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COP 30 में खनिज: अवसर नहीं, विकास की मजबूत नींव

COP 30 में खनिजों को औपचारिक रूप से अंतिम दस्तावेज में शामिल न किया जाना भले ही निराशाजनक लगे, लेकिन यह जलवायु नीति में उनकी भूमिका के अंत का संकेत नहीं है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 9 months ago

नवंबर में ब्राजील के बेलेम में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के तहत पार्टियों का 30वां सम्मेलन (COP 30), जिसे पहला ‘इम्प्लीमेंटेशन COP’ बताया गया था. इससे पेरिस समझौते के तहत स्टॉकटेकिंग और प्रतिज्ञाओं से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई की उम्मीद की जा रही थी. इसका परिणाम मिला-जुला रहा. जहां वार्ताकार कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहमति तक पहुंचे, वहीं कुछ सबसे अधिक राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे अनसुलझे रह गए. अंतिम दस्तावेज में जीवाश्म ईंधन से दूर जाने की कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता शामिल नहीं की गई, जबकि 80 से अधिक देशों ने जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए एक स्पष्ट और औपचारिक रोडमैप की मांग की थी.

भू-राजनीतिक तनावों और जारी संघर्षों की पृष्ठभूमि में आयोजित COP 30 में जस्ट ट्रांजिशन मैकेनिज़्म (JTM) और पॉलीसेंट्रिक ग्लोबल म्युटिराओ को मंजूरी देने में आश्चर्यजनक एकजुटता और सामंजस्य देखने को मिला. म्युटिराओ जलवायु कार्रवाई को आगे बढ़ाने के लिए सामूहिक और वितरित प्रयासों को दर्शाता है.

जलवायु वित्त, अनुकूलन, जलवायु कार्रवाई के लिए देश सरकारों को समर्थन, राष्ट्रीय निर्धारित योगदानों (NDCs) को लागू करने में मदद और जलवायु से जुड़ी गलत सूचनाओं से निपटने जैसे क्षेत्रों में सहमति बनी.

बेलेम में खनिज

हालांकि परिचालन से जुड़े विवरण अभी विकसित हो रहे हैं, लेकिन JTM अंतरराष्ट्रीय सहयोग के पक्ष में एक स्पष्ट राजनीतिक संकेत देता है, जो अधिकार-आधारित और राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित न्यायसंगत संक्रमण पर आधारित है.

इस वर्ष की जलवायु वार्ताओं में एक और महत्वपूर्ण विकास खनिजों को लेकर बढ़ता ध्यान रहा, विशेष रूप से “क्रिटिकल एनर्जी ट्रांजिशन मिनरल्स” (CETMs) पर. पहली बार, खनिजों को वार्ताओं में प्रमुखता से शामिल किया गया, जो ऊर्जा संक्रमण की भौतिक बुनियादों की स्वीकार्यता को दर्शाता है. लिथियम, कोबाल्ट और निकेल सौर, पवन और ऊर्जा भंडारण तकनीकों के लिए आवश्यक हैं, और इनमें से कुछ की मांग 2050 तक छह गुना बढ़ने का अनुमान है.

CETMs के अलावा, खनिजों की एक व्यापक श्रृंखला विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में बुनियादी ढांचे, गतिशीलता और उपभोक्ता वस्तुओं का आधार है. जस्ट एनर्जी ट्रांजिशन के एक मसौदा पाठ में विविधीकृत, टिकाऊ और जिम्मेदार आपूर्ति श्रृंखलाओं पर जोर दिया गया, जिसे यूरोपीय संघ, यूके, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, कोलंबिया और कई अफ्रीकी देशों का समर्थन मिला.

बताया जाता है कि रूस और चीन ने ‘क्रिटिकल’ खनिज शब्द के उपयोग और खनन में ESG विचारों को बाध्यकारी ढांचे में शामिल करने का विरोध किया. नतीजा सतत विकास लक्ष्यों (SDG) की वार्ताओं जैसा ही रहा. निर्विवाद महत्व के बावजूद, खनिज अंतिम COP दस्तावेज़ में जगह नहीं बना पाए.

बेलेम से अंताल्या तक का रास्ता

खनिजों को लेकर गति COP से बाहर भी बढ़ रही है. दक्षिण अफ्रीका की G20 अध्यक्षता के तहत, क्रिटिकल मिनरल्स पर चर्चाएं प्रमुख रहीं. G20 नेताओं की घोषणा में समावेशी विकास के लिए क्रिटिकल मिनरल्स के उपयोग पर एक समर्पित खंड शामिल किया गया और एक स्वैच्छिक, गैर-बाध्यकारी क्रिटिकल मिनरल्स फ्रेमवर्क का समर्थन किया गया.

इसी तरह, नैरोबी में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा के दौरान उच्च-स्तरीय चर्चाओं में लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं और CETMs से जुड़े पर्यावरणीय और सामाजिक जोखिमों के प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया. ऊर्जा संक्रमण के लिए क्रिटिकल मिनरल्स पर संयुक्त राष्ट्र टास्क फोर्स की घोषणा एक महत्वपूर्ण कदम रही. हालांकि, एक झटका भी लगा. कोलंबिया और ओमान द्वारा खनन और खनिज प्रसंस्करण के पर्यावरणीय प्रभावों पर एक वैश्विक सहकारी संधि के लिए वार्ता शुरू करने के प्रस्ताव का रूस और सऊदी अरब जैसे देशों ने विरोध किया.

ये घटनाक्रम दर्शाते हैं कि हालांकि खनिजों को जलवायु और विकास परिणामों के लिए अहम माना जा रहा है, लेकिन उनके शासन पर सहमति अब भी दूर है.

एक निर्माण खंड, कोई छूटी हुई बस नहीं

COP 30 के औपचारिक परिणामों में खनिजों का उल्लेख न होना किसी छूटे हुए अवसर के रूप में नहीं, बल्कि जलवायु कार्रवाई में भौतिक शासन को शामिल करने की एक लंबी प्रक्रिया के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए. विभिन्न वार्ताओं और बहुपक्षीय मंचों पर उनकी बढ़ती प्रमुखता एक संरचनात्मक बदलाव का संकेत देती है.

अगले वर्ष तुर्किये में ऑस्ट्रेलिया की अध्यक्षता में होने वाले COP 31 की तैयारियों के बीच, सरकारों को भू-राजनीति और संप्रभुता के ध्रुवीकृत द्वंद्व से आगे बढ़कर खनिजों और व्यापक आर्थिक विकास मार्गों, जैसे बुनियादी ढांचा और आवास के बीच संबंधों की समीक्षा करनी होगी, और सतत विकास के लिए आवश्यक साझा जोखिमों, जिम्मेदारियों और लाभों को पहचानना होगा. भारत के लिए, खनिजों पर बहस अब सैद्धांतिक नहीं रही है. यह नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, आवास और बुनियादी ढांचे के विस्तार की नींव है. विकास आवश्यकताओं और जिम्मेदार खनिज शासन के बीच संतुलन भारत कैसे साधता है, यह न केवल उसके भविष्य के विकास बल्कि उसके जलवायु नेतृत्व को भी आकार देगा, और दुनिया के लिए एक भरोसेमंद, विश्वसनीय और प्रमाणित रोडमैप पेश करेगा कि भौतिक जरूरतों को जिम्मेदार, प्रभावी और कुशल शासन के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है.

निकट भविष्य में सीमित प्रतिबद्धताओं के बावजूद, सरकारों, उद्योग और नागरिक समाज के बीच बढ़ती भागीदारी सहयोगात्मक शासन की उम्मीद जगाती है, ऐसा शासन जो मूल्य संवर्धन को आगे बढ़ाए, समुदायों की रक्षा करे और आपूर्ति श्रृंखलाओं को जलवायु और विकास लक्ष्यों में बाधा बनने से रोके.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को भी दर्शाएँ.)

 

 

लेखिका – निधि श्रीवास्तव, सीनियर रिसर्चरण, इंडियन इंस्टिट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स (IIHS)

लेखक-अमीर बाजाज,  प्रैक्टिस हेड (इंफ्रास्ट्रक्चर और जलवायु), इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स (IIHS) 


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