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Budget 2023: स्टेनलेस स्टील सेक्टर को चाहिए कस्टम ड्यूटी से मुक्त कच्चा माल

हम जो कच्चा माल घरेलू स्तर पर जुटा नहीं सकते, उसके आयात पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (बीसीडी) चुकाते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

(अभ्युदय जिंदल, प्रबंध निदेशक, जिंदल स्टेनलेस)

स्टेनलेस स्टील का निर्माण एक ऐसा क्षेत्र है, जिसका विनिर्माण उद्योग में स्थान अद्वितीय और आशाजनक है. अद्वितीय, क्योंकि स्टेनलेस स्टील के निर्माण में आवश्यक कोई भी प्रमुख कच्चा माल देश में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है. आशाजनक, क्योंकि यह संभावनाओं से भरा है – भारत स्टेनलेस स्टील के लिए सबसे तेजी से बढ़ने वाला बाजार है, जहां अपार संभावनाओं का दोहन किया जाना बाकी है. घरेलू निर्माता भारत की मांग पूर्ति करने में सक्षम हैं. हालांकि, जिन देशों में अधिशेष स्टेनलेस स्टील उत्पादन क्षमताएं हैं, वे भी भारत के बाजार को अपनी प्रगति के महत्वपूर्ण कारक के तौर पर देखते हैं. 

यही बात स्टेनलेस स्टील (एसएस) के घरेलू निर्माताओं को मुश्किल स्थिति में डालती है. एक ओर, हम जो कच्चा माल घरेलू स्तर पर जुटा नहीं सकते, उसके आयात पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (बीसीडी) चुकाते हैं और उससे आपूर्ति के मोर्चे पर बाधाएं खड़ी होती हैं. दूसरी ओर, बाजार में अपनी हिस्सेदारी कायम करने के लिए हमें संघर्ष करना पड़ता है, क्योंकि डंप किए गए और सब्सिडी वाले आयात से मुकाबला करना पड़ता है. घरेलू एसएस उद्योग को अपनी पूरी क्षमता का लाभ उठाने में सक्षम करने हेतु  इन दोनों विसंगतियों को दूर करने की आवश्यकता है.

घरेलू निर्माताओं  को पूरी आपूर्ति श्रृंखला में समान  प्रतियोगी आधार की जरूरत

वित्त वर्ष 2023-24 के बजट में इन विसंगतियों पर सर्वोच्च प्राथमिकता से ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था को लगातार बढ़ाने  और 5 लाख करोड़ (ट्रिलियन) डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल कराने में मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर उद्योग महत्वपूर्ण योगदानकर्ता होंगे. भारत 2030 तक अपने जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता को  45 फीसदी तक घटाने और 2070 तक शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए भी वचनबद्ध है. यह तभी संभव है जब हमारा देश जैव ईंधन (बायोफ्यूल), इथेनॉल और ग्रीन हाइड्रोजन को अपनी विनिर्माण प्रथाओं में प्रयुक्त करे. 

चाहे परंपरागत इंफ्रास्ट्रक्चर के विनिर्माण और परिवहन क्षेत्रों में उपयोग हो, या आधुनिक युग के कार्बन उत्सर्जन घटाने के रास्ते में प्रयोग हों, स्टेनलेस स्टील हर जगह भविष्य की धातु के रूप में अभिज्ञात है. 

स्टेनलेस स्टील के निर्माण के लिए सबसे महत्वपूर्ण सामग्री एसएस स्क्रैप है. क्योंकि देश में एसएस स्क्रैप का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में नहीं होता, हमें अपनी ज़रूरत  का अधिकांश स्क्रैप आयात करना पड़ता है. भारतीय निर्माता पर्यावरण-हितैषी इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (ईएएफ) के जरिए  एसएस स्क्रैप का उपयोग करते हैं. यह प्रक्रिया चक्रीय अर्थव्यवस्था की अवधारणा के अनुरूप है, क्योंकि इससे स्टेनलेस स्टील 100 फीसदी पुनर्चक्रण  के योग्य (रीसाइक्लेबल) हो जाता है. साथ ही, एसएस स्क्रैप निकल की आवश्यकता की पूर्ति का सबसे सस्ता तरीका है और इसलिए, प्रतिस्पर्धी निर्माण में सबसे अच्छा काम करता है. हम सरकार को स्क्रैप पर शून्य कस्टम ड्यूटी लागू करने के लिए धन्यवाद देते हैं,  जो कि 31 मार्च 2023 तक ही प्रभावी है. इस  छूट को लंबी अवधि के लिए जारी रखने  की आवश्यकता है. घरेलू इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि स्थानीय स्क्रैप रीसाइक्लिंग उद्योग, जो अनिवार्य रूप से एक खंडित उद्योग है, को सक्रिय वित्तीय उपायों के द्वारा अनुशासित एवं संगठित बनाया जाये.

स्टेनलेस स्टील उद्योग की क्रोमियम पर भी अत्यधिक निर्भरता है. यह ऐसा खनिज है, जो स्टील को जंगरोधी (स्टेनलेस) बनाता है. इसलिए उद्योग की  क्रोम की आवश्यकता पूर्ती हेतु  क्रोम अयस्क पर लागू 30 प्रतिशत निर्यात शुल्क जारी रखा जाना चाहिए. हालांकि भारत में क्रोम अयस्क का उत्पादन होता है, फिर भी क्रोमियम उपलब्धता के बारे में पर्याप्त दृश्यता नहीं है. भारत में वर्तमान और अनुमानित एसएस खपत को देखते हुए, हमारे क्रोम अयस्क भंडार को सुरक्षित करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, इससे पहले की वे अपर्याप्त हो जाएं.
 
स्टेनलेस स्टील के निर्माण में महत्वपूर्ण कच्चे माल का उपयोग होता है, जैसे कि फेरो निकल, शुद्ध निकल, मॉलिब्डेनम कॉन्संट्रेट और फेरो मॉलिब्डेनम. देश में निकल और मॉलिब्डेनम दोनों की ही कमी की वजह से हम केवल आयत पर पूर्णतः निर्भर हैं. इसलिए भारतीय एसएस उद्योग के निर्माण में लागत-प्रतिस्पर्धी होने के लिए, हमें इन खनिजों पर बीसीडी से दीर्घकालिक छूट की आवश्यकता है. वर्तमान में ग्रेफाइट इलेक्ट्रोड पर भी बीसीडी 7.5 प्रतिशत है, जिसे 2023 के बजट में खत्म कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि ग्रेफाइट इलेक्ट्रोड ईएएफ के जरिए स्टेनलेस स्टील के निर्माण में इस्तेमाल होने वाला महत्वपूर्ण उपभोज्य है. 

मार्केट डायनामिक्स को तो दोतरफा सुधारों की जरुरत है

भारत ने कई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) पर हस्ताक्षर किए हैं, जैसे आसियान क्षेत्र के साथ, जिसके कारण भारत में अत्यधिक व्यापर असंतुलन की समस्या खड़ी हो गयी है| जिन देशों के साथ हमारा एफटीए नहीं है, उनके साथ भी 7.5 प्रतिशत की बीसीडी आयात को नियंत्रण में रखने में नाकाम साबित हुई है. नतीजतन, हर साल आयात बढ़ता जा रहा है. वित्त वर्ष 2021-22 में भी स्टेनलेस स्टील के फ्लैट (सपाट) उत्पादों का आयात वित्त वर्ष 2020-21 के मुकाबले 69 प्रतिशत बढ़कर 7,57,000 टन रहा. अनुमानित है कि वित्त वर्ष 2022-23 में यह आयात 10 लाख टन (अप्रैल से सितंबर तक के आंकड़ों पर आधारित अनुमान) तक पहुंच सकता है, जो कि वित्त वर्ष 2020-21 के मुकाबले 121 प्रतिशत ज्यादा होगा. घरेलू बाजार की 30 प्रतिशत आवश्यकताओं की पूर्ति आयात के जरिए की जा रही है. घरेलू उद्योग की स्थापित क्षमता 67 लाख टन है, जिसमें 54 लाख टन फ्लैट उत्पाद भी शामिल हैं. यह उद्योग अभी 60 प्रतिशत क्षमता दोहन ही कर पा रहा है. देश की समूची मांग की पूर्ति करने के लिए क्षमता दोहन को बढ़ाए जाने की पर्याप्त गुंजाइश है. इसलिए, एक ओर, हमें सभी एफटीए की समीक्षा करने की जरुरत है और दूसरी ओर, आयात पर नियंत्रण करने के लिए बीसीडी बढ़ाकर कम से कम 15 प्रतिशत करने की भी जरुरत है.

एसएस उत्पादों के आयात पर एंटी डंपिंग ड्यूटी (एडीडी) और काउंटर वेलिंग ड्यूटी (सीवीडी), जो या तो रद्द दी गई हैं या समीक्षा समीक्षाधीन हैं, ने भारत के उद्योगों को सब्सिडी-प्राप्त चीनी और इंडोनेशियाई आयातों के आसान शिकार बनने से बचाया है. वित्त वर्ष 2020-21 से वित्त वर्ष 2022-23 (वार्षिक आधार) तक, चीन से होने वाले आयात में 221 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. हम योग्यता के आधार पर शुल्कों की समीक्षा के अंतिम निष्कर्षों और उन्हें फिर से लागू करने के फैसले के प्रति आशान्वित हैं. सही मूल्य (फेयर प्राइस) पर आयात सुनिश्चित करने के लिए नियंत्रण और संतुलन की एक संस्थागत प्रणाली की भी आवश्यकता है. हमारे बंदरगाहो पर सख्त निगरानी और कस्टम अधिकारियों के सशक्तिकरण जैसे ठोस प्रयासों को इस प्रणाली में शामिल किया जाना की ज़रुरत है. कुछ दिशानिर्देश पहले ही जारी हो चुके हैं, आवश्यकता है इनके शीघ्र एवं सख्त क्रियान्वयन की. 

स्टेनलेस स्टील के लंबे और फ्लैट उत्पादों पर निर्यात शुल्क वापस लेने के लिए मैं सरकार का आभारी हूं, क्योंकि निर्यात शुल्क ने हमारे बाजारों को गंभीर रूप से बाधित कर दिया था. मुझे उम्मीद है कि सरकार वित्तीय प्रोत्साहन और दिशानिर्देशों के माध्यम से, सार्वजनिक अवसंरचना की लंबी उम्र और स्थायित्व सुनिश्चित करने के लिए, इंफ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन में स्टेनलेस स्टील उत्पादों के प्रवेश हेतु बजट के अतिरिक्त भी उपाय करेगी. जनरल फाइनेंशियल रूल्स 2017 के तहत लोगों और परियोजनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जीवन चक्र लागत दृष्टिकोण (लाइफ साइकल कॉस्टिंग एप्रोच), जो सार्वजनिक खरीद परियोजनाओं के लिए प्रतिस्पर्धी सामग्रियों का मूल्यांकन करता है, को भी अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, जो वर्तमान में वैकल्पिक है. 

मुझे भरोसा है कि भारत का स्टेनलेस स्टील उद्योग उत्पादन क्षमताओं के लिहाज से परिपक्व हो गया है. एक निष्पक्ष, अनुकूल और सुसंगत नीतिगत माहौल के साथ, हम दुनिया में अपनी दूसरी उत्पादक स्थिति को पुनः प्राप्त करने में सक्षम होंगे और भारत को आत्मनिर्भर बनाना जारी रखेंगे.


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