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क्या व्यापार में भरोसा है? ट्रंप के भारत पर शुल्क व्यापार को नहीं, भरोसे को चोट पहुंचाएंगे

आने वाले वर्षों में, भारत यह याद रखेगा कि वैश्विक व्यापार में संप्रभुता तनावों से बचने के बारे में नहीं है, सिद्धार्थ अरोड़ा लिखते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

जुलाई 2025 के अंत में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक कदमों की घोषणा की: भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर 25% "पारस्परिक" शुल्क, जो रूस के साथ भारत के जारी तेल और रक्षा व्यापार से जुड़ी एक अतिरिक्त सजा के साथ था; और ठीक 24 घंटे बाद, पाकिस्तान के साथ एक व्यापक ऊर्जा और व्यापार साझेदारी, जिसमें इस्लामाबाद के भविष्य में भारत को तेल पुनः निर्यात करने की संभावना भी शामिल थी.

सतही तौर पर देखें तो ये कदम भारत की अर्थव्यवस्था को लक्षित करते प्रतीत हो सकते हैं. लेकिन गहराई से देखने पर पता चलता है कि इनका प्रत्यक्ष व्यापार प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित होगा. असली कीमत रणनीतिक और मानसिक स्तर पर चुकानी पड़ेगी. अब दो परिणाम अपरिहार्य हैं: अमेरिका-भारत संबंधों में भरोसे की गहराई से कमी, और भारत का अपने व्यापारिक साझेदारों को अन्यत्र विस्तारित करने की ओर झुकाव.

निर्यात-निर्भर अर्थव्यवस्था नहीं है भारत
भारत न तो चीन है, न ही वियतनाम. यह सबसे पहले और प्रमुख रूप से घरेलू उपभोग पर आधारित अर्थव्यवस्था है, जिसकी 55% से अधिक जीडीपी आंतरिक मांग से संचालित होती है. अमेरिका को भारत का निर्यात विशेष रूप से सीमित है मुख्यतः उच्च गुणवत्ता वाले इंजीनियरिंग उत्पाद, प्रीमियम कृषि उत्पाद, दवाइयाँ और आभूषण शामिल हैं. अमेरिका को $78 बिलियन का वार्षिक वस्तु निर्यात महत्वहीन नहीं है, लेकिन यह भारत की अर्थव्यवस्था की नींव भी नहीं है.

कपड़ा, सामान्य दवाइयों और ऑटो कलपुर्जों जैसे क्षेत्रों को इन शुल्कों से चोट पहुंचेगी. लेकिन भारत की समष्टि आर्थिक स्थिति काफी हद तक सुरक्षित बनी रहेगी. यह कोई विनिर्माण-निर्यात पर आधारित दैत्य नहीं है जिसे घुटनों पर लाया जा रहा है. यह एक सेवा-प्रधान, मांग-समृद्ध अर्थव्यवस्था है जो वास्तविक समय में खुद को फिर से संरेखित कर रही है. वास्तविक क्षति कहीं और है,  वहां, जहां कूटनीति, धारणा से मिलती है.

एक रणनीतिक संबंध में झटका
पिछले दो दशकों में अमेरिका-भारत संबंध लेन-देन से रणनीतिक सहयोग की ओर बढ़े थे. रक्षा सहयोग, क्वाड, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा संबंधों में गहराई, और “मिशन 500” जैसे महत्वाकांक्षी व्यापार संवादों ने एक दीर्घकालिक गठबंधन की आशा को जन्म दिया था.

ट्रंप की शुल्क और सजा की घोषणा ने उस प्रक्षेपवक्र को बाधित कर दिया है. और भी बुरा यह है कि पाकिस्तान को खुले तौर पर अपनाना, जिसे नई दिल्ली लंबे समय से एक अविश्वसनीय साझेदार मानती आई है,  पुराने घावों को फिर से खोल देता है.

भारत के वाणिज्य मंत्री ने संसद में दिए गए एक बयान में इन उपायों को “एकतरफा और अनुचित” बताया, और “संतुलित लेकिन सख्त प्रतिक्रिया” का वादा किया. लेकिन आधिकारिक भाषा के पीछे एक तीखी सच्चाई छिपी है: भारत अब अमेरिका को एक दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक साझेदार के रूप में विश्वसनीय मानने पर पुनर्विचार कर रहा है.

शांत बदलाव पहले ही शुरू हो चुका है
जवाबी कार्रवाई करने के बजाय, भारत संभवतः उसी भाषा में प्रतिक्रिया देगा जो वह अच्छी तरह जानता है: आश्वस्त लेकिन संतुलित रणनीति. यदि अमेरिका शुल्क और शर्तों का रास्ता चुनता है, तो भारत अपने व्यापारिक क्षितिज को विस्तारित करेगा.

यूरोपीय संघ के साथ लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर बातचीत ने अचानक नई गति पकड़ ली है, जहां बताया गया है कि वार्ताकार सेवाओं, डिजिटल व्यापार और स्थिरता से जुड़े उत्पादों पर तेजी से चर्चा कर रहे हैं. भारत कपड़ा, ऑटोमोबाइल कलपुर्जे और नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में यूरोपीय बाजारों तक वरीयताप्राप्त पहुंच की भी मांग कर रहा है.

आसियान के साथ भारत का वार्षिक व्यापार पहले से ही $110 बिलियन से अधिक है, और इसे सीईसीए तंत्रों के माध्यम से सक्रिय रूप से गहरा किया जा रहा है, साथ ही एक समर्पित भारत-आसियान ग्रीन कॉरिडोर स्थापित करने की योजना है जो प्रौद्योगिकी और जलवायु-सम्बंधित निर्माण को बढ़ावा देगा. ग्लोबल साउथ, विशेष रूप से अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में भारत की सक्रियता भी भारत-मर्कोसुर और भारत-ईएसी व्यापार संवादों के अंतर्गत तेज़ी से बढ़ रही है.

चीन के साथ क्षेत्र-विशेष समन्वय की भी चर्चाएं हैं, विशेषकर दुर्लभ खनिजों और सौर मॉड्यूल जैसे औद्योगिक इनपुट के क्षेत्र में, हालांकि व्यापक स्तर पर तनाव मौजूद है. नई दिल्ली रणनीतिक उलझनों को लेकर सतर्क रहेगी, लेकिन चयनात्मक सहयोग को नकारा नहीं जा सकता.

यह गठबंधन नहीं है. यह विविधीकरण है. किसी एक साझेदार या ध्रुव पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने का एक सजग प्रयास.

कई मायनों में, वर्तमान समय भारत के दीर्घकालिक हितों की सेवा भी कर सकता है. बहुध्रुवीय व्यापार की ओर तेज़ी से बढ़ना भारत की व्यापक विदेश नीति दृष्टि के अधिक अनुकूल है.

जब धूल बैठ जाएगी, केवल व्यावहारिक लोग ही सफल होंगे

हर भू-राजनीतिक झटके से परिचित खेमे सामने आते हैं. आशावादी इसे केवल दिखावा मानते हैं. निराशावादी इसमें संकट देखते हैं. लेकिन यथार्थवादी, खासकर व्यापार और विदेश नीति में, बहस नहीं करते. वे विविधता अपनाते हैं. वे फिर से बातचीत करते हैं.

भारत की प्रतिक्रिया उसी व्यावहारिकता से निर्देशित होनी चाहिए. "मेक इन इंडिया" को आगे बढ़ाएं. डिजिटल और हरित निर्यात को गहराएं. यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ एफटीए को आगे बढ़ाएं. बहुपक्षीय संबंधों को तेज करें. लेकिन वाशिंगटन के दरवाज़े को बंद न करें. सरकारें बदलती हैं. रुख भी बदलते हैं. अमेरिका एक मूल्यवान साझेदार बना रहेगा, लेकिन अब वह कभी अकेला नहीं होना चाहिए.

भविष्य चतुर और लचीले को इनाम देता है
भारत ट्रंप के शुल्कों को झेल जाएगा. लेकिन वह इस संदेश को नहीं भूलेगा. आर्थिक दंडों को एक ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी पड़ोसी तक पहुंच के साथ जोड़ने से विश्वास का संतुलन बिगड़ गया है.

आने वाले वर्षों में, भारत को याद रहेगा कि वैश्विक व्यापार में संप्रभुता तनाव से बचने के बारे में नहीं है. यह निर्भरता को कम करने, विकल्पों का निर्माण करने और यह सुनिश्चित करने के बारे में है कि कोई भी साझेदार, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, एकतरफा रूप से साझेदारी की शर्तें न बदल सके. अनिश्चित समय को अक्सर आशावादियों और निराशावादियों के बीच की लड़ाई के रूप में देखा जाता है. लेकिन व्यापार और कूटनीति में, यह व्यावहारिक लोगों की परीक्षा की ज़मीन होती है.

सिद्धार्थ अरोड़ा, अतिथि लेखक
(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति में गहरी रुचि है.)


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