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क्या विदेशी अध्ययन का बुलबुला फूट चुका है?

विदेश में अध्ययन करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या अब रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई है, लेकिन बढ़ती वीजा पाबंदियों, वित्तीय आवश्यकताओं और उच्च शिक्षा की लागत ने इस प्रवृत्ति में अनिश्चितता ला दी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 10 months ago

2025 की शुरुआत तक, 18 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं, जो 2023 में 13 लाख छात्रों से काफी अधिक है. यह अब तक का उच्चतम आंकड़ा है, और सबसे लोकप्रिय देश अमेरिका, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम हैं. अमेरिका में लगभग 3.5 लाख भारतीय छात्र पढ़ रहे हैं, जो पिछले साल की तुलना में 23% की वृद्धि है और चीन को पीछे छोड़ते हुए अमेरिका सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय छात्र गंतव्य बन गया है.

हालाँकि, क्या यह बुलबुला फूट चुका है? आने वाले वर्षों में यह कहानी कितनी उज्ज्वल रहेगी, यह देखना होगा क्योंकि अमेरिका और यूके में अंतरराष्ट्रीय छात्र प्रवेश और वीज़ा नीतियों में बड़े बदलाव हो रहे हैं. दोनों देश वीजा अवधि को सख्त कर रहे हैं, इंटरव्यू छूट को कम कर रहे हैं और वित्तीय आवश्यकताओं को बढ़ा रहे हैं. प्रस्तावित अमेरिकी नियम F-1 वीज़ा को चार साल तक सीमित कर रहे हैं, जिसमें विस्तार की आवश्यकता होगी, और अधिकांश आवेदकों के लिए व्यापक वीजा इंटरव्यू छूट समाप्त हो रही है. यूके में छात्रों के लिए आवश्यक मासिक रखरखाव निधि बढ़ाई जा रही है और पोस्ट-स्टडी वर्क अधिकार 24 महीने से घटाकर 18 महीने कर दिए गए हैं.

अगस्त 2025 में अमेरिका में भारतीय छात्रों का प्रवेश पिछले वर्ष की तुलना में 50% कम हुआ, जबकि यूके में प्रवेश में पिछले वर्ष 20% गिरावट के अलावा 11% की गिरावट देखी गई. कनाडा में आवास संकट गंभीर हो रहा है और ऑस्ट्रेलिया में सभी देशों में सबसे अधिक छात्र वीज़ा शुल्क है, AU $2,000, साथ ही हाल ही में अंतरराष्ट्रीय प्रवेश पर कैप लगाया गया है.

अंतरराष्ट्रीय शिक्षा में बदलाव और भारत में विकल्प

अंतरराष्ट्रीय उच्च शिक्षा तेजी से बदल रही है, और शिक्षा की बढ़ती लागत अनिश्चितता को और बढ़ा रही है. ऐसे समय में भारतीय छात्रों को अपने विदेश अध्ययन विकल्पों पर पुनर्विचार करना चाहिए, खासकर जब प्रमुख अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय भारत में कैंपस खोल रहे हैं.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत, यूजीसी ने 2022 में घोषणा की कि अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को भारत में स्वतंत्र कैंपस स्थापित करने की अनुमति दी जाएगी, बिना किसी भारतीय भागीदार की आवश्यकता और पूर्ण अकादमिक और प्रशासनिक स्वायत्तता के साथ, यदि वे वैश्विक टॉप 500 में रैंकेड हों. ये संस्थान अपने प्रवेश मानदंड, फीस संरचना और पाठ्यक्रम स्वयं निर्धारित कर सकते हैं, और आरक्षण प्रणाली का पालन करना आवश्यक नहीं होगा.

भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों का विस्तार

जून 2025 तक, भारत में 1,338 विश्वविद्यालय और लगभग 60,000 उच्च शिक्षा संस्थान हैं. देश में उच्च शिक्षा में 4.7 करोड़ छात्र नामांकित हैं, लेकिन कुल GER केवल 27 है. NEP के तहत ‘Competencies based Skills’ (CBS) दृष्टिकोण अपनाया गया है, जो छात्रों को भविष्य के कार्य अवसरों के लिए तैयार करने पर केंद्रित है. इसके अलावा, यह नीति अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के भारत में प्रवेश को प्रोत्साहित करती है.

लिवरपूल विश्वविद्यालय (रैंक 147) और लैंकेस्टर विश्वविद्यालय (रैंक 157) 2026 में बेंगलुरु में कैंपस खोलने की योजना बना रहे हैं. यॉर्क विश्वविद्यालय (रैंक 169) और एबरडीन विश्वविद्यालय (रैंक 269) मुंबई में कैंपस खोलेंगे. ह्यारो स्कूल, लंदन में 1572 में स्थापित, हाल ही में बेंगलुरु में कैंपस खोल चुका है. ऑस्ट्रेलिया के डीकिन विश्वविद्यालय और वोलोंगॉन्ग विश्वविद्यालय जुलाई 2024 से गुजरात के GIFT सिटी में काम कर रहे हैं.

शिक्षा में उच्च गुणवत्ता और वैश्विक मानक

इन विदेशी कैंपसों में PG और UG पाठ्यक्रम, जैसे कि व्यवसाय विश्लेषण, साइबर सुरक्षा, वित्तीय प्रौद्योगिकी और डेटा एनालिटिक्स, प्रदान किए जा रहे हैं. अधिकांश विश्वविद्यालय “Triple Helix” मॉडल का पालन करेंगे, जिसमें शिक्षा, अनुसंधान और उद्योग सहभागिता को जोड़ा जाएगा. ये कैंपस विदेशी विश्वविद्यालयों के अकादमिक और अनुसंधान-केंद्रित वातावरण की नकल करते हुए वैश्विक एक्सचेंज और उद्योग साझेदारी को बढ़ावा देंगे.

भारत में विदेशी संस्थानों का महत्व

शिक्षा की बढ़ती लागत और वीजा अनिश्चितताओं के बीच, भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों का प्रवेश भारतीय छात्रों के लिए एक वरदान साबित हो सकता है. भारत की युवा आबादी बड़ी, अंग्रेजी बोलने वाली और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की मांग रखने वाली है. विदेशी विश्वविद्यालय कम लागत में वैश्विक शिक्षा, उत्कृष्ट अकादमिक और अवसंरचना प्रदान कर सकते हैं, और लचीले वैश्विक रास्ते खोल सकते हैं.

हालाँकि, यह भी देखना होगा कि क्या इन संस्थानों के प्रवेश से मौजूदा भारतीय विश्वविद्यालयों, जैसे IIT और IIM, में गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ेगा या फैकल्टी और छात्र इन नए संस्थानों की ओर आकर्षित होंगे. यह समय बताएगा.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

अतिथि लेखक-एसएस मंथा, पूर्व चेयरमैन AICTE और अशोक ठाकुर, पूर्व सचिव भारत सरकार.


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