसे व्यस्त और बाहर प्रभाव फैलाने में अक्षम बनाए रखते हैं. क्या वाशिंगटन, जानबूझकर या अनजाने में, भारत के पड़ोस में अस्थिरता को स्वीकार कर रहा है?

यह अटकल हो सकती है, लेकिन पूरी तरह अवास्तविक नहीं है. अमेरिका की दक्षिण एशिया नीति ऐतिहासिक रूप से व्यावसायिक, लेन-देन आधारित और अक्सर भारत की सुरक्षा चिंताओं के प्रति उदासीन रही है. भारत के लिए, सतर्कता ही मार्गदर्शक सिद्धांत होनी चाहिए, न कि भ्रम.

दक्षिण एशिया - और भारत के लिए नतीजे

नेपाल का संकट कोई अलग घटना नहीं है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में फैली एक गहरी बीमारी का लक्षण है: युवाओं की जवाबदेही की मांग, राजनीतिक अभिजात वर्ग का वही घिसा-पिटा तरीका, और बाहरी शक्तियों का लालच. इसके प्रभाव चिंताजनक हैं. पहला, नेपाल की अस्थिरता भारत के सीमावर्ती राज्यों, विशेष रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश में फैल सकती है, जिनके साथ गहरे सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध हैं. दूसरा, यह भारत और चीन के बीच हिमालय में चल रही नाजुक रणनीतिक संतुलन को और जटिल बना देता है, क्योंकि काठमांडू में किसी भी शक्ति शून्य को बीजिंग तुरंत भरने की कोशिश करता है. तीसरा, यह भारत के लिए अपने क्षेत्रीय संबंधों को नए सिरे से सोचने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है.

नई दिल्ली केवल प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं रह सकती. उसे दीर्घकालिक साझेदारी में निवेश करना होगा जो सिर्फ सरकार से सरकार तक सीमित न हों: युवा उद्यमिता, शैक्षणिक आदान-प्रदान, डिजिटल ढांचे, और नागरिक समाज के रिश्तों को भी बढ़ावा देना होगा. भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी यह क्षमता है कि वह दक्षिण एशिया की युवा आबादी से एक जीवंत लोकतंत्र के imperfect लेकिन प्रेरणादायक मॉडल के रूप में जुड़ सकता है. इस “सॉफ्ट पावर” को जानबूझकर पोषित करने की आवश्यकता है.

दीवार पर लिखी इबारत पढ़ना

नेपाल के जेनरेशन-जेड के प्रदर्शन सिर्फ टिकटॉक के बारे में नहीं हैं, वे विश्वास, सम्मान और एक पीढ़ी की आवाज़ सुने जाने की मांग के बारे में हैं. भारत के लिए संदेश साफ है: दक्षिण एशिया के युवा अब नई राजनीतिक जलवायु के निर्माता बनते जा रहे हैं. अगर नई दिल्ली उन्हें सार्थक तरीके से नहीं जोड़ेगी, तो बीजिंग, वाशिंगटन या स्थानीय अवसरवादी शक्तियां जरूर करेंगी.

हिमालय भले दूर दिखाई देते हों, लेकिन भू-राजनीति में कंपन बड़ी तेजी से नीचे की ओर बहते हैं.


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