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भारत की काबुल वापसी: रणनीतिक यथार्थवाद की नई शुरुआत

भारत की काबुल वापसी दर्शाती है कि नई दिल्ली अब प्रतीक्षा नहीं, बल्कि व्यावहारिक यथार्थ के साथ क्षेत्रीय प्रभाव और रणनीतिक संतुलन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 months ago

जब नई दिल्ली ने इस महीने चुपचाप अपने तकनीकी मिशन को काबुल में एक पूर्ण दूतावास में अपग्रेड किया, तो उसने सिर्फ एक इमारत को फिर से नहीं खोला, उसने भारत की क्षेत्रीय रणनीति का वह अध्याय फिर से खोला, जो लंबे समय से सतर्कता, नुकसान और दूरी से चिह्नित रहा है. तीन वर्षों तक अफगानिस्तान को किनारे से देखते रहने के बाद, भारत अब फिर से मैदान में उतर रहा है, साझेदारी के भ्रम के साथ नहीं, बल्कि इस यथार्थ के साथ कि प्रभाव की शुरुआत उपस्थिति से होती है.

यह बदलाव तालिबान शासन की मान्यता के बारे में नहीं है, यह वास्तविकता की मान्यता के बारे में है. अफगानिस्तान के कठोर राजनीतिक परिदृश्य में अनुपस्थिति का मतलब अप्रासंगिकता है और भारत ने अप्रासंगिक न रहने का फैसला किया है.

एक सोच समझकर उठाया गया कदम, कोई भावनात्मक वापसी नहीं

काबुल में नई दिल्ली की पुनः प्रविष्टि एक परिपक्व नीति पुनर्संतुलन का संकेत देती है, जो व्यावहारिकता और शांत उद्देश्य का मिश्रण है. जब 2021 में तालिबान ने सत्ता संभाली, तब भारत की 3 अरब डॉलर की विकास उपस्थिति यानी राजमार्ग, बांध, संसद भवन और सद्भावना लगभग मिट चुकी लग रही थी. तब उसके राजनयिकों की निकासी केवल सुरक्षा वापसी नहीं थी, बल्कि पाकिस्तान और चीन को राजनीतिक स्थान का प्रतीकात्मक नुकसान भी थी.

अब, अपने दूतावास को फिर से खोलकर, भारत एक सरल सत्य को स्वीकार कर रहा है: काबुल में “सही सरकार” की प्रतीक्षा करना शायद हमेशा इंतजार करते रहना होगा. इसके बजाय, भारत उस शक्ति से जुड़ रहा है जो मौजूद है, उसे समर्थन नहीं दे रहा, बल्कि उसे संभाल रहा है. यह बदलाव भारत की व्यापक कूटनीतिक दिशा को दर्शाता है, जैसा कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर के तहत देखा गया है, सभी से बात करना, कुछ पर भरोसा करना, और निष्ठा की बजाय प्रभाव पर दांव लगाना.

पड़ोस में रणनीतिक गहराई की पुनर्स्थापना

अफगानिस्तान भारत के लिए सिर्फ एक और पड़ोसी नहीं रहा है, यह एक रणनीतिक बफर, मध्य एशिया से जुड़ाव और क्षेत्रीय प्रभाव की परीक्षा रहा है. 2000 के दशक में, अफगानिस्तान में भारत की उपस्थिति ने पाकिस्तान के वर्चस्व को संतुलित किया और काबुल को एक वैकल्पिक विकास भागीदार प्रदान किया. 2021 में इसकी वापसी ने एक शून्य छोड़ दिया, जिसे चीन, पाकिस्तान और यहां तक कि रूस ने भरने की कोशिश की.

दूतावास का पुनः उद्घाटन इस बात को दोहराता है कि भारत अफगानिस्तान के राजनीतिक और आर्थिक समीकरण का हिस्सा बना रहना चाहता है. यह ईरान के चाबहार बंदरगाह के माध्यम से व्यापार और संपर्क गलियारों की संभावना को भी पुनर्जीवित करता है, जो पाकिस्तान के ग्वादर के माध्यम से चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजनाओं का प्रतिपक्ष है. कूटनीतिक रूप से फिर से जमीन पर कदम रखकर भारत ने उस स्थिति जागरूकता को फिर हासिल किया है, जो इस क्षेत्र में अत्यावश्यक है.

पाकिस्तान का कारक: ड्यूरंड रेखा पर नजर

इस्लामाबाद के लिए, काबुल में भारत की पुनः प्रविष्टि असहज है. तालिबान की वापसी के बाद, पाकिस्तान को उम्मीद थी कि वह काबुल पर एकाधिकार कर लेगा, यह मानते हुए कि समूह के साथ उसके लंबे संबंध उसे रणनीतिक गहराई प्रदान करेंगे. लेकिन वह अनुमान अब टूट चुका है. तालिबान की सीमा झड़पें, व्यापार विवाद, और ड्यूरंड रेखा को मान्यता देने से इनकार ने तथाकथित “रणनीतिक भाईचारे” में दरारें डाल दी हैं.

भारत की उपस्थिति अब उस तस्वीर को जटिल बनाती है. यह काबुल में एक वैकल्पिक राजनयिक चैनल बहाल करती है, जिससे नई दिल्ली को आतंकी नेटवर्कों को ट्रैक करने, सीमा पार गतिविधियों की निगरानी करने, और उन अफगान गुटों से जुड़ने का अवसर मिलता है जो पूरी तरह पाकिस्तान के पक्ष में नहीं हैं.

चीन समीकरण: अफगान गलियारे में प्रतिस्पर्धा

इतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि यह कदम बीजिंग को क्या संकेत देता है. पिछले तीन वर्षों में, चीन ने खनन समझौतों, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और सीमित सुरक्षा सहयोग के माध्यम से अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति का विस्तार किया है. उसका उद्देश्य स्पष्ट है, बेल्ट एंड रोड के पश्चिमी गलियारों को काबुल के माध्यम से मध्य एशिया से जोड़ना और अपने शिनजियांग क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करना है.

भारत का दूतावास फिर से खोलना एक सीधा प्रतिकूल संकेत है. यह बीजिंग को बताता है कि अफगानिस्तान एकतरफा खेल का मैदान नहीं होगा. कूटनीतिक उपस्थिति बनाए रखकर भारत खुद को चीनी गतिविधियों की निगरानी, क्षेत्रीय आख्यानों को आकार देने, और ईरान से लेकर रूस तक उन अन्य हितधारकों के साथ संरेखित करने की स्थिति में रखता है, जो चीन के बढ़ते प्रभाव से सतर्क हैं.

यह त्रिकोणीय संतुलन भारत के हालिया प्रयासों के अनुरूप भी है, जो व्यापक यूरेशियाई क्षेत्र मंगोलिया और कज़ाखस्तान से लेकर कॉकेशस तक में अपनी रणनीतिक उपस्थिति को कई धुरियों में विस्तार दे रहा है.

रस्सी पर चलना

फिर भी, व्यावहारिकता जोखिम के साथ आती है. महिलाओं, प्रेस और अल्पसंख्यकों पर तालिबान के निरंतर प्रतिबंध इस जुड़ाव को नैतिक और राजनीतिक रूप से जटिल बनाते हैं. भारत को एक बारीक रेखा पर चलना होगा, रणनीतिक कारणों से संपर्क बनाए रखते हुए किसी प्रकार के समर्थन का आभास दिए बिना.

संचालन संबंधी चुनौतियाँ भी हैं: भारतीय कर्मियों की सुरक्षा, अफगानिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था, और किसी प्रतिनिधि प्रतिद्वंद्विता में खींचे जाने का खतरा. लेकिन ये गणना किए हुए जोखिम हैं, और भारत के लिए अब दूरी बनाए रखना सीमित जुड़ाव से अधिक महंगा साबित हो सकता है.

उपस्थिति ही नीति है

भारत की काबुल वापसी कोई अतीत का मोह नहीं, बल्कि आवश्यकता है. उस क्षेत्र में, जहाँ प्रभाव संवाद से आता है, भारत ने महसूस किया है कि एक बार छोड़ा गया रणनीतिक स्थान आसानी से वापस नहीं मिलता. दूतावास को फिर से खोलना इस बात की स्वीकृति है कि अफगानिस्तान अभी भी मायने रखता है.

पाकिस्तान के लिए, यह एकाधिकार का अंत है. चीन के लिए, यह उसके पश्चिमी क्षेत्र में एक प्रतिद्वंद्वी पर्यवेक्षक का प्रवेश है. भारत के लिए, यह दृढ़ता का वक्तव्य है, कि वह दक्षिण और मध्य एशिया के राजनीतिक भविष्य को आकार देने में दर्शक नहीं, बल्कि भागीदार रहेगा.

अपनी कूटनीतिक भागीदारी को अपग्रेड करके, भारत यह संकेत दे रहा है कि यथार्थवाद ही नया व्यावहारिकता है.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

सिद्धार्थ अरोड़ा, अतिथि लेखक

(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व विदेश नीति में गहरी रुचि रखते हैं.)

 


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