✕

होम / एक्सपर्ट ओपिनियन / भारत-ताइवान संबंध: रणनीतिक संतुलन की आवश्यकता

भारत-ताइवान संबंध: रणनीतिक संतुलन की आवश्यकता

भारत और ताइवान, दोनों के लिए सबसे व्यावहारिक रास्ता यह है कि वे अस्पष्टता (ambiguity) में भी आपसी सहयोग की जगह बनाए रखें.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

जब हाल ही में नई दिल्ली और बीजिंग ने अपने जमे हुए रिश्तों को पिघलाने की कोशिश की, तो मांगों का आदान-प्रदान केवल एक सामान्य सौदेबाजी से कहीं अधिक को उजागर करता है. भारत ने सीमा विवाद के समाधान पर तत्कालता जताई, जबकि बीजिंग ने नई दिल्ली से “वन चाइना नीति” के प्रति समर्थन को फिर से दोहराने को कहा, एक ऐसा कदम जो प्रभावी रूप से भारत की ताइवान से जुड़ने की गुंजाइश को सीमित कर देगा. सतह पर ये सामान्य वार्ताकारी स्थितियाँ प्रतीत होती हैं, लेकिन समय का महत्व है. दक्षिण एशिया में ताइवान की स्थिति उसकी अपनी सूझबूझ जितनी ही भारत-चीन संबंधों की ठंडी गणनाओं से भी आकार लेती है.

भारत का संतुलनकारी रुख

भारत के लिए ताइवान हमेशा एक संतुलनकारी कूटनीति रहा है, कोई साहसिक रुख नहीं. नई दिल्ली ने 1950 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मान्यता दी थी और तब से ताइवान को औपचारिक मान्यता देने से परहेज किया है. फिर भी, उसने कूटनीतिज्ञों की भाषा में कहें तो “व्यवहारिक संपर्क” बनाए रखा है.

1995 में स्थापित इंडिया-ताइपे एसोसिएशन एक वास्तविक दूतावास की तरह कार्य करता है, जो व्यापार, निवेश और सांस्कृतिक संबंधों को सुगम बनाता है. यह संपर्क अब केवल प्रतीकात्मक नहीं है. द्विपक्षीय व्यापार 2001 में 1 अरब डॉलर से बढ़कर 2023 में 8.5 अरब डॉलर से अधिक हो गया है. ताइवान भारत में शीर्ष 20 विदेशी निवेशकों में से एक है, जिसने आईसीटी और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में 2.3 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है.

भारत ताइवान की सेमीकंडक्टर प्रणाली से जुड़ने को लेकर उत्साहित है, जो वैश्विक फाउंड्री क्षमता का लगभग 60% नियंत्रित करती है. लोगों के बीच संपर्क भी बढ़ रहा है क्योंकि हजारों छात्र दोनों ओर यात्रा कर रहे हैं, खासकर STEM क्षेत्रों में.

बीजिंग का दबाव बिंदु

बीजिंग की यह मांग कि भारत स्पष्ट रूप से वन चाइना नीति का समर्थन दोहराए, इस गलियारे को संकीर्ण करने का प्रयास समझी जा सकती है. 2010 से भारत ने संयुक्त बयानों में इस वाक्यांश को शामिल करने से परहेज किया है, आंशिक रूप से कश्मीर पर बीजिंग की आक्रामकता और पाकिस्तान के साथ उसके गहरे संबंधों के कारण. मान्यता न देकर भारत ने संकेत दिया कि ताइवान पर चीन की संवेदनशीलता का मुकाबला भारत की संप्रभुता पर संवेदनशीलता से होता है. अब इस दृष्टिकोण को सीमा समाधान के बदले फिर से अपनाना एक महत्वपूर्ण बदलाव होगा. इसका अर्थ होगा कि भारत हिमालयी राहत के बदले ताइवान से जुड़ाव को पुनः समायोजित करने को तैयार है.

ताइपे का शांत यथार्थवाद

ताइपे इसे कैसे देखेगा? ऐतिहासिक रूप से, शांत यथार्थवाद के साथ. 1971 में संयुक्त राष्ट्र की सीट खोने के बाद, ताइवान ने देखा है कि एक के बाद एक राजधानी ने चीन के दबाव में आकर औपचारिक संबंधों को घटाया या तोड़ा है. आज केवल 12 देश ताइवान को औपचारिक रूप से मान्यता देते हैं, जबकि 1970 के दशक में यह संख्या 70 से अधिक थी. फिर भी ताइपे ने दुनिया भर में 93 अनौपचारिक कार्यालय बनाए हैं, जिनमें नई दिल्ली भी शामिल है. उसकी रणनीति रही है कि मान्यता के बजाय व्यापार, प्रौद्योगिकी, शिक्षा जैसे अनौपचारिक साझेदारियों को अधिकतम किया जाए.

जरूरत से उपजा व्यवहारवाद

ताइवान जानता है कि भारत के लिए, चीन — जितना भी विवादास्पद हो — उसके सुरक्षा वातावरण के केंद्र में है. नई दिल्ली से ताइवान के लिए अपने कूटनीतिक संसाधनों को दांव पर लगाने की अपेक्षा करना, जबकि वास्तविक नियंत्रण रेखा अनसुलझी है, अव्यावहारिक होगा. ताइपे जो अधिक महत्व देता है वह है निरंतरता: कि भारत वर्तमान स्तर के संपर्क को बनाए रखे, बीजिंग को अनावश्यक रियायतें न दे, और सेमीकंडक्टर, हरित प्रौद्योगिकी और उच्च शिक्षा में सहयोग खुला रखे.

असहजता के बीज

यह कहा जाए तो, भारत द्वारा वन चाइना नीति के नवीकृत समर्थन से ताइपे में असहजता पैदा हो सकती है. इसका कारण यह नहीं कि ताइवान को मान्यता की उम्मीद है, बल्कि इसलिए कि ऐसा बयान भारत के विकल्पों को सीमित करता है. अगर भारत खुद को बहुत सख्ती से बाँध लेता है, तो ताइपे यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि नई दिल्ली के साथ इसकी साझेदारी की सीमा स्थायी रूप से कम है. चीन से परे विविधीकरण और लोकतंत्रों के साथ संबंधों को गहरा करने के लिए उत्सुक ताइवान के लिए, ऐसी धारणा गति को कुंद कर सकती है.

क्या भारत को पर्याप्त लाभ मिलेगा?

भारत के लिए ज्यादा तीखा सवाल यह है कि क्या वन चाइना पर रियायत देने से कोई ठोस पारस्परिकता मिलती है? बीजिंग का रिकॉर्ड सतर्कता का सुझाव देता है. 2020 से अब तक 19 दौर की कोर कमांडर वार्ताओं के बावजूद, सीमा पर तनाव के बिंदु अब भी बने हुए हैं, जहाँ दोनों ओर 60,000 सैनिक तैनात हैं. चीन ने अक्सर प्रतीकात्मक रियायतें ली हैं बिना समकक्ष लाभ दिए. ताइवान से जुड़ाव की लचीलापन को सीमा “प्रगति” के वादों के लिए छोड़ देना भारत को नुकसान में डाल सकता है अगर बीजिंग समय खींचता है.

ताइवान का मिडल-पावर सबक

ताइवान के लिए, यह मिडल-पावर कूटनीति की सीमाओं की याद दिलाता है. उसके नेता जानते हैं कि भारत की ताइवान नीति हमेशा भारत-चीन समीकरण में ही बसी रहेगी. फिर भी यह इस बात को भी रेखांकित करता है कि भारत में कंपनियों, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संबंधों जैसे गहरे हितों का निर्माण कितना जरूरी है, जो राजनीतिक उतार-चढ़ाव को सह सके. ताइवान जितना अधिक भारत की अर्थव्यवस्था और समाज में शामिल होगा, नई दिल्ली की कोई भी सरकार उसे पूरी तरह दरकिनार करना उतना ही कठिन पाएगी.

अस्पष्टता ही एकमात्र स्थिरता

अंततः, सीमाओं और वन चाइना के बीच का यह समझौता किसी पूर्ण सत्य का नहीं, बल्कि डिग्रियों का सवाल है. भारत ताइवान को पूरी तरह त्यागने की संभावना नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे उसकी औपचारिक मान्यता देने की भी नहीं. दोनों पक्षों के लिए चुनौती यह है कि महान शक्ति की प्रतिद्वंद्विता के बीच एक शांत सहयोग क्षेत्र को बनाए रखें. दशकों की सहनशीलता से तपे ताइवान के लिए अस्पष्टता के साथ जीना संभव है. असली सवाल यह है कि क्या भारत अपने मेहनत से कमाए गए कूटनीतिक लचीलापन को इतनी आसानी से सौंपने से परहेज करेगा.


(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और आवश्यक नहीं कि वे इस प्रकाशन के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हों.)

सिद्धार्थ अरोड़ा, अतिथि लेखक
(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति में गहरी रुचि है.)


टैग्स
सम्बंधित खबरें

कविता में एक शोकगीत: मेरे मित्र और बैचमेट, हेमचंद सिरोही, IAS

केजे अल्फोंस लिखते हैं, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और बिहार के पूर्व राज्य चुनाव आयुक्त के रूप में, हेमचंद सिरोही को प्रशासनिक कुशलता, जन-केंद्रित शासन और जनसेवा में योगदान के लिए व्यापक सम्मान प्राप्त था. उनके योगदानों में महाबोधि मंदिर को यूनेस्को की विश्व धरोहर की मान्यता दिलाना और जमीनी स्तर पर विकास की पहल शामिल थीं.

4 days ago

दो दुनियाओं के बीच जिंदगी: उथल-पुथल भरे समय की चुनौती

लेखक के अनुसार, हमारे आसपास की दुनिया उतनी नहीं बदली है, जितनी हमारे दिमाग के भीतर की दुनिया बदल गई है. लगातार आती खबरों, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से पैदा होने वाली चिंताओं के इस दौर में चुनौती है अपना ध्यान फिर से अपने नियंत्रण में लेना और उन चीजों पर फोकस करना, जिन्हें हम नियंत्रित कर सकते हैं.

4 days ago

कलाकार की अनंत रेखाएं: जोगेन चौधरी को श्रद्धांजलि

87 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले प्रख्यात कलाकार अपने पीछे ऐसी विशिष्ट कला छोड़ गए हैं, जो उनकी खास क्रॉस-हैचिंग शैली, असामान्य रेखाओं और गहराई से मानवीय चित्रों के लिए पहचानी जाती है.

5 days ago

समुद्र मंथन का अर्थशास्त्र: समृद्धि के लिए विरोधी शक्तियों की जरूरत क्यों है

लेखिका प्रियंका शर्मा कैंतुरा इस लेख में बताती हैं कि देवताओं, असुरों और लक्ष्मी के प्राकट्य की प्राचीन कथा प्रतिस्पर्धा, सहयोग और धन सृजन के बारे में क्या सीख देती है.

1 week ago

जेमी बीटन: असाधारण दिमाग और अरबों डॉलर के कारोबार के पीछे ज्योतिषीय गणना

क्रिमसन एजुकेशन के संस्थापक की शैक्षणिक महत्वाकांक्षा, उद्यमशीलता में उभार और 2027 की संभावनाओं का ज्योतिषीय विश्लेषण

1 week ago


बड़ी खबरें

गिफ्ट निफ्टी 170 अंक उछला, बाजार में तेजी के संकेत; रिलायंस-जियो समेत इन शेयरों पर रहेगी नजर

शुक्रवार को सेंसेक्स 308.49 अंक यानी 0.42 फीसदी चढ़कर 74,459.53 पर बंद हुआ था. वहीं, निफ्टी 116.35 अंक यानी 0.51 फीसदी की बढ़त के साथ 23,053.10 के स्तर पर पहुंच गया था.

24 minutes ago

भारत का कच्चे तेल का आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, अक्टूबर में हर दिन खरीदे 56 लाख बैरल

पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारतीय रिफाइनरियों ने बढ़ाई खरीदारी, रूस से करीब 20 लाख और पश्चिम एशिया से 23 लाख बैरल प्रतिदिन हुआ आयात

4 minutes ago

महादेव बेटिंग ऐप केस में बड़ी कार्रवाई, किंगपिन सौरभ चंद्राकर ओमान से भारत लाया गया; आज रायपुर कोर्ट में पेशी

अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी सिंडिकेट के प्रमोटर सौरभ चंद्राकर को CBI की टीम प्रत्यर्पण कर भारत लाई है. उसके खिलाफ CBI के दो मामलों में चार्जशीट दाखिल है, जबकि ED भी मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच कर रही है.

12 minutes ago

दिल्ली में 1 नवंबर से BS-6 से पुराने वाहनों की नो एंट्री, जानें किन गाड़ियों को मिलेगी छूट

इस फैसले का असर दिल्ली से सटे हरियाणा के शहरों से आने वाले वाहनों पर भी पड़ेगा. खासतौर पर गुरुग्राम और फरीदाबाद से दिल्ली आने वाले वाहन चालकों को इस नियम का ध्यान रखना होगा.

1 day ago

सरदार पटेल के विचारों पर आगे बढ़ रहा भारत, रक्षा उत्पादन 1.80 लाख करोड़ रुपये के पार: राजनाथ सिंह

सरदार पटेल की 151वीं जयंती पर भारत-भारती ने दिल्ली में आयोजित किया राष्ट्रीय समारोह, रक्षा मंत्री ने कहा- राष्ट्रीय एकता और अखंडता को चुनौती देने वाली ताकतों के खिलाफ देश एकजुट रहेगा

23 hours ago