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वैश्विक तूफान के बीच भारत की आर्थिक दृढ़ता

2025 में भारत का आर्थिक लचीलापन इसके संरचनात्मक सुधारों और नीतिगत उत्तरदायिता का एक प्रमाण है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

अगर किसी ने 1 अप्रैल 2025 को यह कहा होता कि अगले कुछ महीनों में अमेरिका ईरान की परमाणु सुविधाओं पर बमबारी करेगा, जबकि इजराइल ईरानी शहरों पर मनमाने ढंग से हमले करेगा, ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने को मंजूरी देगा, भारत और पाकिस्तान ड्रोन व मिसाइल हमलों की होड़ में उतर जाएंगे और अमेरिका विभिन्न देशों पर 10% से 145% तक के टैरिफ लगाएगा, जबकि चीन जवाब में कुछ अमेरिकी वस्तुओं पर 125% ड्यूटी लगाएगा और भारतीय व अमेरिकी बॉन्ड यील्ड्स के बीच का अंतर घटकर 21 वर्षों के निचले स्तर 170 बेसिस पॉइंट्स पर आ जाएगा, तो उस समय भारत की जीडीपी ग्रोथ, डॉलर/रुपया, बॉन्ड यील्ड्स और शेयर बाजार को लेकर क्या अनुमान लगाए जाते?

आश्चर्यजनक रूप से, उपरोक्त में से एक या दो नहीं बल्कि सभी घटनाएं बहुत ही कम समय में वास्तविकता बन चुकी हैं, फिर भी अधिकांश मैक्रोइकॉनॉमिक संकेतक और बाजार अपने स्थान पर टिके हुए हैं. यह पिछले कुछ दशकों की तुलना में एक बड़ा बदलाव है, जब किसी भी वैश्विक घटना से पूंजी का पलायन शुरू हो जाता था, रुपया संकट में आ जाता था, बॉन्ड यील्ड्स उछल जाती थीं और शेयर बाजार ध्वस्त हो जाते थे.

यह दो दशक पहले के भारत से एक उल्लेखनीय विचलन है, जहां वैश्विक झटकों से गंभीर आर्थिक असर पड़ता था. उदाहरण के लिए, 2013 के टेपर टैंट्रम के दौरान भारतीय रुपया 20% तक गिर गया था और बॉन्ड यील्ड्स में उछाल आया था, जिससे देश की कमजोरियों का पर्दाफाश हुआ था. आज भारत की अर्थव्यवस्था स्थिरता का प्रतीक बन चुकी है, जो एक अशांत वैश्विक परिदृश्य में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही है. इस परिवर्तन के पीछे कारण क्या हैं, और भारत ने इस तरह के तूफान का सामना कैसे किया? चलिए वैश्विक कच्चे तेल की कीमत पर नजर डालते हैं, जो आम तौर पर भारत की एक कमजोर कड़ी रही है और भू-राजनीतिक संघर्षों के दौरान एक प्रमुख जोखिम बन जाती है. हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रम का मैक्रोइकोनॉमिक्स या रुपये पर सीमित प्रभाव पड़ा है. आंशिक रूप से इसका कारण ईरान की वैश्विक तेल आपूर्ति में अपेक्षाकृत कम 4% हिस्सेदारी, वैश्विक मांग में सुस्ती और अतिरिक्त तेल उत्पादन है. इसके अलावा, भारत ने वर्षों में अपने तेल उपयोग की तीव्रता को कम किया है और अपने तेल स्रोतों में विविधता लाने में भी सफलता पाई है. उदाहरण के लिए, भारत ने रियायती रूसी तेल पर अपनी निर्भरता बढ़ाई (2024 में कुल आयात का 44%), जिससे आपूर्ति जोखिमों की भरपाई हुई, जो 2010 के दशक की अस्थिर पश्चिम एशियाई तेल पर निर्भरता से बिल्कुल अलग है. वास्तव में, 2013 के टेपर टैंट्रम के दौरान, तेल की कीमतों में उछाल आपूर्ति में झटके के कारण नहीं, बल्कि अमेरिकी मौद्रिक सख्ती की आशंका के कारण हुआ था, जिससे रुपये पर भारी दबाव पड़ा था.

वैश्विक बॉन्ड बाजार विकसित अर्थव्यवस्थाओं और भारत के बीच एक तीव्र अंतर को दर्शाता है. अमेरिका में, लगातार बनी महंगाई, बढ़ता हुआ राजकोषीय घाटा और 122% का ऋण-से-जीडीपी अनुपात ने बाजारों को हिला दिया है. मूडीज ने मई 2025 में अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग को घटाया, और नया “बड़ा और भव्य कर विधेयक” अगले दशक में घाटे में $3.8 ट्रिलियन जोड़ने की संभावना है. यूरोप में, नेता बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच रक्षा खर्च को पूरा करने के लिए राजकोषीय संयम छोड़ रहे हैं, जिससे बॉन्ड बाजारों पर और दबाव पड़ रहा है. विकसित दुनिया “महंगाई के रिसाव,” गहरे राजकोषीय असंतुलन और नीतिगत झटकों से जूझ रही है, जहां अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों में ब्याज भुगतान अब रक्षा और शिक्षा पर संयुक्त खर्च के बराबर हो चला है. जैसे-जैसे बाजार जोखिम का पुनर्मूल्यांकन करते हैं और अधिक टर्म प्रीमियम की मांग करते हैं, इन अर्थव्यवस्थाओं में बॉन्ड यील्ड गुरुत्वाकर्षण को नकार रही हैं.

भारत के बॉन्ड बाजार, हालांकि, गुरुत्वाकर्षण को स्वीकार कर रहे हैं. एक समय पर ये प्रारंभिक अवस्था में थे और वैश्विक झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील थे, लेकिन अब ये काफी परिपक्व हो चुके हैं. वैश्विक बेंचमार्क बॉन्ड सूचकांकों में शामिल होने से बाजार सहभागिता बढ़ी है और बाहरी दबावों के प्रति संवेदनशीलता में कमी आई है. 2013 के टेपर टैंट्रम के विपरीत, जिसने भारत की कमजोरी को उजागर किया था, आज के बॉन्ड बाजार लचीलापन दर्शाते हैं, जो मजबूत मैक्रोइकोनॉमिक मूलभूत तथ्यों से समर्थित हैं.

भारत का रूपांतरण अनुशासित राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों में निहित है. महामारी के बाद के उच्चतम स्तर 9.2% से घटाकर 4.4% के लक्षित जीडीपी अनुपात तक लाया गया केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा राजकोषीय संयम के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो 2000 के दशक के 7-9% घाटे से बिल्कुल अलग है. मुद्रास्फीति, जो कभी एक स्थायी चुनौती थी और 2000 के शुरुआती वर्षों में औसतन 8-10% और 2010 के दशक में 6-9% रही थी, अब वित्त वर्ष 2025 में 4% से नीचे रहने का अनुमान है. भारतीय रिजर्व बैंक की समय पर की गई दरों में कटौती और तरलता की आपूर्ति, अन्य मैक्रो प्रूडेंशियल नीति समायोजन के साथ, स्थिर विकास को समर्थन दे रही हैं, और वैश्विक प्रतिकूलताओं के बावजूद जीडीपी वृद्धि 6.5% रहने का अनुमान है. विदेशी मुद्रा भंडार, जो अब $698 बिलियन पर है, मुद्रा की अस्थिरता के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करता है, जो 2000 के शुरुआती वर्षों या 2013 की संकटपूर्ण स्थिति से बिल्कुल अलग है.

इस मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता ने बाजारों को भू-राजनीतिक जोखिमों से आगे देखने और भारत की स्थिर विकास संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति दी है. जबकि वैश्विक अनिश्चितताएं व्यापार युद्ध, सैन्य संघर्ष और राजकोषीय असंतुलन बनी हुई हैं, भारत की राजकोषीय अनुशासन, हॉकिश रुख और मुद्रास्फीति प्रबंधन के प्रति प्रतिबद्धता ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया है. रुपया, बॉन्ड यील्ड्स और शेयर बाजार स्थिर बने हुए हैं, उन विनाशकारी परिणामों को नकारते हुए जो एक दशक पहले की जा सकती थीं.

वर्ष 2025 में भारत की आर्थिक लचीलापन इसकी संरचनात्मक सुधारों और नीतिगत उत्तरदायित्व का प्रमाण है. इसके बॉन्ड बाजारों का गहराना, रणनीतिक ऊर्जा विविधीकरण और विवेकपूर्ण मैक्रोइकोनॉमिक प्रबंधन ने वैश्विक अस्थिरता के खिलाफ एक मजबूत दीवार खड़ी की है. जबकि चुनौतियाँ बनी हुई हैं. भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार व्यवधान और अन्य अज्ञात अनिश्चितताएं, भारत की स्थिरता और विकास पर केंद्रित दृष्टिकोण ने इसे एक उन्मत्त विश्व में स्थिरता के प्रकाशस्तंभ के रूप में स्थापित कर दिया है. जैसे-जैसे बाजार इन बुनियादी सिद्धांतों को प्राथमिकता दे रहे हैं, भारत वैश्विक अशांति के परिदृश्य में सफलतापूर्वक आगे बढ़ने की स्थिति में है, और यह दूसरों के लिए अनुकरणीय आर्थिक दृढ़ता का मॉडल प्रस्तुत करता है.

अतिथि लेखक– सच्चिदानंद शुक्ल, ग्रुप चीफ इकोनॉमिस्ट, एलएंडटी

डिस्क्लेमर : इस लेख में शामिल विचार लेखक के निजी विचार हैं, यह जरूरी नहीं कि ये प्रकाशन की विचारधारा को दर्शाते हों.) 


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