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फिर राफेल खरीदने की तैयारी में भारत, क्या दसॉ एविएशन पर कर सकते हैं भरोसा?

भारतीय नौसेना राफेल मरीन फाइटर जेट खरीद रही है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि 26 विमानों के लिए 50,000 करोड़ रुपये की रिपोर्ट की गई कीमत IAF द्वारा 36 जेट्स के बेस प्राइस के लगभग दोगुनी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

नई दिल्ली के सत्ता गलियारों में खासकर देश के रक्षा विशेषज्ञों के बीच हलचल मची हुई है. इसका कारण यह है कि सरकारी चैनल दूरदर्शन न्यूज़ और ANI ने खबर दी है कि भारतीय नौसेना 26 राफेल मरीन लड़ाकू विमान करीब 50,000 करोड़ रुपये में खरीदेगी. फ्रांस का एक प्रतिनिधिमंडल भारतीय रक्षा मंत्रालय के अधिकारियो से बातचीत के लिए मिलने वाला था. रक्षा अधिग्रहण विभाग (Defense Acquisition Department) और भारतीय नौसेना के अधिकारी भी इस बातचीत में शामिल होंगे, यह जानकारी दूरदर्शन न्यूज़ और ANI ने रक्षा सूत्रों के हवाले से दी है. लेकिन, इस नए खरीद के आदेश की कीमत ने लोगों को चौंका दिया है.

सौदे की कीमत लगभग 40 हजार करोड़ रुपये

अगर 26 राफेल मरीन लड़ाकू विमानों के लिए 50,000 करोड़ रुपये की कीमत सही है, तो यह राफेल सौदा फिर से विवाद का कारण बन सकता है. रक्षा विशेषज्ञों ने BW को बताया कि भारतीय वायुसेना (IAF) ने 2016 में राफेल जेट्स के लिए लगभग 50 प्रतिशत कम बेस प्राइस (लगभग 26,000 करोड़ रुपये) का भुगतान किया था और कीमत इतनी ज्यादा नहीं बढ़ सकती. सरकारी समाचार एजेंसियों के अलावा, निजी समाचार मीडिया जैसे द प्रिंट और फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने सुझाव दिया है कि इस सौदे की कीमत लगभग 40,000 करोड़ रुपये हो सकती है.

महंगे सौदे में फंसा सकती है डसॉल्ट एविएशन

विशेषज्ञों के अनुसार, नए राफेल सौदे की कॉस्ट एनालिसिस से पता चलता है कि फ्रांस की डसॉल्ट एविएशन भारतीय नौसेना को महंगे सौदे में फंसा सकती है. नवंबर 2016 में रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने लोकसभा को बताया था कि अंतर-सरकारी समझौते (IGA) के तहत प्राप्त प्रत्येक राफेल विमान की लागत लगभग 670 करोड़ रुपये थी. लेकिन अब नए सौदे में ऑफसेट और अन्य लॉजिस्टिक्स को बाहर रखते हुए बेस प्राइस भारतीय नौसेना के लिए दोगुनी से भी अधिक है.

अधिक बेस प्राइस ले सकता है डसॉल्ट

यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि नई खरीद नीति के तहत भारतीय नौसेना के साथ सरकार से सरकार के अनुबंध में कोई ऑफसेट नहीं हो सकता है. लेकिन पहले के सौदे में कुल अनुबंध लागत का एक बड़ा प्रतिशत ऑफसेट का मूल्य था. इसलिए, भले ही 15 प्रतिशत से 50 प्रतिशत ऑफसेट की औसत मान ली जाए, वर्तमान में रिपोर्ट किए गए राफेल सौदे की कीमत भारतीय वायुसेना की खरीद की तुलना में बहुत अधिक है. 2016 में भारतीय वायुसेना ने 36 राफेल जेट्स के लिए 58,000 करोड़ रुपये का भुगतान किया था, जिसमें 50 प्रतिशत ऑफसेट और अन्य लॉजिस्टिक्स शामिल थे, जो संभवतः भारतीय नौसेना के वर्तमान आदेश का हिस्सा नहीं हैं. इसको देखते हुए, विशेषज्ञों में चिंता है कि भारतीय नौसेना डसॉल्ट के लिए बहुत अधिक बेस प्राइस चुका सकती है.

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भारत के लिए फायदेमंद होनी चाहिए डील

रक्षा ऑफसेट एक व्यवस्था है जिसमें एक सरकार और एक विदेशी सैन्य इक्विपमेंट सप्लायर के बीच यह समझौता होता है कि अनुबंध का कुछ लाभ खरीदने वाले देश की अर्थव्यवस्था में वापस आ जाएगा. विशेषज्ञों के बीच अनुमान 10 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक होता है कि ओरिजिनल इक्विपमेंट मैनेजमेंट (OEM) ऑफसेट दायित्वों को पूरा करने के लिए शुल्क लेगा. चूंकि वर्तमान सौदे में कोई ऑफसेट लागत शामिल होने की संभावना नहीं है, इसलिए कुल सौदे की कीमत भारत के लिए फायदेमंद होनी चाहिए. लेकिन इसके विपरीत होता हुआ दिखाई दे रहा है.

2016 में खरीदे थे 36 राफेल विमान

रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में भारतीय वायुसेना ने 36 राफेल विमानों की खरीद के लिए प्रति विमान लगभग 700 करोड़ रुपये या 100 मिलियन यूरो से कम की बेस प्राइस पर ऑर्डर जारी किया था. इस हिसाब से 36 विमानों की कीमत 3.5 बिलियन यूरो से कम होनी चाहिए थी, लेकिन कुल अनुबंध मूल्य 8 बिलियन यूरो था क्योंकि इसमें स्पेयर पार्ट्स, सिमुलेटर, प्रशिक्षण, प्रदर्शन आधारित लॉजिस्टिक्स और हथियार आदि की लागत भी शामिल थी. इसके अलावा, इसमें ऑफसेट लागत भी जुड़ी थी.

इस तरीके से कम हो सकती है कॉन्ट्रैक्ट की लागत कम

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार भारत को विभिन्न सहायक लागतों पर बचत होनी चाहिए क्योंकि फ्रांस की तरह ही जहां नौसेना और वायुसेना राफेल लड़ाकू विमान का संचालन करती हैं, भारत भी ऐसा ही मॉडल अपना सकता है क्योंकि भारतीय वायुसेना के पास पहले से ही 36 जेट्स हैं. फ्रांस में राफेल विमानों के लिए रखरखाव और स्टोर्स एक समान होते हैं साथ ही सिमुलेटर भी साझा होते हैं. इसी तरह अगर भारत भी साझा रखरखाव और स्टोर्स का निर्णय लेता है तो कुल कॉन्ट्रैक्ट की लागत कम हो सकती है. ऐसा सूत्रों का कहना है. ऐसे सौदे में रखरखाव और इसके लिए बुनियादी ढांचा बनाने की लागत, कुल अनुबंध लागत का मुख्य हिस्सा होती है. लेकिन जब भारतीय वायुसेना ने 36 जेट्स खरीदे थे तब भारत ने पहले ही यह लागत वहन कर ली थी और इसलिए भारतीय नौसेना के राफेल जेट्स की लागत इतनी अधिक नहीं बढ़नी चाहिए.

भारत में ही कर्मियों को मिले प्रशिक्षण

IAF ने दो राफेल स्क्वाड्रन, हासीमारा और अंबाला स्थापित किए हैं, जिनके पास अपने स्टोर्स और सिमुलेटर हैं. इस प्रकार, प्रशिक्षण सुविधाएं पहले से ही स्थापित की जा चुकी हैं, जिसमें सिमुलेटर भी शामिल हैं. अपने पिछले छह वर्षों के संचालन में IAF ने राफेल पर बड़ी संख्या में कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया है, जिनमें पायलट, इंजीनियर और तकनीशियन शामिल हैं. नौसेना के कर्मियों के लिए दो एयरफोर्स बेस पर प्रशिक्षण लेना आसान होगा बजाय फ्रांस जाने के, क्योंकि उन्हें पहला विमान मिलने से पहले तीन साल से अधिक समय है.

क्षमता निर्माण के मामले में भारत है पीछे

इसके अलावा, पिछले IAF कॉन्ट्रैक्ट में 50 प्रतिशत ऑफसेट शामिल थे, जो रक्षा मंत्रालय द्वारा अब तक की सबसे अधिक मांग थी. लेकिन अनुबंधों पर हस्ताक्षर के आठ साल बाद भी क्षमता निर्माण के मामले में जमीनी काम बहुत कम है, ऑफसेट के वादे पर IAF कॉन्ट्रैक्ट जीतने के बाद डसॉल्ट एविएशन ने ऑफसेट पर कम प्रदर्शन के लिए दंड दिया है, जैसे कई अन्य OEMs (मूल उपकरण निर्माता) ने दिया है. लेकिन ऑफसेट की लागत 2016 के IAF मूल्य में शामिल थी.

उम्मीद से कम होनी चाहिए कीमत

इस प्रकार नई खरीद नीति के तहत जहां दोनों सरकारों के कॉन्ट्रैक्ट में कोई ऑफसेट नहीं हैं, राफेल जेट्स की कीमत अब उम्मीद से काफी कम होनी चाहिए, क्योंकि सामान्यत ऑफसेट दायित्व का मूल्य 15 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक होता है. विशेषज्ञों का कहना है कि नौसेना की आवश्यकताएं भारतीय वायु सेना (IAF) से बहुत अलग नहीं होंगी और रखरखाव और अन्य लॉजिस्टिक को ध्यान में रखते हुए, नौसेना के खरीद आदेश की लागत बहुत अधिक नहीं होनी चाहिए.

IAF ने बेस प्राइस 3.5 बिलियन यूरो (2016 में लगभग 26,000 करोड़ रुपये) के ऊपर अतिरिक्त कीमत चुकाई थी, क्योंकि इसमें भारत के लिए विशिष्ट सुधार, स्पेयर पार्ट्स, PBL, सिम्युलेटर, प्रशिक्षण आदि शामिल थे (हथियार शामिल नहीं थे). लेकिन भारत के लिए विशिष्ट सभी सुधारों का भुगतान पहले ही किया जा चुका है और सिम्युलेटर आदि भी मौजूद हैं. इस स्थिति में भारतीय नौसेना के आदेश की कीमत IAF के आदेश से 100 प्रतिशत अधिक नहीं हो सकती है.

दसॉ एविएशन पर बने हुए हैं सवाल

विशेषज्ञों का कहना है कि स्पेयर पार्ट्स, वारंटी, गारंटी, परियोजना आधारित आवश्यकताओं में 25 प्रतिशत वृद्धि मानते हुए, नौसेना के लिए प्रति राफेल जेट की आधार मूल्य 29,000 करोड़ रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए. ऐसी राय है कि इस सौदे में प्राइस नेगोशिएशन कमेटी को कुछ कठिन सवाल पूछने होंगे. इसके अलावा, दसॉ को भारतीय वायु सेना (IAF) के सौदों में सहमत ऑफसेट को पूरा करने में विफल रहने पर जवाब देना होगा. नौसेना के नए कॉन्ट्रैक्ट में किए गए वादों पर इसे क्यों भरोसा किया जाए?

इसके अलावा, रिपोर्ट्स से पता चलती है कि दसॉ अपने विमान की ग्लोबल डिलीवरी के कार्यक्रम से बहुत पीछे चल रही है और उसके पास 200 से अधिक राफेल जेट्स का बैकलॉग है. पिछले दस वर्षों में दसॉ ने 200 से कम विमान डिलीवर किए हैं. अगले 200 विमान देने में कितना समय लगेगा? भारतीय नौसेना को पहला विमान कब मिलेगा? क्या दसॉ अपने पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए लोकलाइजेशन के वादों पर भरोसा किया जा सकता है?
 


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