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मोदी दशक: दलाल स्ट्रीट से डिजिटल इंडिया तक

मोदी के तीसरे कार्यकाल की असली परीक्षा यह नहीं है कि क्या बाजार अपनी तेजी बनाए रख सकते हैं, बल्कि यह है कि क्या पिछले एक दशक में बनाई गई नींव अगली विकास की लहर को संभाल सकती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मदिन के मौके पर, भारत के शेयर बाजार बदलाव की एक अद्भुत तस्वीर पेश कर रहे हैं. बीएसई सेंसेक्स, जो 16 मई 2014 को चुनाव परिणामों के समय 24,122 पर था, जो कल 82,381 पर बंद हुआ.  यह 241 प्रतिशत की जबरदस्त छलांग है, जिसने हर प्रमुख वैश्विक सूचकांक को पीछे छोड़ दिया है. लेकिन इन सुर्खियों के पीछे एक गहरी कहानी है,  संरचनात्मक बदलाव की, जिसने केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को ही नहीं, बल्कि भारतीयों के जीने, काम करने और लेनदेन करने के तरीके को भी बदल दिया है.

महान लोकतांत्रिकरण
शायद मोदी युग के प्रभाव को सबसे अच्छा दर्शाने वाली चीज है डीमैट खातों में हुआ विस्फोट 2014 में 2 करोड़ से कम से आज 20 करोड़ से अधिक. यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है; यह उस महत्वाकांक्षा की बात है जिसमें आम भारतीय को भी अब संपत्ति सृजन की मेज पर जगह मिली है. निवेशक संपत्ति में ₹80.6 लाख करोड़ से ₹462 लाख करोड़ की वृद्धि कुछ अभूतपूर्व दर्शाती है: एक ऐसे देश में जहां कभी केवल सोना और संपत्ति ही मूल्य की विश्वसनीय साधन थे, वहां अब इक्विटी भागीदारी को मुख्यधारा में लाना.

यह लोकतांत्रिकरण केवल शेयर स्वामित्व तक सीमित नहीं है. एक दशक पहले लगभग न के बराबर रहे यूपीआई लेनदेन FY25 में 185.8 बिलियन ट्रांजैक्शन के माध्यम से ₹261 लाख करोड़ को पार कर गए. जब आपकी गली का सब्ज़ीवाला भी QR कोड से भुगतान स्वीकार करता है, तो यह डिजिटल क्रांति की गहराई को दर्शाता है.

प्रति दिन औसतन ₹90,000 करोड़ के यूपीआई लेनदेन की कीमत केवल एक आंकड़ा नहीं है; यह लाखों छोटे व्यवसायों के लिए जीवनरेखा है और औपचारिक आर्थिक भागीदारी के लिए उत्प्रेरक है.

इन्फ्रास्ट्रक्चर दांव की सफलता
मोदी सरकार की सबसे बड़ी बाजी थी, आधारभूत ढांचे पर, और आंकड़े इस रणनीति की पुष्टि करते हैं. सार्वजनिक पूंजीगत व्यय FY15 के ₹2 लाख करोड़ से बढ़कर FY25 के लिए ₹11.11 लाख करोड़ तक पहुंच गया, छह गुना वृद्धि, जो नई सड़कों से लेकर भारत के दूरदराज़ गांवों तक डिजिटल कनेक्टिविटी में दिखाई देती है.

यह इन्फ्रास्ट्रक्चर पुश केवल सीमेंट और स्टील तक सीमित नहीं था. आधार, यूपीआई और ब्रॉडबैंड पहुंच से बना डिजिटल ढांचा भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम के फलने-फूलने की नींव बना. 110 से अधिक यूनिकॉर्न और दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम लेकर, भारत ने खुद को सेवा आउटसोर्सिंग गंतव्य से वैश्विक डिजिटल नवाचार के केंद्र में बदल दिया.

14 क्षेत्रों में ₹1.97 लाख करोड़ की प्रोत्साहन राशि वाली प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाएं पहले ही ₹1.76 लाख करोड़ का वास्तविक निवेश आकर्षित कर चुकी हैं. यह केवल औद्योगिक नीति नहीं है; यह भारत के माध्यम से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को पुनः संरचित करने का प्रयास है. जब संचयी एफडीआई प्रवाह \$1 ट्रिलियन की सीमा पार कर जाता है  और उसका 69% मोदी वर्षों में आता है, तो यह भारत की आर्थिक दिशा में अंतर्राष्ट्रीय विश्वास का संकेत है.

अधूरी एजेंडा
हालांकि बाजार की उत्सुकता और डिजिटल परिवर्तन प्रभावशाली हैं, कुछ बुनियादी तथ्य अब भी ज्यों के त्यों हैं. जीडीपी में विनिर्माण का हिस्सा 2013-14 में जितना था, आज भी उतना ही 17.3%. "मेक इन इंडिया" के तमाम प्रचार के बावजूद, इस क्षेत्र का रोजगार में योगदान निराशाजनक 11% है. इसका मतलब है कि भारत ने निवेश तो आकर्षित किया और उत्पादकता में सुधार किया, लेकिन जिस विनिर्माण आधारित रोजगार उछाल की उम्मीद थी, वह साकार नहीं हुआ.

रोजगार सृजन की कहानी भी उतनी सीधी नहीं है. सरकार का दावा है कि 2014-24 के बीच 17.9 करोड़ नौकरियां बनीं, जबकि पिछले दशक में यह संख्या 2.9 करोड़ थी. फिर भी गुणवत्ता को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं. यह रोजगार मुख्य रूप से कृषि और असंगठित सेवा क्षेत्रों में केंद्रित लगते हैं, बजाय उन औपचारिक विनिर्माण नौकरियों के, जो आम तौर पर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में मध्यम वर्ग की समृद्धि का आधार होती हैं.

यहां तक कि एफडीआई की गति, जो FY22 में USD 71 बिलियन पर चरम पर थी, वह FY25 की पहली छमाही में USD 42 बिलियन तक सीमित रह गई है. इसके पीछे भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक तरलता की तंगी एक कारण हैं, लेकिन यह यह भी दर्शाता है कि जैसे-जैसे आसान अवसर समाप्त हो रहे हैं, भारत की निवेश आकर्षण क्षमता को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है.

बाजार की गर्मी और भविष्य के जोखिम
आज के बाजार मूल्यांकन अपने साथ चेतावनी भी लेकर आते हैं. मिड और स्मॉल-कैप शेयर 35 गुना से अधिक आय पर कारोबार कर रहे हैं, जिससे बबल जैसी स्थिति की आशंका फिर से खड़ी हो गई है. बाजार पूंजीकरण-से-जीडीपी अनुपात 140 प्रतिशत है, जो दर्शाता है कि भविष्य के बड़े रिटर्न पहले ही मूल्य में शामिल हो चुके हैं. वैश्विक निवेशक, जो पहले से ही उच्च ब्याज दरों की आशंका से चिंतित हैं, अगर भारत की विकास गति धीमी हुई तो अपना आवंटन पुनर्विचार कर सकते हैं.

मोदी के तीसरे कार्यकाल की असली परीक्षा यह नहीं है कि क्या बाजार तेजी बनाए रख सकते हैं, बल्कि यह है कि क्या पिछले दशक में बनाए गए ढांचे अगली विकास लहर को संभाल सकते हैं. जैसे-जैसे राजकोषीय गुंजाइश कम होती है, अब निजी निवेश को सार्वजनिक व्यय से नेतृत्व संभालना होगा. सरकारी नेतृत्व वाले निवेश चक्र से निजी क्षेत्र आधारित विकास में बदलाव ही यह तय करेगा कि भारत का आर्थिक चमत्कार स्थायी है या क्षणिक.

आगे की राह

भारत की बैलेंस शीट की मरम्मत काफी हद तक पूरी हो चुकी है, बैंक एनपीए दशक के निचले स्तर पर हैं और कॉर्पोरेट ऋण घटा है. निजी पूंजीगत व्यय पुनरुद्धार का मंच तैयार है, विशेष रूप से हरित विनिर्माण क्षेत्रों जैसे कि सेमीकंडक्टर, बैटरियां और इलेक्ट्रोलाइजर में, जो पहले से ही विस्तारित PLI प्रोत्साहनों से लाभान्वित हो रहे हैं.

मोदी दशक की असली विरासत सिर्फ सेंसेक्स के 25,000 से 82,000 तक की यात्रा में नहीं है. यह उस अर्थव्यवस्था के निर्माण में है, जहां महाराष्ट्र के ग्रामीण किसान ई-कॉमर्स के माध्यम से उत्पाद बेच सकता है, बेंगलुरु का स्टार्टअप वैश्विक पूंजी तक पहुंच सकता है, और मुंबई का फुटपाथ विक्रेता डिजिटल भुगतान स्वीकार कर सकता है.

क्या यह नींव गहन औद्योगीकरण, बेहतर वेतन वाली नौकरियों और निरंतर निर्यात प्रतिस्पर्धा को संभाल सकेगी, यही तय करेगा कि हम भारत के आर्थिक परिवर्तन की शुरुआत देख रहे हैं या इसका चरम प्रदर्शन.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और जरूरी नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करें.)

निकुंज सराफ, गेस्ट लेखक, सीईओ, चॉइस वेल्थ
 


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