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भारत की अर्थव्‍यवस्‍था 5वें नहीं बल्कि 7वें स्‍थान पर है, जानें कैसे?

हमारे देश में माइक्रो यूनिट 6 करोड़ से ज्‍यादा है. बडे यूनिट 6 हजार हैं. उन 6 करोड़ यूनिट की तो गणना ही नहीं हो पाती है. आधिकारिक आंकड़ों में इन्‍हें बढा हुआ दिखाया जा रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

नई दिल्ली: भारत की अर्थव्‍यवस्‍था को लेकर आईएमएफ (IMF) ने जो दावा किया है, उसे लेकर भारत के मशहूर अर्थशास्‍त्री प्रोफेसर अरुण कुमार की कुछ अलग राय है. उन्होंने कहा, "भारत की अर्थव्‍यवस्‍था को भले ही आईएमएफ ने पांचवां स्‍थान दे दिया हो, लेकिन भारत में GDP के आंकड़ों के सही कैलकुलेशन सही न होने के कारण मुझे नहीं लगता कि ये पांचवे स्‍थान की अर्थव्‍यवस्‍था है. भारत में केवल संगठित क्षेत्र के आंकड़ों की ही गणना होती है. असंगठित क्षेत्र को भी उसी के आधार पर मान लिया जाता है." अरुण कुमार ने कहा कि उनका मानना है कि मौजूदा अर्थव्‍यवस्‍था या तो स्थिर बनी हुई है या सातवें स्‍थान पर पहुंच गई है.

किसी अर्थव्‍यवस्‍था के बड़े होने का मतलब क्‍या होता है?
इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "देखिए ऐसा है कि जो भी उत्‍पादन होता है, उसे जीडीपी के जरिए नापा जाता है. जीडीपी का मतलब है कि हमने सर्विस सेक्‍टर में और दूसरे सेक्‍टरों में कितना उत्‍पादन किया, भले ही वो सीए हो या डॉक्‍टर हो या अन्‍य सेक्‍टर हो, उनमें कितना उत्‍पादन हुआ. जितना उत्‍पादन ज्‍यादा होता है, उतनी खुशहाली बढ़ती है. लेकिन सवाल ये है कि आखिर इसका डिस्‍ट्रीब्‍यूशन कैसा हो रहा है? ये लोगों में कैसे बंटा हुआ है? अमीरों को कितना मिल रहा है और गरीबों को कितना मिल रहा है? अभी हमने देखा कि जब महामारी आई तो उसमें लगभग सभी अर्थव्‍यवस्‍थाएं ध्‍वस्‍त हो गईं. हमारे यहां भी बहुत गिरावट आई. हम ऐसा पहले ही सोच रहे थे लेकिन तब तो ऐसा नहीं हो पाया, लेकिन अब हुआ है. यही अर्थव्‍यवस्‍था के बड़े होने का मतलब है."

'अर्थव्‍यवस्‍था की सही नहीं होती गणना'
प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है, "हमारी अर्थव्‍यवस्‍था की गणना सही नहीं होती है. हम केवल संगठित क्षेत्र की ही गणना करते हैं. हम ये मान लेते हैं कि जैसा संगठित क्षेत्र चल रहा है, वैसा ही असंगठित क्षेत्र भी चल रहा है. हमारे देश में डिमांड असंगठित क्षेत्र से संगठित क्षेत्र की ओर जा रहा है. इसका उदाहरण आप ट्रेड सेक्‍टर से ले सकते हैं. पहले लोग अपना सामान दुकानों से लेते थे, लेकिन अब वो अपना सामान ई-कॉमर्स से ले रहे हैं, जो संगठित क्षेत्र का हिस्‍सा है. इसकी वजह से सभी छोटे दुकानदारों के कारोबार में भी गिरावट आई है. हमारे देश में माइक्रो यूनिट 6 करोड़ से ज्‍यादा है. बडे यूनिट 6 हजार हैं. उन 6 करोड़ यूनिट की तो गणना ही नहीं हो पाती है. आधिकारिक आंकड़ों में इन्‍हें बढा हुआ दिखाया जा रहा है. आईएमएफ भी कोई अलग से आंकड़ा तो लेता नहीं है, वो भी उन्‍हीं पर काम करता है जो सरकार से मिलते हैं. इसलिए आईएमएफ का विश्‍लेषण भी गलत है. हमारी अर्थव्‍यवस्‍था बढ नहीं रही है, बल्कि या तो गिर रही है या रूकी हुई है. हम इस वक्‍त पांचवे पर नहीं बल्कि सातवें पायदान पर पहुंच गए हैं."

अर्थव्‍यवस्‍था के बढने का अंतर्राष्ट्रीय महत्‍व क्‍या है?
इस सवाल पर उन्होंने कहा, "जब अर्थव्‍यवस्‍था बढ़ती है, जितना आपका वेलफेयर बढता है तो उसका असर दुनिया पर भी पड़ता है. लोग आपसे खरीदते हैं. आपका इंटरनेशनल मार्केट में सकारात्‍मक असर पड़ता है. देश में निवेश का सकारात्‍मक माहौल तैयार होता है, जिसका देश को सीधा फायदा मिलता है."

आम आदमी के जीवन पर क्‍या असर पड़ता है?
प्रोफेसर अरुण कुमार ने इस सवाल का जवाब देते हुए कहा, "जैसे-जैसे उत्‍पादन बढ़ता है, लोगों की आमदनी भी बढ़ जाती है. आप जैसे ही पांचवे से चौथे स्थान पर जाएंगे तो आपकी अर्थव्‍यवस्‍था 4 ट्रिलियन से ज्‍यादा हो जाएगी. हर आदमी के लिए उपलब्‍धता के अवसर बढ़ जाएंगे. रोजगार, आमदनी सभी चीजें बढ़ जाएंगी. आम आदमी का जीवन स्‍तर सुधर जाएगा."

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