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Happy Mother's Day: उन सभी माताओं के लिए जिन्हें हम "धन्यवाद" कहना भूल गए

मदर्स डे पर एक सोच, उस मजबूत ताक़त, चुपचाप सिखाए गए सबक और बिना बोले दिए गए बलिदानों के बारे में, जो हमें वह बनाते हैं जो हम हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 months ago

ये एक मैसेज था जिसने ध्यान खींचा. सुबह-सुबह एक दोस्त ने थोड़ा मज़ाक में, थोड़ा डाँटते हुए मैसेज किया. “मदर्स डे पर कोई ओपिनियन आर्टिकल नहीं?” शायद उसका मतलब था — ‘तुमसे उम्मीद नहीं थी.’ मैं हँस पड़ा, और जवाब में कुछ आत्म-गौरव से लिखा कि मेरे लिए तो हर दिन ही मदर्स डे, डॉटर्स डे और विमेन्स डे होता है. फिर रुक गया और उस रुकावट को महसूस किया.

हमारे घर में ये बात सच भी है. मैं ऐसी महिलाओं के साथ रहता हूँ जो अपने प्यार और समझदारी से घर को एक अलग ही ऊर्जा देती हैं. सलाह मिलती है — बिना माँगे, लगातार, आवाजें और शोर होता है. देखभाल होती है — कभी-कभी ज़रूरत से ज़्यादा और प्यार तो हमेशा होता है — ज़िद्दी, लेकिन हमेशा मौजूद. पर उस दोस्त के मैसेज ने मुझे याद दिलाया कि भले ही मैं ऐसे त्योहारों को हल्के में लेता हूँ, ये खास दिन हमें कुछ ज़रूरी बातों की याद दिला देते हैं — जैसे किसी को याद करना.

जब मैं कई साल पहले एक संयुक्त परिवार में बड़ा हो रहा था, तब मुझे कई "माओं" का साथ मिला — मेरी अपनी माँ, मेरी बुआएँ, मेरी दादी, बहन और पड़ोस की आंटियाँ. हर एक ने अलग तरह की माँ की भूमिका निभाई. कोई अनुशासन सिखाती थी, कोई खूब लाड़ करती थी, कोई हल्दी और शहद से ठीक कर देती थी. ऐसा लगता था जैसे मैं ममता के फूलों के गुलदस्ते में बड़ा हो रहा हूँ — हर फूल की खुशबू अलग, हर पंखुड़ी का तरीका अलग. उनके बीच मतभेद भी थे, पर मैंने हर एक से कुछ न कुछ सीखा. प्यार पर कभी शक नहीं होता था — वो तो वैसे ही होता था जैसे सीलिंग फैन या दही-चावल.

फिर ज़माना बदल गया. घर छोटे हो गए, रसोइयाँ शांत हो गईं, गलियाँ सूनी हो गईं और त्योहारों की रौनक कम हो गई. और इन छोटे होते घरों के बीच कुछ अनदेखी दूरियाँ भी आ गईं. कई झगड़े, पुराने परिवारिक मतभेद, या आर्थिक तंगी — ये सब हमें धीरे-धीरे अपनों से दूर कर देते हैं. उन लोगों से भी जिनके साथ कभी हमने मिलकर मुरुक्कू खाया था.

संयुक्त परिवार से न्यूक्लियर और अब अकेले रहने तक का सफर — यही रास्ता कई भारतीय परिवारों का रहा है. और हर कदम पर हम उस रोज़मर्रा की, सब तरफ मौजूद रहने वाली माँ की उपस्थिति से थोड़ा और दूर होते चले गए. अब माँ का रोल ऐसा नहीं रहा जो हर जगह दिख जाए — अब उसे कॉल करना पड़ता है, समय निकालना पड़ता है, उसे महसूस करवाना पड़ता है. वरना वो अनदेखी रह जाती है.

प्यार और कमियों का ये गोल चक्र

शायद यही वजह है कि मदर्स डे, भले ही अब एक मार्केटिंग त्योहार जैसा लगता हो, पहले से कहीं ज़्यादा मायने रखता है. ये सिर्फ वो दिन नहीं है जब बेटे फूल भेजते हैं — थोड़े शर्मिंदा से होकर — या बेटियाँ दिन के आख़िर में इमोजी वाला व्हाट्सएप मैसेज भेजती हैं. ये एक पल है. एक ठहराव है. एक सोच-समझकर किया गया काम — उस इंसान को याद करने का, जिसका प्यार इतना लगातार और सच्चा होता है कि हम उसे महसूस करना ही भूल जाते हैं.

जब हम बच्चे होते हैं, हमें लगता है माँ सब जानती हैं. जब किशोर होते हैं, तो लगता है माँ कुछ भी नहीं जानतीं. बीस की उम्र में हम उन्हें ज़्यादा कॉल नहीं करते. तीस की उम्र में समझ आता है कि वो कई बातों में सही थीं. और चालीस के आस-पास हम खुद उनकी तरह बोलने लगते हैं. ये एक गोल चक्र है जिसे कोई भी दार्शनिक उतने अच्छे से नहीं समझा सकता जितना एक थकी हुई भारतीय माँ कह देती है — “जब खुद के बच्चे होंगे, तब समझोगे.”

माएँ परफेक्ट नहीं होतीं. उनके पास बहुत सारी राय होती हैं — कभी-कभी बहुत ज़्यादा. राजनीति, पसंद-नापसंद, दिनचर्या — हर बात पर बहस हो सकती है. गुस्सा आता है, बातें कटती हैं, कभी-कभी चुप्पी भी छा जाती है. लेकिन इन सबसे बावजूद, प्यार कम नहीं होता. माँ का प्यार बहुत ज़िद्दी होता है — ये शर्तों पर नहीं चलता. आप उन्हें नाराज़ कर सकते हैं, उनकी बातों से असहमत हो सकते हैं, पर उनके दिल से खुद को हटाना बहुत मुश्किल होता है.

हर कोई अपनी भावनाओं को खुलकर नहीं जताता. लेकिन अक्सर, हमारे अंदर जो सच्चाई और सही रास्ता चुनने की ताकत होती है, वो ऐसे पालन-पोषण से आती है जो बाहर से सख्त लगता है. आज की पीढ़ी जिसे कठोरता या दूरी समझती है, वो असल में सबसे सच्चा प्यार होता है. माँ का असली प्यार तब सख्त होता है जब ज़रूरत होती है — ताकि दुनिया की गलत चीज़ों के बीच भी हमारे अंदर के अच्छे संस्कार टिके रहें.

माँ वो सब याद रखती हैं जो हम भूल जाते हैं — कि हम कभी छोटे थे, कि चोट हमें ज़्यादा दर्द देती थी जितना दिखता था, कि कोई रात भर जागता था ताकि हम चैन से सो सकें. और हमारी शर्म के लिए, माँ को वो सब बातें भी याद रहती हैं जो हम भूलना चाहते हैं — जैसे बचपन की अजीब हरकतें, जिन्हें वो पूरे परिवार के सामने हँसते हुए दोबारा सुनाती हैं. वो ये सब शाबाशी के लिए नहीं करतीं — ये उनके स्वभाव में होता है. जन्म से सोने तक, उन्होंने ये बात अंदर तक महसूस कर ली होती है कि उनका काम तारीफ पाना नहीं, बल्कि हमेशा निभाना होता है.

भारतीय माँ: एक भूमिका और एक परंपरा

भारत में माँ की छवि बहुत खास होती है. वो देवी मानी जाती है, देने वाली होती है, सहने वाली होती है, सब कुछ छोड़ देने वाली, घर की मालिक होती है, और बिना तनख्वाह के सालों तक काम करने वाली भी. वही माँ है जो बेटे को युद्ध पर भेजते समय एक आँसू और एक दुआ देती है, और फिर ट्यूशन भेजते समय दो परत में लपेटी हुई रोटी का टिफिन भी देती है. वो बॉलीवुड की इमोशनल फिल्म भी है और व्हाट्सएप की स्ट्रॉन्ग मैसेज वाली महिला भी. और जैसे-जैसे समाज बदलता है — जैसे पुरुष खाना बनाते हैं, बेटियाँ कमाने लगती हैं, ज़िम्मेदारियाँ आपस में बँटती हैं — फिर भी एक चीज़ नहीं बदलती: हमारी ज़िंदगी की नींव — वो इंसान जिसे हम सबसे पहले याद करते हैं जब सब कुछ बिगड़ने लगता है.

और हाँ, भारत में ऐसा भी होता है कि पड़ोसी आपको अपने बच्चे की तरह डाँट सकता है. वो बगल वाली आंटी जो कहती हैं — “शर्ट ठीक से पहनो”, “पैसे मत उड़ाओ”, या जो जानती हैं कि आपने रात का खाना नहीं खाया और खाने पर बुला लेती हैं — वो भी माँ जैसा ही देखभाल करती हैं. ऑफिस की वो साथी जो मीटिंग्स के बीच आपको खाने की याद दिलाती हैं, अपने पर्स में दवाई रखती हैं “अगर ज़रूरत पड़े”, और जब आपका दिन ठीक नहीं होता, तो चुपचाप आपकी मदद कर देती हैं — वो भी माँ जैसी हैं. या स्कूल की वो टीचर जो सालों बाद भी आपकी लिखावट पहचानती हैं और आपके माँ-बाप से पूछती हैं कि आप कैसे हैं. परिवार के बाहर भी ऐसे लोगों का ध्यान रखना ही हमारे समाज को जोड़े रखता है. कभी-कभी ये दखल लग सकता है, लेकिन इसके पीछे प्यार होता है और ये सच्ची उम्मीद होती है कि आप और बेहतर बनें.

माँ बनना शायद दुनिया का सबसे मुश्किल और सबसे कम सराहा जाने वाला काम है. और ये ऐसा काम है जिससे कोई रिटायर नहीं होता. आपका बच्चा चाहे अब CEO हो, या तर्क करने वाला, या बाग़ी, या बहुत समझदार — माँ के लिए वो वही बच्चा होता है जिसे कभी शर्ट के बटन लगाने में मदद चाहिए थी.

माँ होना: सिर्फ जन्म देने का नहीं, एक भूमिका और ज़िम्मेदारी का नाम

आज मैं ये सिर्फ अपनी माँ के लिए नहीं, बल्कि उन सभी के लिए लिख रहा हूँ जो माँ बनीं उनके लिए जिन्होंने अकेले अपने बच्चों को पाला, उनके लिए जिन्होंने अपने बच्चों को बहुत जल्दी खो दिया. उनके लिए जिनके अपने बच्चे नहीं थे, लेकिन उन्होंने सबका दिल माँ जैसा बना कर रखा. उनके लिए जिन्होंने अपनी बेटियों के लिए समाज से लड़ाई लड़ीऔर उनके लिए जो कभी किसी मैगज़ीन के कवर पर नहीं आएँगी, लेकिन जिनका नाम हज़ारों यादों में धीरे से लिया जाएगा.

आज मदर्स डे हम सभी अपने-अपने तरीके से मना रहे हैं, कोई फूल भेजता है, कोई माँ को बाहर लंच पर ले जाता है. कोई स्पा वाउचर देता है, तो कोई सोशल मीडिया पर प्यारी कहानियाँ पोस्ट करता है. जो बच्चे विदेश में रहते हैं, वे टाइम जोन मिलाकर कॉल करने के लिए अलार्म लगाते हैं. स्कूल में बच्चों से कार्ड बनवाए जाते हैं, ऑफिस में माँओं को समर्पित छोटे कार्यक्रम होते हैं, और व्हाट्सएप पर पुरानी तस्वीरें और कविताएँ घूमती हैं.

ये सब एक ही बात कहने की कोशिश हैं — “धन्यवाद”, उस एहसास को जताने की कोशिश जो शब्दों में आसानी से नहीं आता. तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में जहाँ प्यार जताने के लिए भी समय निकालना पड़ता है, वहीं छोटा-सा इशारा भी याद और अपनापन जता देता है. शायद यही वजह है कि सबसे सख्त दिल वाले इंसान भी जब अपनी माँ का ज़िक्र करते हैं, तो भावुक हो जाते हैं. ये वो कोना है दिल का, जिसे कोई उम्र, कोई सोच, कोई बड़ी नौकरी भी कठोर नहीं बना सकती. जब आप कोई पुरानी लोरी सुनते हैं, या बचपन का कोई खाना चखते हैं, तो आप फिर से सात साल के बच्चे बन जाते हैं — उसकी गोद में, उस दुनिया से दूर जो अब जटिल हो चुकी है.

और शायद यही वो सच्चाई है जिसे हमें सहेज कर रखना चाहिए. माँ होना सिर्फ शरीर से माँ बनने का नाम नहीं है, ये एक भूमिका है, एक ज़िम्मेदारी है. मैं अपने आसपास कई महिलाओं को देखता हूँ — दोस्त, सहकर्मी, पत्नी, पड़ोसन — जो इस भूमिका को बहुत प्यार और ताक़त के साथ निभा रही हैं. वो सिर्फ बच्चों का नहीं, बड़ों का भी माँ की तरह ध्यान रखती हैं. वो सिखाती हैं, समझाती हैं, ज़रूरत पड़ने पर टोकती भी हैं, और हमारे बेहतर बनने की कोशिशों में साथ देती हैं — चाहे उनका खून का रिश्ता हो या नहीं.

माँ वही है जो किसी और की भलाई को अपनी ज़िम्मेदारी मानती है, जो किसी और के बनने में अपना प्यार, समय और ताक़त लगाती है. हम सबकी ज़िंदगी की शुरुआत अक्सर किसी ऐसी बाहों में होती है जिसने हम पर पहले भरोसा किया, जब हम खुद पर भरोसा करना नहीं जानते थे और सच मानिए, ये एक दिन तो बनता ही है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं कि ये इस प्रकाशन की राय से मेल खाते हों.)

(गेस्ट लेखक- श्रीनाथ श्रीधरन, पिछले 27 वर्षों से बड़े कॉर्पोरेट्स को रणनीतिक सलाह दे रहे हैं. उन्होंने कई अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया है और कई कंपनियों में स्वतंत्र निदेशक (इंडिपेंडेंट डायरेक्टर) के रूप में भी जुड़े हैं. वह उन संगठनों को सलाह देते हैं जो फाइनेंस, डिजिटल, खपत आधारित अर्थव्यवस्था, GEMZ (गिग इकॉनमी, मिलेनियल्स, जनरेशन Z) और ESG (पर्यावरण, समाज और प्रशासन) से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं. वे सीनियर लीडर्स को कोचिंग और मेंटरशिप भी देते हैं. उद्योग की नीतियों और पब्लिक पॉलिसी (जननीति) से जुड़े चर्चाओं में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं. वे कई मैनेजमेंट स्कूलों और सरकारी ट्रेनिंग संस्थानों में विज़िटिंग फैकल्टी भी हैं. वे मीडिया में कई विषयों पर नियमित लेख लिखते हैं. वे ‘Time for Bharat’ नामक किताब (जो सार्वजनिक शासन यानी पब्लिक गवर्नेंस पर है) के संपादक और सह-लेखक भी हैं. साथ ही Observer Research Foundation में विज़िटिंग फेलो हैं. उनका सारा प्रकाशित काम यहाँ उपलब्ध है: https://srinath.blog)
 


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