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लीडरशिप पर बड़ी सीख देते हैं विधानसभा चुनाव और FIFA वर्ल्ड कप के परिणाम

क्रोएशिया और मोरक्को जैसे छोटे देशों की टीमों में कोई खास बड़े खिलाड़ी नहीं थे, लेकिन इसके बावजूद वे सेमीफाइनल में पहुंचीं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • हरदयाल सिंह

गुजरात, हिमाचल विधानसभा और दिल्ली नगर निगम चुनाव और कतर में आयोजित फुटबॉल विश्व कप के बीच भले ही इस बात को छोड़कर कोई सीधा जुड़ाव न हो कि चारों लगभग एक ही समय में हुए, पर सभी संगठनात्मक प्रभावशीलता के बारे में काफी मिलती-जुलती अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं.   

नियामक या रेफरी की भूमिका
सबसे पहले, निष्पक्ष प्रतियोगिता सुनिश्चित करने के लिए नियामक या रेफरी की भूमिका को कभी भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. चुनाव आयोग ने जहां अच्छी तरह से स्थापित प्रोटोकॉल के तहत विश्वसनीयता के साथ चुनाव कराए. मतगणना की तारीख को नतीजे घोषित किए. वहीं, फुटबॉल वर्ल्ड कप में रेफरी ने नियमानुसार मैच पूरे कराए. किसी भी टीम ने रेफरिंग संबंधी मानक के खिलाफ कोई शिकायत नहीं की. भारत के चुनावों की यदि अमेरिका के चुनावों से तुलना करें, तो हम पाएंगे कि वहां हर राज्य के लिए चुनावी प्रक्रिया अलग है. कभी-कभी तो काउंटी के हिसाब से भी इसमें बदलाव होता है और मतगणना भी कई दिनों में होती है. जबकि भारत में चुनाव आयोग की बदौलत सबकुछ बेहद सहज और कुशल तरीके से हो जाता है. 

बड़ी टीमें हमेशा सफल नहीं होतीं
FIFA वर्ल्ड कप ने हमें दिखा दिया है कि सितारों से सजी टीमें हमेशा सफल नहीं होतीं. क्रोएशिया और मोरक्को जैसे छोटे देशों की टीमों में कोई खास बड़े खिलाड़ी नहीं थे, लेकिन इसके बावजूद वे सेमीफाइनल में पहुंचीं. जबकि कई पावरहाउस टीमें - जर्मनी स्पेन, पुर्तगाल आदि उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकीं. क्रोएशिया और मोरक्को दोनों ने अच्छा प्रदर्शन किया, क्योंकि उन्होंने अपनी रणनीतियों को अच्छी तरह से क्रियान्वित किया. खिलाड़ियों ने अपनी आवंटित भूमिकाओं पर ध्यान केंद्रित किया और एक टीम के रूप में निःस्वार्थ रूप से खेला.

भारत में लोकतंत्र जीवित है
भाजपा ने गुजरात में ऐसा ही किया, लेकिन हिमाचल प्रदेश में अपनी सफलता को दोहराने में नाकाम रही, जहां वह अनुशासनहीनता के कारण कांग्रेस से हार गई. वहीं, केजरीवाल ने दिल्ली नगर निगम में भाजपा को बाहर कर दिया. तो अंत में स्कोर वन-वन-वन रहा और वोटिंग वाले दिन जिस पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया, उसकी जीत हुई. इससे साबित होता है कि भारत में लोकतंत्र जीवित है और सक्रिय है. लिहाजा यह आरोप लगाना कि सबकुछ एक पार्टी के हाथों में जा रहा है, उचित नहीं होगा. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जब सुधार की गुंजाइश है, तो ऐसा कई अन्य लोकतंत्रों में भी हो सकता है, जिनकी कमियों पर शायद ही कभी चर्चा की जाती है.

कांग्रेस की हार की वजह 
कांग्रेस को गुजरात में अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा, क्योंकि राज्य के औसत मतदाता के साथ उसका संपर्क टूट गया है. वह 60 सीट और 14.1% वोट शेयर खो चुकी है. हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. लंबे समय से पार्टी का जनाधार दरक रहा है. नेतृत्व को सिर्फ एक परिवार तक सीमित करने के चलते कांग्रेस हर बार केवल अपनी किस्मत आजमाती आई है. सच कहें तो एक उत्कृष्ट और शानदार नेता पैदा करने वाले जीन के कॉन्फ़िगरेशन को दोहराना मुश्किल होता है और यह हमेशा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक नहीं जाता.

हवेली की जिंदगी चालीस साल
मारवाड़ी समुदाय में एक दिलचस्प कहावत है - हवेली की जिंदगी चालीस साल. इसका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार एक फैमिली मेन्शन की इकॉनोमिक लाइफ चालीस साल तक सीमित होती है; वैसे ही एक सफल व्यवसाय के लिए किसी परिवार द्वारा किए जा सकने वाले योगदान की अवधि भी सीमित होती है. इसलिए सफल संगठन के संस्थापक को बागडोर अपनी संतान को नहीं बल्कि नेतृत्व कौशल रखने वाले किसी युवा पेशेवर को सौंपनी चाहिए. गुजरात में, कांग्रेस पार्टी हार गई क्योंकि वह संवाद करने में विफल रही; और जब उसने यह किया, उसके संदेश में मतदाताओं के साथ जुड़ाव की कमी थी. इसकी तुलना में भाजपा ने अपनी रणनीति को शानदार ढंग से लागू किया. वह अपने कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आम जनता से भी जुड़ाव बना पाई. 

प्रभावी नेतृत्व का सार
और यह वास्तव में किसी भी क्षेत्र में प्रभावी नेतृत्व का सार है: लीडर रणनीति तैयार करता है और उसके कार्यान्वयन की निगरानी करता है, और सभी हितधारकों के साथ प्रभावी संचार सुनिश्चित करता है. यदि वह राजनेता है, तो वे जमीनी स्तर के पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं दोनों को उत्साहित करता है. आमतौर पर, ये कौशल वंशानुगत नहीं होते. चालीस साल पहले एक बड़ी बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनी के सीईओ ने अपनी ऑडियंस (जिसमें आयकर विभाग के मध्यम स्तर के अधिकारी शामिल थे) से कहा था याद रखें - नेतृत्व एक कार्य है न कि आनंद लेने का अधिकार.

(लेखक पूर्व मुख्य आयकर आयुक्त और Moral Compass- Finding Balance and Purpose in an Imperfect World, Harper Collins India, 2022 के लेखक हैं. इस लेख में व्यक्त विचार, उनके निजी विचार हैं)


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